‘ओ, व्हाट ए क्रिमिनल नेग्लिजेंस’, लखनऊ में गोमती नदी पर बने महात्मा गांधी सेतु पर खड़ी एक युवती जब किसी से यह कह रही थी तो उसका आशय गोमती नदी पर सैकड़ों करोड़ की लागत से बने आधे-अधूरे से गोमती रिवरफ्रंट की बदहाली से था. पुराने लखनव्वों से लेकर युवा पीढ़ी तक गोमती की दुदर्शा को लेकर उपज रहा आक्रोश यूं ही नहीं है. कल्याण सिंह की सरकार के दिनों से लेकर आज तक गोमती को स्वच्छ बनाने की कोशिशें अरबों रूपए डकार गईं मगर नदी की हालत सुधरने के बजाए लगातार बिगड़ती ही जा रही है.

अखिलेश यादव ने गोमती को सुन्दर और प्रवाहमान बनाने के लिए 550 करोड़ की लागत से गोमती रिवरफ्रंट नाम की जो योजना शुरू की थी वह उनके कार्यकाल में 1600 करोड़ रुपये तक पहुंचने के बाद भी अधूरी ही रह गयी थी. इस परियोजना के तहत लखनऊ की नगर सीमा के भीतर गोमती नदी के दोनों किनारों पर बीस मीटर ऊंची कंक्रीट की दीवार बनाकर वहां पर साबरमती नदी की तरह पैदल सड़क, जॉगिंग ट्रैक, साइकिल ट्रैक और तरह-तरह के पार्क बनाए जाने थे. रिवरफ्रंट पर घना वृक्षारोपण भी होना था. इस योजना के तहत गोमती को गहरा करने के लिए उसकी तलहटी से गाद भी निकाली जानी थी उसमें कई करोड़ की नावें और करोड़ों की लागत के फौव्वारे भी चलने थे.

पैसे की भयंकर लूट होने के बावजूद इस योजना का काम 80 फीसदी तक पूरा हो गया था. इससे आगे योजना का बजट और काम बढ़ पाता उससे पहले ही अखिलेश यादव सत्ता से बाहर हो गए. रिवरफ्रंट पर जितना काम अखिलेश सरकार में हुआ, उसमें अनेक गम्भीर पर्यावरणीय खामियां और बहुत बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आई थीं. लेकिन इसके बाद भी यह लखनऊ के निवासियों के लिए एक शानदार चीज थी. एक गर्व कर सकने लायक काम.

जब उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार आई तो लखनऊ के लोगों के मन में गोमती रिवरफ्रंट को लेकर दो तरह के सवाल थे. पहला यह कि क्या नई सरकार भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी गोमती रिवरफ्रंट योजना के गुनहगारों के खिलाफ कोई कार्रवाई करेगी? और दूसरा यह कि क्या नई सरकार इस योजना को पूरा करवाएगी?

प्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लोगों के इन सवालों का उत्तर देने में जरा भी देरी नहीं लगाई. 19 मार्च 2017 को शपथ ग्रहण के ठीक बाद उन्होंने अपने कई मंत्रियों के साथ गोमती रिवरफ्रंट में दरबार लगाया, उसका मुआयना किया और अधिकारियों को लताड़ा भी. इसके बाद उन्होंने मई 2017 तक गोमती को साफ करने के आदेश दिए और रिवरफ्रंट का बचा हुआ कार्य एक साल में खत्म करने के भी. आदित्यनाथ ने रिवरफ्रंट के निर्माण में हुए भारी भ्रष्टाचार की जांच के लिए तत्काल एक आयोग बनाने की भी घोषणा की.

इससे साफ था कि योगी आदित्यनाथ सरकार गोमती को साफ करवाना चाहती थी, रिवरफ्रंट को पूरा करना चाहती थी और योजना को लेकर भ्रष्टाचार की जो चर्चाएं थीं उनकी गम्भीरतापूर्वक जांच भी करवाना चाहती थी. मुख्यमंत्री ने रिवरफ्रंट के अपने पहले दौरे में अधिकारियों को लताड़ते हुए पूछा था गोमती इतनी गंदी और बदबूदार क्यों है? क्या सारे पैसे पत्थरों में खपा दिए?

लेकिन योगी सरकार गोमती नदी से जुड़े तीनों ही कार्यों को करने में बुरी तरह असफल रही. इतनी असफल कि कार्यकाल के ढाई वर्ष पूरे होने के बाद गोमती और गोमती रिवरफ्रंट की दुर्दशा को देखकर लोगों को यह कहना पड़ रहा है कि ‘व्हाट ए क्रिमिनल नेग्लिजेंस!’

