अपने नोबेल व्याख्यान में फ्रेंच साहित्यकार और बुद्धिजीवी आल्बेयर कामू ने ख़तरनाक ढंग से रचने को हमारे समय में लेखकीय धर्म मानते हुए उसे नागरिक निराशा से भी बचने की सलाह दी थी. शायद हमारा समय उस समय से अधिक कठिन, अराजक और खंडित समय हो चुका है. अभी भारत मूल के अमरीका में रहनेवाले बुद्धिजीवी अकील बिलग्रामी ने कहा कि हमारे समय को समझने और उससे निपटने-जूझने के लिए हमारे पास नयी अवधारणाएं और नयी वर्णमाला नहीं है. जो भी हो, यह ऐसा समय तो निश्चित ही है जिसमें आशा-निराशा का आसान द्वैत अब कोई विकल्प नहीं है. शायद पहले से कहीं अधिक हम अब रोज़ ही आशा और निराशा के बीच जूझते रहते हैं. अज्ञेय की उक्ति याद आती है- ‘यह नहीं अभिशाप, यह अपनी नियति है.’ इससे तो इनकार नहीं किया जा सकता है कि बीसवीं शताबदी और इक्कीसवीं शताब्दी के दो दशकों में अगर हम इस वैचारिक ऊहापोह के मुक़ाम पर पहुंचे हैं तो इसकी ज़िम्मेदारी हमारी ही है. हिंसा, युद्ध, हत्या, उन्माद, अपार असत्यता, फ़रेब आदि, इस दौरान, राजनीति और समाज-व्यवहार का बड़ा हिस्सा रहे हैं.

इस समय भारत में जो नया ध्रुवीकरण हो रहा है उसका सबसे उजला पक्ष यह है कि एक बार फिर प्रतिरोध की पहल साधारण नागरिकों और युवाओं की ओर से हो रही है. वह ऐसे निज़ाम का प्रतिरोध कर रही है जो फिर नागरिक विभाजन उकसाने और कराने की ओर सोचे-समझे तरीकों से बढ़ रहा है. सब कुछ को लोकतांत्रिक बहुमत के आधार पर निर्बाध और अनिवार्य मानते हुए. पिछले कुछ दिनों में जो हुआ है उससे स्पष्ट है कि भारत की बहुलतामूलक धारणा व्यापक जन और, सौभाग्य से, युवाओं के मन से हटी नहीं है और अब उसका फिर ज़ोरदार ढंग से इज़हार हो रहा है. सत्ताधारी शक्तियां पूरी कोशिश कर रही हैं कि यह पहल हिंदू-मुसलिम द्वंद्व में बदल जाये पर अब तक ये इसमें सफल नहीं हुए हैं. नागरिकता क़ानून के विरूद्ध प्रदर्शन करनेवालों में हिंदुओं का बहुमत है और यह बहुत उत्साहजनक पक्ष है. सत्ता अपना पाखंड बनाये हुए है पर लोगों को धीरे-धीरे वह साफ़ समझ में आने लगा है.

इसे अलक्षित नहीं जाना चाहिये कि पहल राजनैतिक विपक्ष से नहीं, युवाओं की स्वतःस्फूर्त सक्रियता से हुई है. इसका एक आशय यह भी है कि हम लोकतंत्र में सब कुछ राजनैतिक दलों पर नहीं छोड़ सकते हैं. नागरिक पहल और सक्रियता की जगह है और आज की परिस्थिति में तो वह अग्रगामी सिद्ध हो रही है. युवाओं को यह समझ में आ गया है कि उनका यथार्थ और सपने ही नहीं, भारत का लोकतंत्र, उसकी बहुलता की परम्परा, उसकी सभ्यता ही दांव पर है. यह देखना दिलचस्प है कि गोदी मीडिया भी इस प्रतिरोध को कम करके आंकने की जुर्रत या षडयंत्र नहीं कर पा रहा है. हम जैसों को यह संतोष है कि हमारे रहते युवा नागरिक उम्मीद का स्थापत्य गढ़ने की ओर बढ़ रहे हैं.

मानवीय नादानी और नासमझी

दार्शनिक बट्रेंड रसेल ने बरसों पहले कहा था कि ‘आधुनिक समय में मुश्किल यह है कि नासमझ-नादान लोग आत्मविश्वास और समझदार लोग संदेह से भरे होते हैं’. इधर एक आर्थिक इतिहासकार कार्लो सिपोला की नयी पुस्तक हाथ लगी- ‘दि बेसिक लाज़ आव् ह्यूमन स्टुपिटिडी’. पेंगुइन समूह के डब्ल्यूएच एलेन ने प्रकाशित की है. मानवीय व्यापार में निरी नादानी और नामसमझी शायद शुरू से ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है. इस पुस्तक के अनुसार मानवीय नादानी का पहला बुनियादी नियम यह है कि ‘हमेशा और अनिवार्य रूप से जितने नादान-नासमझ हमारे बीच हैं उनकी संख्या हम कम कर आंकते हैं.’ यही नहीं, किसी व्यक्ति के नादान-नासमझ होने में उसके व्यक्तित्व या चरित्र के अन्य गुण आड़े नहीं आते और न ही कोई भूमिका निभाते हैं. नादान देश-समाज-परिस्थिति-आर्थिक हैसियत, राजनैतिक विचार आदि से अप्रभावित रहते हैं. वे हर जगह, हर स्तर, हर समाज, हर राजनैतिक-आर्थिक व्यवस्था और सत्ता में होते हैं. वे स्वाभाविक रूप से ऐसे होते हैं. उनकी नासमझी लगभग प्रकृति द्वारा दी गयी होती है. तीसरा और स्वर्णिम नियम यह है कि नादान-नासमझ ऐसा व्यक्ति होता है जो दूसरे किसी व्यक्ति या समूह को नुकसान पहुंचाता है जबकि उसको स्वयं कोई फ़ायदा नहीं होता बल्कि हो सकता है वह कुछ नुकसान उठाकर दूसरों को नुक़सान पहुचाता है.

