मंगलवार को दीपिका पादुकोण का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पहुंचना दिन की सबसे बड़ी खबर बन गया. वे दो दिन पहले जेएनयू में हुई हिंसा के बाद छात्रों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए वहां पहुंचीं थीं. इस दौरान जेएनयू परिसर में हो रही एक सभा में दीपिका भीड़ में खड़ी दिखाईं दीं जिसमें जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष आइशे घोष और पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार लोगों से बातचीत कर रहे थे. यहां पर उन्होंने न छात्रों को संबोधित किया और न ही नारेबाज़ी की, लेकिन शायद उनका खड़ा होना ही बहुत कुछ कह गया. इससे अलग, एक न्यूज चैनल से बात करते हुए उनका यह भी कहना था कि ‘मुझे गर्व है कि हम (देशवासी) अपनी बात कहने में डरते नहीं हैं और आज इसकी बहुत ज़रूरत है.’ पहले जेएनयू में उनकी भागीदारी और फिर उनका यह साहसी बयान देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है. चर्चा से ज्यादा यह आश्चर्य का विषय भी क्योंकि दीपिका पादुकोण अपने कद की शायद पहली बॉलीवुड एक्टर हैं जो खुलकर अपनी राजनीतिक राय व्यक्त करती नज़र आ रही हैं.

इससे ठीक दस दिन पहले जब सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन को दादा साहब फालके अवार्ड से सम्मानित किए जाने की खबर सुर्खियों का हिस्सा बन रही थी, तब सोशल मीडिया पर उनकी आलोचनाओं का दौर भी चल रहा था. इस बार वे नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी पर चुप्पी साधे रखने के लिए आलोचनाओं का शिकार हो रहे थे. कहा जा रहा था कि जब देश को उनके जैसी सबसे दमदार और वजनदार आवाजों की ज़रूरत है, तब वे ट्विटर पर चुटकुले पोस्ट करने और अवार्ड लेने में व्यस्त हैं. अब जब दीपिका पादुकोण ने कुछ कहने की हिम्मत दिखाई है तो एक बार फिर यह सवाल देश के सबसे बड़े नायकों से भी किया जाने लगा है कि वे हमारे लिए कब बोलेंगे? सवालों के इन घेरों में सबसे पहले बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन, क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर और स्वर कोकिला लता मंगेशकर दिखाई देते हैं.

अमिताभ बच्चन पर लौटें तो जिस तरह से उनकी आलोचना पहली बार नहीं हो रही है, उसी तरह यह भी पहली बार नहीं है कि वे बगैर कुछ कहे ही सरकार की तरफ झुके दिखाई दे रहे हों. कुछ महीने पहले वे मुंबई मेट्रो प्रोजेक्ट की तारीफ करने वाला एक ट्वीट कर सोशल मीडिया पर चर्चा में आ गए थे. इस ट्वीट में उनका यह भी कहना था कि पर्यावरण को बचाने के लिए लोगों को अपने बगीचों में पेड़ लगाना चाहिए. इन दोनों बातों को एक साथ एक ही ट्वीट में लिखने का मतलब यह निकाला गया कि बच्चन साहब यह मानते हैं कि मेट्रो इतनी महत्वपूर्ण है कि उसके लिए आरे में हजारों पेड़ को काटा जाना गलत नहीं है और अगर पेड़ चाहिए तो उन्हें अपने बगीचों में लगाना चाहिए. इसके बाद मेट्रो की वजह से मुंबई के फेफड़ों यानी आरे जंगल को कटने से बचाने के लिए आंदोलन कर रहे मुंबईवासी भड़क उठे थे. यहां तक कि उन्होंने अमिताभ बच्चन के घर के बाहर प्रदर्शन तक कर डाला था.

ऊपर लिखे मसलों पर तो फिर भी बच्चन साहब का पक्ष फिर भी समझा जा सकता है - कि वे सरकार के समर्थन में बोल रहे थे या उसके विरोध में नहीं बोल रहे थे. लेकिन कई मौके ऐसे भी आए जब वे बेहद ज़रूरी सामाजिक मुद्दों पर भी बोलने से बचते दिखे. मसलन, जब कठुआ मामले पर उनकी राय पूछी गई तो उनका कहना था कि उन्हें इस पर घिन आती है इसलिए वे इस विषय पर बात नहीं करना चाहते हैं. उनकी इस टिप्पणी को उनकी अति-संवेदनशीलता से कम और हमेशा राजनीतिक तौर पर सही दिखने की उनकी कोशिश से जोड़कर देखा गया. इसकी एक वजह यह थी कि एक छोटी बच्ची के बलात्कार जैसे घृणित मामले को भी कई लोग धर्म और राजनीति के चश्मे से देख रहे थे.

