नए नागरिकता कानून के विरोध में हुई हिंसा को लेकर सेना प्रमुख बिपिन रावत के बयान पर विवाद हो गया है. कल एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि नेता वह नहीं होता जो लोगों को हिंसा और आगजनी के रास्ते पर ले जाए. जनरल बिपिन रावत का कहना था, ‘नेतृत्व वह नहीं होता जो लोगों को गलत दिशा में लेकर जाए. आज हम सब देख रहे हैं कि बड़ी संख्या में यूनिवर्सिटी और कॉलेजों के छात्र कई शहरों में हिंसा और आगजनी करती भीड़ की अगुवाई कर रहे हैं. इसे नेतृत्व करना नहीं कहते.’

नए नागरिकता कानून के विरोध में बीते हफ्ते बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी. देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई इस हिंसा में कम से कम 17 लोगों की मौत हो गई. इनमें से ज्यादातर मौतें उत्तर प्रदेश में हुईं. सेना प्रमुख बिपिन रावत के इस बयान को कांग्रेस ने संवैधानिक लोकतंत्र के खिलाफ बताया है. पार्टी का कहना है कि अगर सेना प्रमुख को राजनीतिक मामलों में बोलने की इजाजत दी जाती है तो भविष्य में देश में सैन्य तख्तापलट भी हो सकता है. उधर, एआईएमआईएम मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने जनरल रावत को नसीहत दी है. उन्होंने कहा है कि नेतृत्व का मतलब अपने पद की सीमाएं जानना भी होता है. सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने सवाल उठाया कि कहीं सेना का राजनीतिकरण तो नहीं हो रहा.

लेकिन क्या सेना प्रमुख बिपिन रावत ने यह टिप्पणी कर किसी नियम का उल्लंघन किया है? बीबीसी से बातचीत में रक्षा मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार अजय शुक्ला तो यही मानते हैं. वे आर्मी रूल बुक के नियम 21 का हवाला देते हैं जो सेना में शामिल किसी भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों को सीमित करता है. यह नियम सेना अधिनियम 1950 का हिस्सा है और इसमें साफ लिखा गया है कि सेना में काम करने वाला कोई भी शख्स राजनीतिक मुद्दे पर कोई सार्वजनिक बयान नहीं दे सकता. हालांकि इसी नियम में एक ढील भी छोड़ी गई है. यह कहता है कि केंद्र सरकार की इजाजत के बाद ऐसा किया जा सकता है.

नौसेना के पूर्व प्रमुख एडमिरल एल रामदास ने भी जनरल बिपिन रावत के बयान को गलत बताया है. पीटीआई के मुताबिक उनका कहना है, ‘नियम साफ कहता है कि हम देश की सेवा कर रहे हैं न कि राजनीतिक ताकतों की. और जिस तरह की राजनीतिक बात हमने सुनी वह सेना में काम करने वाले किसी भी शख्स के लिए ठीक नहीं है, चाहे वो कोई शीर्ष अधिकारी हो या निचले स्तर पर काम करने वाला कोई व्यक्ति.’

इस बीच जनरल बिपिन रावत के बयान पर सेना ने सफाई दी है. एक बयान जारी कर उसने कहा है कि जनरल की बात का सीएए से संबंध नहीं था. बयान में कहा गया है, ‘वे भारत के भावी नागरिकों को संबोधित कर रहे थे जो अभी छात्र हैं. इन छात्रों पर देश का भविष्य निर्भर करता है और उनका मार्गदर्शन करना उनका (जनरल बिपिन रावत) फर्ज है. कश्मीर घाटी में युवाओं को सबसे पहले उन्हीं ने गुमराह किया जिन्हें वे नेता मानते थे.’