अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीते हफ्ते सेना की छठी शाखा ‘स्पेस फोर्स’ बनाने के लिए राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण कानून (एनडीएए) पर हस्ताक्षर कर दिए. इस कानून के तहत अब अमेरिका के पास 16 हजार सैनिकों की ताकत वाला एक अलग सैन्य बल होगा, जिसके ऊपर सिर्फ अंतरिक्ष में पैदा होने वाले खतरों से निपटने की जिम्मेदारी होगी. सेना की यह नई शाखा अमेरिकी वायुसेना के अंतर्गत उसी तरह काम करेगी जैसे मरीन कॉर्प अमेरिकी नेवी के अंतर्गत काम करती है. स्पेस फोर्स को पहले वर्ष के लिए 40 मिलियन डॉलर यानी करीब 300 करोड़ रुपए का फंड दिया गया है.

डोनाल्ड ट्रंप ने विधेयक पर हस्ताक्षर करने के बाद कहा कि अब अंतरिक्ष में काफी कुछ होने वाला है, क्योंकि वह अब दुनिया का सबसे नया युद्धक्षेत्र बनने जा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने फैसले का बचाव करते हुए यह भी कहा, ‘राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अंतरिक्ष में अमेरिका की श्रेष्ठता साबित करना बेहद जरूरी है. हम काफी आगे हैं, लेकिन (रूस और चीन के खतरे से निपटने के लिए) यह काफी नहीं है. बहुत जल्द हम इस क्षेत्र में बहुत आगे निकल जाएंगे.’

डोनाल्ड ट्रंप ने यह फैसला क्यों लिया

बीते साल जब ‘स्पेस फोर्स’ बनाने की बात चली तो अमेरिकी रक्षा विभाग के कई अधिकारी इसके लिए तैयार नहीं थे. इनका कहना था कि पेंटागन के ऊपर वैसे भी काम का बहुत ज्यादा बोझ है इसलिए इस नई शाखा को संभालना अभी सम्भव नहीं है. वायु सेना को यह लग रहा था कि कहीं ‘स्पेस फोर्स’ बनने के बाद उसकी आजादी कम न कर दी जाए.

डोनाल्ड ट्रंप के सामने यह चुनौती तो थी, लेकिन एक बात, जो उनके पक्ष में थी वह यह कि अमेरिकी सांसद इस फैसले में उनके साथ थे. बीते दिसंबर में न केवल यह विधेयक सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी के वर्चस्व वाले अमेरिकी सीनेट में 86-8 के अंतर से पारित हुआ, बल्कि डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुमत वाले संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा में भी इसे 48 के मुकाबले 377 वोट मिले. अमेरिकी सांसदों का कहना था कि उन्हें भी लगता है कि चीन और रूस की अंतिरक्ष में बढ़ती गतिविधियों को रोकने के लिए ‘स्पेस फोर्स’ बनाना जरूरी है.

2019 के मध्य में अमेरिका की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीईए) ने एक रिपोर्ट जारी की थी. इसमें कहा गया कि चीन और रूस ने अंतरिक्ष में खुफिया, जासूसी और सैन्य परीक्षण करने लायक सक्षम तकनीक विकसित कर ली है. उनके पास एंटी-सैटेलाइट मिसाइल के अलावा हवा में लेजर से हमला करने की भी क्षमता है. रिपोर्ट में कहा गया था कि अमेरिका के पास इस वक्त सैकड़ों सैन्य सैटेलाइट हैं, जिनकी सुरक्षा के लिए कोई खास इंतजाम नहीं हैं. यही नहीं, रूस-चीन के अलावा ईरान और उत्तर कोरिया भी धीरे-धीरे अंतरिक्ष में अपनी पहुंच बना रहे हैं.

बीते साल तत्कालीन अमेरिकी इंटेलिजेंस प्रमुख डैन कोट्स ने अमेरिकी संसद को चीन द्वारा अत्याधुनिक एंटी-सेटेलाइट तकनीक (एएसएटी) का सफल निर्माण कर लेने की जानकारी दी थी. उनका कहना था कि इस तकनीक से वह कभी भी किसी भी सेटेलाइट को नष्ट कर सकता है.