इन कुछ उदाहरणों पर गौर करें तो बच्चन साहब के बारे में दो-तीन बातें कही जा सकती हैं. पहली यह कि वे ज्यादातर मौकों पर किसी भी महत्वपूर्ण और ज्वलंत मुद्दे से दूरी बनाकर ही रखते हैं. दूसरी, अगर बोलना ही पड़े तो वे अक्सर प्रचलित पैमानों पर फिट होने वाली हल्की-फुल्की बातें ही किया करते हैं. इस दौरान अपनी बातों में गंभीरता लाने के लिए वे वजनदार विचारों के बजाय अपनी दमदार आवाज का इस्तेमाल करते हैं. और तीसरी बात यह कि अगर कभी उन्हें जितना वे चाहते हैं उससे ज्यादा बोलना पड़ जाये तो वह आम तौर पर सरकार के समर्थन में ही होता है. विरोध में तो बिलकुल भी नहीं.

सोशल मीडिया पर कुछ लोग अमिताभ बच्चन के इस व्यवहार को पनामा पेपर्स में उनका नाम आने वाली खबर से भी जोड़कर देखते हैं. ऐसे लोग मानते हैं कि पनामा मसले को निपटाने के लिए ही वे सरकार से जुड़ी कोई भी टिप्पणी करने से बचते हैं. फिल्म से जुड़ी राजनीति पर नज़र रखने वाले बताते हैं कि यह कोई नई बात नहीं है. उनका ऐसा ही व्यवहार तब भी देखने को मिलता था जब विपक्षी कांग्रेस सत्ता में हुआ करती थी.

बच्चन साहब की तरह कुछ महीने पहले लता मंगेशकर भी तब ट्रोल हुई थीं जब उन्होंने इंटरनेट सेंसेशन रानू मंडल पर एक गैर-ज़रूरी टिप्पणी की थी. लता जी का कहना था कि उनकी नकल कर लोगों का ध्यान खींचने वाली प्रतिभा बहुत भरोसेमंद नहीं कही जा सकती है. अगर रानू मंडल से अलग हटकर देखें तो यह बात एक बुजुर्ग गायिका द्वारा दी गई लाख टके की सलाह लग सकती है. लेकिन गलत संदर्भ में कहे जाने के चलते यह एक बड़ी गायिका द्वारा कही गई छोटी बात बन गई जिसके लिए उनकी आलोचना होना लाज़िमी ही थी.

सोशल मीडिया पर कुछ लोगों की शिकायत यह भी है कि ट्विटर पर खासा सक्रिय रहकर, अक्सर शुभकामनाओं का लेन-देन करने वाली लता मंगेशकर, कभी अपनी इस मजबूत-सुरीली आवाज का इस्तेमाल लोगों के मुद्दे रखने के लिए नहीं करती हैं. हालांकि पिछले दिनों उन्होंने मुंबई में काटे जा रहे (आरे जंगल के) पेड़ों को बचाने के लिए ट्वीट किया था लेकिन इसके लिए उन्होंने उतनी तत्परता बिल्कुल नहीं दिखाई जितनी कुछ साल पहले, मुंबई में पेडर रोड फ्लाईओवर न बनने के लिए दिखाई थी. एक समय पर इस फ्लाईओवर का विरोध करते हुए स्वर कोकिला ने न सिर्फ राज ठाकरे सहित कई नेताओं से मुलाकात की थी बल्कि दबाव बनाने के लिए मुंबई छोड़ देने की धमकी तक दे डाली थी. दरअसल, 1995 में पेडर रोड पर, ट्रैफिक कम करने के लिए एक फ्लाईओवर बनाने का प्रस्ताव रखा गया था जिसकी जद में लता मंगेशकर, आशा भोसले सहित कई बड़ी हस्तियों के मकान आ रहे थे. लेकिन बाद में इन सबके विरोध के चलते यह प्लान रद्द कर दिया गया.

