1- नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के बाद अब राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को लेकर विरोध होने लगा है. उधर, गृहमंत्री अमित शाह का तर्क है कि इन मुद्दों पर काम तो पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के समय ही शुरू हो चुका था और उनकी सरकार महज इसे आगे बढ़ा रही है. क्या यह बात सही है? बीबीसी पर नवीन नेगी की रिपोर्ट.

क्या एक ही पटरी पर हैं चिदंबरम और अमित शाह?

2- भारत दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ इंटरनेट बाजार है. लेकिन इसके साथ एक नकारात्मक आंकड़ा भी जुड़ा हुआ है. इंटरनेट पर पाबंदी लगाए जाने के लिहाज से भी भारत दुनिया में पहले नंबर पर है. इस मुद्दे के तमाम पहलुओं को टटोलती डॉयचे वेले हिंदी पर ऋषभ कुमार शर्मा की रिपोर्ट.

सरकार कैसे बंद करती है इंटरनेट और क्या बिना इंटरनेट चैट की जा सकती है?

3- न्यायपालिका में सरकार की दखलअंदाजी के मुद्दे पर हाल के दिनों में बहस तेज हुई है. द प्रिंट हिंदी पर अपने इस लेख में मनीष छिब्बर का मानना है कि वैसे तो न्यायपालिका का प्रदर्शन हाल के वर्षों में खराब ही रहा है, फिर भी 2019 ने इसके अपयश में कई नए पन्ने जोड़े हैं. उनके मुताबिक न्यायपालिका उन लोगों के पक्ष में खड़े होने में विफल रही है जो संवैधानिक नैतिकता और वैधता के प्रति नरेंद्र मोदी सरकार के उपेक्षा भाव का खामियाजा झेल रहे हैं.

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4- नागरिकता संशोधन कानून को लेकर बीते दिनों काफी हिंसा हुई. इस दौरान कई पत्रकारों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. 21 दिसंबर को लखनऊ में हुए एक विरोध प्रदर्शन में कुछ चैनलों की ओबी वैन को भी आग के हवाले कर दिया गया. मीडिया को लेकर यह गुस्सा क्यों है? इस सवाल को लेकर न्यूजलॉन्ड्री पर आयुष तिवारी और बसंत कुमार की रिपोर्ट.

‘मीडिया को लेकर लोगों में गुस्सा है जिसका शिकार मैं हो गया’

5- क्या आज की कांग्रेस भाजपा का मुकाबला कर सकती है? इस सवाल पर बीते कुछ समय से खूब चर्चा हो ही है. द वायर हिंदी पर अपने इस लेख में हरीश खरे मानते हैं कि दो दशकों में कांग्रेस उस स्तर तक गिर चुकी है कि गांधी परिवार से बाहर जाकर विचार करने की इसकी सामूहिक क्षमता समाप्त हो गई है.

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