अमेरिकी थिंक टैंक ‘न्यू अमेरिका’ से जुड़े विदेश मामलों के विशेषज्ञ पीटर सिंगर एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘चीन की यह नयी तकनीक युद्ध के समय गेम चेंजर साबित हो सकती है. इससे युद्ध के परिणामों को तेजी से अपनी ओर मोड़ा जा सकता है.’ पीटर इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, ‘आज अमेरिकी सेना संचार, समन्वय, नेविगेशन और निगरानी सहित हर सैन्य गतिविधि में सेटेलाइट तकनीक पर ही निर्भर है. यही नहीं, नागरिक मामलों में भी अब अमेरिका की निर्भरता सेटेलाइट तकनीक पर काफी ज्यादा बढ़ चुकी है.’ वे आगे कहते हैं कि अब अगर ऐसे में युद्ध के समय चीन अपने एंटी-सेटेलाइट हथियारों से अमेरिकी सेटेलाइटों को नष्ट कर देगा तो जाहिर है कि अमेरिका के लिए उससे मुकाबला करना मुश्किल हो जाएगा. क्योंकि ऐसा होने पर अमेरिका तकनीक के मामले में दशकों पीछे पहुंच जाएगा.

अपने इस साक्षात्कार में पीटर एक और बात भी बताते हैं, ‘चीन और रुस भी सेटेलाइट सिस्टम पर निर्भर हैं. लेकिन, अमेरिका की सेटेलाइट निर्भरता उनसे कहीं ज्यादा है. चीन और रूस अभी भी अपने पुराने जेट, टैंक और नौकाओं में एनालॉग सिस्टम का उपयोग करते हैं जिनका सेटेलाइट तकनीक के बिना ही बेहतर संचालन किया जा सकता है.’

कुछ अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने अमेरिकी संसद को यह भी बताया है कि एंटी-सेटेलाइट तकनीक तो चीन की एक बड़ी योजना का छोटा सा हिस्सा मात्र है. इनके मुताबिक करीब एक दशक से अंतरिक्ष पर विशेष ध्यान दे रहे चीन ने 2015 में ‘स्ट्रेटजिक सपोर्ट फोर्स’ का गठन किया है जिसका मकसद युद्ध के लिए अंतिरक्ष, साइबर और इलक्ट्रॉनिक माध्यमों को मजबूत करना है.

बीते सालों में रूस पर भी कई बार पश्चिमी देशों के सैन्य सेटेलाइटों की जासूसी के आरोप लगे हैं. बीते साल सिंतबर में फ्रांस की रक्षा मंत्री फ्लोरेंस पार्ली ने खुलासा किया था कि रूस के जासूसी सेटेलाइट लुक-ओलिम्प ने 2017 में एक फ्रेंच सेटेलाइट के सिग्नल में ताक-झांक करने की कोशिश की थी. फ्लोरेंस ने बताया था कि फ्रांस अपने मित्र देशों के साथ इसी सैटेलाइट के जरिए खुफिया सूचनाएं साझा करता है. लुक-ओलिम्प को लेकर कई और देश भी यह शिकायत कर चुके हैं. अमेरिकी अधिकारी अक्सर इस रूसी सेटेलाइट के अमेरिकी इंटेलसैट सैटेलाइट्स के करीब आने का दावा करते रहे हैं. अमेरिकी इंटेलसैट सेटेलाइट सैन्य और ड्रोन मिशनों के लिए काम करता है. हालांकि, इन आरोपों के जवाब में रूस हर बार यही कहता है कि लुक-ओलिम्प सेटेलाइट में कम्युनिकेशन की दिक्कत आने की वजह से वह अन्य देशों के सेटेलाइटों के करीब पहुंच जाता है.