अब सचिन तेंदुलकर की बात करें तो वे राजनीतिक रूप से इतनी संतुलित बातें करते हैं कि उनसे जुड़ा कोई ऐसा उदाहरण खोज पाना भी मुश्किल लगता है जिस पर सोशल मीडिया या कहीं और किसी भी तरह की आपत्ति जताई गई हो. पिछले दिनों देश के सबसे प्रभावी स्वच्छता एंबेसडर का सम्मान हासिल करने वाले सचिन, या तो इस तरह के अभियानों का हिस्सा बनते हैं जिनमें राजनीतिक बातचीत की कोई गुंजाइश न हो या फिर अपने व्यक्तिगत जीवन और खेल से जुड़ी बातें करते नज़र आते हैं. इनसे अलग, वे कभी-किसी सार्वजनिक मंच पर जन-सरोकार की बात अपनी तरफ से कभी नहीं करते हैं. यहां तक कि जब वे इसकी जिम्मेदारी के साथ (2012 से 2018 तक) राज्यसभा के सांसद बने तब भी वे कोई ऐसा मुद्दा लेकर संसद नहीं पहुंचे जो अपनी अनिवार्यता के चलते चर्चा का विषय बना हो. जरा और गहराई में जाएं तो यह भी कहा जा सकता है कि वे संसद ही नहीं पहुंचे क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि संसद के कुल 348 कार्यदिवसों से वे केवल 23 दिन ही वे उसका हिस्सा बने थे.

अगर आम लोगों से जुड़ी बातों को छोड़ भी दिया जाए तो खेल से जुड़े विवादों से भी उन्होंने हमेशा दूरी ही बनाकर रखी. मैच फिक्सिंग, बॉल टेंपरिंग और बीसीसीआई से जुड़े तमाम विवादों पर भी वे बोलने से वे हमेशा बचते ही रहे. यह भी पॉलिटिकली करेक्ट होने की हद ही कही जाएगी कि उनकी बायोपिक ‘सचिन–अ बिलियन ड्रीम्स’ में भी क्रिकेट के स्याह पक्ष का कोई जिक्र नहीं किया गया है. अगर उनके किसी सार्वजनिक व्यवहार के लिए शिकायत करनी हो तो बस यही की जा सकती है कि वे देश के सबसे अमीर उद्योगपतियों के आयोजनों में हमेशा शिरकत करते रहे हैं, फिर चाहे वह मुकेश अंबानी हों या सुब्रत रॉय सहारा. इससे यही अंदाजा लगता है कि वे भी उन लोगों में शामिल लगते हैं जो उद्योगपतियों से लेकर नेताओं तक, सबसे बनाकर रखना चाहते हैं और इसके लिए वक्त कैसा भी हो, जुबान को सीलबंद रखने से गुरेज़ नहीं करते हैं.

आम तौर पर होता यह था कि अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर और लता मंगेशकर को लेकर की गई जरा सी हल्की बात भी भारतीयों को नाकाबिले बरदाश्त हुआ करती थी. मसलन, बीते साल जब बच्चन साहब ने ट्विटर पर फॉलोअर कम होने की छोटी सी शिकायत की तो उनके तमाम प्रशंसकों ने ट्विटर को ट्विटर पर ही ट्रोल कर दिया था. इसी तरह सचिन तेंदुलकर के होते हुए आईसीसी ने जब बेन स्टोक्स को सर्वकालिक महानतम खिलाड़ी कह दिया तो उसे भी भारतीय क्रिकेटप्रेमियों की नाराज़गी और भारी विरोध का सामना करना पड़ा था. लता मंगेशकर के मामले में तो बात पुलिस तक जा पहुंची थी. साल 2016 में एआईबी के एक कॉमेडियन ने लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर के फेस-फिल्टर वाला स्नैपचैट वीडियो बनाया था. इससे उनके प्रशंसक इतने आहत हुए हुए कि कई जगहों पर कॉमेडियन के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज करवा दी थीं. ये सभी वाकये यह बताने के लिए काफी हैं कि इन हस्तियों के प्रशंसक और समर्थक इन्हें कितनी गंभीरता से लेते हैं और इनका कितना सम्मान करते हैं.

लेकिन बीते कुछ समय से हवा बदलती हुई दिखाई दे रही है. खासकर, सोशल मीडिया पर इनकी उपस्थिति बढ़ने के बाद से. यहां पर आने के बाद लोगों को इनकी निजी और व्यावसायिक ज़िंदगी की जानकारी अपेक्षाकृत ज्यादा गहराई से मिल जाती है. इसमें प्रशंसक यह साफ तौर पर देख पाते हैं कि उनके महानायक अपने फायदे के लिए तो रिस्क उठाते दिखते हैं लेकिन जब उनकी यानी आम जनों के मुद्दों की बात की बारी आती है तो वे ज्यादातर समय या तो पॉलिटिकली करेक्ट बातें करते हैं या फिर चुप्पी साध लेते हैं. शायद यही वजह है कि पिछले कुछ समय से लोगों ने इन मूर्तियों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं कि अगर ये हमारे महानायक हैं तो हमसे जुड़े मुद्दों पर बोलते क्यों नहीं?