जो लोग सत्ता और प्रभाव की जगहों पर नादान-नामसझ होते हैं उनमें नौकरशाह, सेनाध्यक्ष, राजनेता, राज्याध्यक्ष और धर्मगुरु आदि शामिल होते हैं. आप डाकू के व्यवहार और हरकतों का अंदाज लगा सकते हैं पर नासमझ कब क्या और कैसे करेगा इसका कोई पूर्वानुमान सम्भव नहीं होता. डाकू या ठग को आप पकड़कर क़ानून के हवाले कर सकते हैं, पर नासमझ को नहीं. उसको तो आप लोकतंत्र में इधर अकसर ही बाक़ायदा चुनते हैं. शिलर ने बहुत पहले कहा था कि नासमझ के विरुद्ध देवताओं तक का संघर्ष विफल होता है!

चौथा नियम यह है कि अकसर समझदार लोग नासमझों द्वारा किये जा रहे नुक़सान और ऐसा करने की उनकी शक्ति की कम क़ीमत आंकते हैं और फिर भारी नुक़सान की क़ीमत चुकाते हैं. नासमझ व्यक्ति सबसे ख़तरनाक होता है. वह डाकू से ज़्यादा ख़तरनाक होता है. पुस्तक छोटी सी है और बेहद पठनीय. उसका विश्लेषण और नतीजे सभी समाजों पर लागू होते हैं.

इस पर सचमुच विचार करने की ज़रूरत है कि नादानी और नासमझी ने मानवता का कितना नुक़सान किया था. जबकि मनुष्यों के पास मानव-जीवन को बेहतर बनाने के साधन और सोच रहे हैं. दुर्भाग्य है कि यह नासमझी सिर्फ़ व्यक्तिगत मामला नहीं रही है. हमारे समय में, कम से कम भारत में, राजनीति, सत्ता, धर्म, मीडिया, आर्थिकी, शिक्षा आदि सभी इस नासमझी और नादानी से ग्रस्त हैं. जो सामाजिक और मानवीय क्षति यह नादानी कर रही है उसका विश्लेषण और आकलन काश हमारा कोई बौद्धिक करने का दुस्साहस करे!

वर्ष का अंत

वर्ष का अंत एक बार फिर. हममें से जो दुर्दम्य आशावादी हैं उन्हें याद होगा कि पिछले वर्षांत पर भी अनेक तरह की आशाओं से घिरे थे जबकि कुछ ही महीनों बाद हम निराशा की गिरफ्त में झोंक दिये गये. इस बार फिर ऐसे आसार हैं कि चीज़ेंबदल रही हैं, और लोग सचाई के नज़दीक पहुंचने लगे हैं और उन्हें कई पाखंड और झूठ समझ में आ रहे हैं. यह भी लग रहा है कि चीज़ें बदल सकती हैं और लोग फिर बदलने की ओर बढ़ रहे हैं.

आशा और निराशा से ग्रस्त होना, कभी उत्साहित और कभी व्यर्थ अनुभव करना, भले एक तरह का निठल्लापन है, अपरिहार्य है. जो स्वयं बदल नहीं सकते या कि बदलाव की प्रक्रिया में कोई सार्थक हिस्सेदारी नहीं करते, वे कम-से-कम बदलाव की आहट सुनकर उसे दर्ज़ तो कर सकते हैं. जो गवाह है वही आगे जाकर हिस्सेदार भी हो सकता है.

कभी-कभी थोड़ा डर भी लगता है। क्या सिर्फ़ सतह बदलेगी, कुछ चेहरे बदल जायेंगे? या कि मानसिकता, सोच-समझ, सहज मानवीय भावनाएं भी बदलेंगी? इस बदलाव में, अगर वह सचमुच आ ही गया, साहित्य और कलाओं की भूमिका शायद थोड़ी देर बाद स्पष्ट और ज़रूरी होगी. स्वयं नागरिक की तरह लेखक-कलाकार और अन्य बुद्धिजीवी किस तरह की भूमिका निभायेंगे यह ज़्यादा ज्वलन्त प्रश्न है उनकी बात छोड़ दें जो जो कुछ हो रहा है हत्या-हिंसा-बलात्कार आदि रूपकों में ज़ाहिर मानसिकता से उससे विशेष रूप से असहमत नहीं हैं तो जो नये नागरिक प्रतिरोध के उभार से सहमत और उत्साहित हैं, उन्हें क्या करना चाहिये. हर लेखक या कलाकार स्वयं ही तय करे किवह क्या-कैसे करे पर उसे स्पष्ट रूप से हिंसा-हत्या-बलात्कार-झूठ-पाखण्ड की नयी वर्चस्वशाली राजनैतिक संस्कृति के विरोध में स्पष्ट और मुखर रूप से दिखना चाहिये. इससे कम से अंत करण की नीति की मांग पूरी नहीं होगी.