सरकार गोमती के हर मोर्चे पर असफल रही है. जहां तक गोमती की सफाई का सवाल है. योगी सरकार ने इसको लेकj कई तमाशे किए हैं. अपनी सरकार का सवा साल पूरा होने के मौके पर 24 जून 2018 को योगी आदित्यनाथ ने अपने मंत्रियों के पूरे लाव-लश्कर के साथ एक बार फिर गोमती की सफाई का एक और अभियान छेड़ा था. खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने हाथों से गोमती से कचरा उठाकर इस स्वच्छता अभियान को शुरू किया था. उस एक दिन पचासों ट्रक कचरा गोमती से निकाला गया था लेकिन तब से लगभग सवा साल और बीत चुका है मगर गोमती साफ होने के बजाय पहले से काफी ज्यादा गंदी हो चुकी है.

27 मार्च 2017 को जिस गोमती की बदबू से तिलमिला कर मुख्यमंत्री ने अभियन्ताओं को लताड़ा था उस गोमती में जुलाई 2017 तक रोजाना 3190 लाख लीटर सीवेज रोज गिर रहा था. यह आंकड़ा एनजीटी की निगरानी समिति की 81 पृष्ठीय रिपोर्ट का है. इसमें आज भी कोई कमी नहीं आई है.

फिलहाल गोमती की हालत यह है कि उसका पानी पीने, या उससे नहाने की बात तो दूर वह लाॅन की सिंचाई के काबिल भी नहीं रह गया है. और यह तब है जब हाल ही में गोमती को साफ करने के लिए केंद्र सरकार भी 298 करोड़ रूपये योगी सरकार को दे चुकी है. यह रकम ठीक लोकसभा चुनाव से पहले नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत उसे दी गई थी.

गोमती किस कदर गंदी होती जा रही है इसका एक प्रमाण जल निगम की एक आंतरिक रिपोर्ट से भी मिलता है. इस रिपोर्ट के मुताबिक गोमती से लखनऊ को पेयजल आपूर्ति करने वाले तीन वाटर वर्क्स में 2016 में 1119 मीट्रिक टन फालिक एल्युमिना फौरिक (फिटकरी) की खपत हुई थी जबकि 2017 में पानी को साफ करने वाले इस रसायन की खपत 1993 मीट्रिक टन हो गई. इसी तरह गोमती के पानी को कीटाणु मुक्त करने वाली ब्लीचिंग और क्लोरीनेशन पर 2016-17 में एक करोड़ 10 लाख खर्च हुए जबकि 2017-18 में यह राशि बढ़कर एक करोड़ नब्बे लाख हो गयी.

इस बीच एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल) भी गोमती की दुर्दशा पर आंखें तरेर चुका है. लखनऊ प्रशासन और राज्य सरकार के काम-काज से असंतुष्टि जताते हुए उसने कई तरह की सिफारिशें की थीं. लेकिन योगी सरकार को शायद एनजीटी की यह ‘दखलंदाजी’ नागवार गुजरी. उसने गोमती को स्वच्छ करने के प्रयासों में गम्भीरता दिखाने के बजाए एनजीटी की निगरानी समितियों को ही भंग कर दिया.

रिवरफ्रंट के भ्रष्टाचार के मामले में भी 27 मार्च 2017 को मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद बने आयोग की अंतिम रिपोर्ट 2017 में ही आ गई थी. इसके बाद रिवरफ्रंट घोटाले की जांच 30 नवम्बर 2017 को सीबीआई को सौंप दी गई थी. तब से अब तक दो साल से ज्यादा हो चुके हैं लेकिन इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा सकी है.

रिवरफ्रंट योजना को तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव खुद देख रहे थे. उनके मातहत अधिकारियों पर इसकी सीधी जिम्मेदारी थी. लेकिन अधिकारियों का जादू ऐसा होता है कि उस समय के प्रमुख सचिव वित्त रहे राहुल भटनागर को पूर्व न्यायाधीश आलोक कुमार सिंह की अध्यक्षता वाले आयोग ने ही क्लीन चिट दे दी थी. आयोग ने तत्कालीन मुख्य सचिव आलोक रंजन को पर्यवेक्षणीय शिथिलता यानी की परियोजना की ठीक ढंग से देख-रेख न करने का दोषी पाया था. जबकि आलोक रंजन के मुख्य सचिव रहते हुए योजना पर कुल 600 करोड़ खर्च हुए थे और राहुल भटनागर के मुख्य सचिव रहते हुए 900 करोड़ से अधिक. अब ताजी चर्चा यह है कि आलोक रंजन को भी जल्द ही क्लीन चिट दी जाने वाली है.