एक नयी रेस की शुरुआत

डोनाल्ड ट्रंप के स्पेस फोर्स बनाने के फैसले ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है. अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों की मानें तो इस फैसले के बाद अंतरिक्ष में अब ज्यादा दिन तक शांति नहीं रहने वाली. इनके मुताबिक अब रूस, चीन, अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच एक नई तरह की रेस शुरू हो जायेगी जिसका मकसद अंतरिक्ष में अपना-अपना प्रभुत्व बढ़ाना होगा. इन लोगों के मुताबिक चीन और रूस दोनों ही जानते हैं कि अमेरिका की इस ‘स्पेस फोर्स’ का लक्ष्य जमीन से लेकर अंतरिक्ष तक केवल उन्हें ही रोकना है और ऐसे में साफ़ है कि ये दोनों किसी भी सूरत में अमेरिका को अंतरिक्ष में एकछत्र राज नहीं करने देंगे.

बीते साल अमेरिका से स्पेस फोर्स बनाने जैसी खबरें आने के बाद कई और देशों ने भी अंतरिक्ष में सैन्य गतिविधियां बढ़ाने के प्रयास तेज कर दिए हैं. बीते जुलाई में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ‘स्पेस डिफेंस कमांड’ शुरू करने का ऐलान किया था. उनका कहना था कि 2020 में सेना की यह नयी शाखा काम करने लगेगी और इसका मकसद फ्रांस के सेटेलाइटों को बेहतर सुरक्षा देना और अंतरिक्ष में अपनी स्थिति को और मजबूत करना होगा.

भारत ने भी इसी साल एंटी सेटेलाइट मिसाइल ए-सैट के जरिए सैटेलाइट को मार गिराने की क्षमता हासिल कर ली थी. इसे ‘मिशन शक्ति’ नाम दिया गया था. इसमें भारत ने पृथ्वी से करीब 300 किलोमीटर दूर स्थित एक उपग्रह को मार गिराया था.

कुछ जानकार यह भी कहते हैं कि रूस और चीन अभी तक अंतरिक्ष में अपनी सैन्य गतिविधियां दबे पांव चला रहे थे. लेकिन ट्रंप के इस फैसले के बाद केवल इन्हें ही नहीं, पूरी दुनिया को वहां ऐसी गतिविधियों के लिए खुली छूट मिल गयी है. साथ ही जिन देशों ने अभी तक सैन्य मामले में अंतरिक्ष की ओर ध्यान ही नहीं दिया था, अब वे भी अपनी सुरक्षा के लिए इस ओर देखेंगे. अगर, साफ़ शब्दों में कहें तो अमेरिका ने ‘स्पेस फोर्स’ के जरिये अंतरिक्ष में भी जंग की आधारशिला रख दी है.

अंतरिक्ष को सैन्य गतिविधियों से बचाने के लिए यूएन की ‘आउटर स्पेस-संधि’ क्या है?

संयुक्त राष्ट्र संघ में 1967 में 100 से ज्यादा देशों के बीच ‘आउटर स्पेस-संधि’ हुई थी. इस संधि का मकसद अंतरिक्ष को सैन्य गतिविधियों से दूर रखना था. इसके अनुच्छेद-4 में लिखा है कि संधि के सदस्य देश अन्य ग्रहों, अंतरिक्ष स्टेशनों या खगोलीय पिंडों का इस्तेमाल केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही कर सकते हैं. इसमें यह भी कहा गया है कि सदस्य देश परमाणु हथियार या सामूहिक विनाश के अन्य हथियारों को अंतरिक्ष में तैनात नहीं कर सकते. ‘आउटर स्पेस-संधि’ के तहत कोई भी देश अंतरिक्ष में सैन्य अड्डे की स्थापना और हथियारों का परीक्षण भी नहीं कर सकता है.

जानकारों की मानें तो अमेरिका और फ्रांस द्वारा अंतरिक्ष के लिए सैन्य बल बनाने की घोषणा के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि ‘आउटर स्पेस-संधि’ अब बीते समय की बात हो चुकी है.