आलोक सिंह आयोग के बाद राज्य के नगर विकास मंत्री सुरेश खन्ना की अध्यक्षता में भी एक समिति बनी थी जिसमें राज्य के दो वरिष्ठतम नौकरशाह भी शामिल थे. इस समिति ने घोटाले के लिए बड़े अधिकारियों को भी जिम्मेदार तो माना लेकिन एफआईआर सिर्फ जल निगम के आठ इंजीनियरों के खिलाफ ही की गई. 19 जून 2017 को हुई इस एफआईआर के बाद फरवरी 2018 में ईडी ने भी इस मामले में कार्रवाई शुरू कर दी. इसी जुलाई में उसने तीन इंजीनियरों की कई करोड़ रुपये की सम्पत्ति जब्त की. उनके घर व अन्य ठिकानों पर छापामारी भी की गई. भ्रष्टाचार के इस मामले में पिछले ढाई सालों में इसके सिवा अब तक कुछ भी नहीं हुआ.

ईडी ने रिवरफ्रंट से जुड़ी छह बड़ी निर्माण कम्पनियों के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की है. इनमें से कुछ ब्लैकलिस्टेड कम्पनियां भी शामिल हैं. इन सभी पर रिवरफ्रंट योजना में भ्रष्टाचार के आरोप हैं. इन कंपनियों को काम देने में किस तरह की मनमानी हुई इसका प्रमाण 2019 की कैग रिपोर्ट से मिलता है. इसमें कहा गया है कि 662.58 करोड़ रूपए के कार्यों के लिए किसी भी तरह के टेंडर जारी नहीं किए गए. यानी अपनी चहेती कंपनियों को इनके सीधे ठेके दे दिए गए. लेकिन इतना सब होते हुए भी रिवरफ्रंट से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों में कोई भी ठोस या बड़ी कार्रवाई अब तक नहीं की जा सकी है.

रिवरफ्रंट का जो काम मार्च 2017 से पहले अधूरा छूट गया था वह अब भी वैसे ही छूटा हुआ है. जबकि 2017 में योगी सरकार ने इसके लिए 68 करोड़ रुपये आवंटित भी किये थे. फिलहाल इस दिशा में कुछ होता नहीं दिख रहा है और जो होना है उसकी कीमत लगातार बढ़ती जा रही है.

आज हालत यह है कि गोमती बैराज के दोनों ओर महज 15-15 मीटर के अंडरपास का काम ही दो वर्षों से रूका पड़ा है. बैराज के दोनों कोनों मे अंडरपास के नीचे खुदे हुए हिस्से में झाड़-झंकाड़ उग आए हैं और गंदगी के ढेर जमा हो चुके हैं. यदि ये हिस्से पूरे हो गए होते तो नदी के दोनों किनारों में 13 किलोमीटर की लंबाई के दो साइकिल/जॉगिंग ट्रैक चालू किये जा सकते थे.

इस वर्ष के बजट में राज्य सरकार ने रिवरफ्रंट के रख-रखाव के लिए सिंचाई विभाग को 38.32 करोड़ रुपये का बजट दिया है. लेकिन रख-रखाव तो दूर गोमती रिवरफ्रंट में जाना भी अब असुरक्षित और खतरनाक हो चला है. गंदगी और बदबू तो पहले से ज्यादा है ही. गोमती की सैर के लिए आई करोड़ों के नावें कबाड़ में बदल रही हैं और करोड़ों के फौव्वारे अपने हाल पर आंसू बहा रहे हैं.

राज्य सरकार ने रिवरफ्रंट में बागवानी का काम लखनऊ विकास प्राधिकरण को सौंपते हुए इसके लिए भी 27 करोड़ रूपए दिए हैं, मगर इस दिशा में भी जमीन पर कोई भी काम होता दिखाई नहीं दे रहा. यानी पैसे तो अब भी रिवरफ्रंट के नाम पर लगातार दिये जा रहे हैं लेकिन अब यहां कोई काम होता नहीं दिख रहा है. अखिलेश सरकार के समय भ्रष्टाचार के साथ-साथ काम भी हो रहा था.

गोमती को लेकर योगी सरकार कितनी गम्भीर है इसका प्रमाण सरकार के ढाई साल पूरे होने पर बांटी गई उपलब्धियों की पुस्तिका में भी मिलता है. इसके पचासों पन्नों में एक भी जगह गोमती का नाम तक नहीं है.