दिल्ली के आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र आम आदमी पार्टी (आप) ने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश कर दिया है. यह काफी हद तक उस घोषणा पत्र से मिलता-जुलता नज़र आता है जिसे आम आदमी पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनाव से पहले जारी किया था. दूसरे शब्दों में कहें तो आप इसके जरिये यह कहना चाहती है कि उसने अपने ज्यादातर वायदों को पूरा किया है और इसलिए उसे दिल्ली का सत्ता का एक और मौका मिलना चाहिए.

दिल्ली में कई लोग ऐसे हैं जो आम आदमी पार्टी के रिपोर्ट कार्ड से एक हद तक सहमत हैं. लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो आम आदमी पार्टी से खासे निराश नज़र आते हैं. ये वे लोग हैं जिन्होंने इस पार्टी से दूषित हो चुकी परंपरागत राजनीति के तौर-तरीकों को बदल देने की उम्मीद पाली थी. लेकिन अब उन्हें लगता है कि एक ऐतिहासिक जनांदोलन की परिणति के तौर पर उभरी आप भी उसी रंग-ढंग में ढल चुकी है जिसमें कि देश के बाकी राजनैतिक दल ढले हुए हैं.

ताजा मामला चर्चित चुनावी रणनीतिकार और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर से जुड़ा है. हाल ही में आप संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा चुनाव के लिए प्रशांत किशोर की प्रचार कंपनी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आई-पैक) से हाथ मिलाया है. प्रशांत इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनावों में (प्रधानमंत्री) नरेंद्र मोदी को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. बाद में उन्होंने नीतीश कुमार, कांग्रेस और जगन मोहन रेड्डी के लिए भी काम किया. आई-पैक पश्चिम बंगाल के अगले विधानसभा चुनाव के लिए वहां की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस के साथ मिलकर भीे काम कर रही है.

प्रशांत किशोर ने आम आदमी पार्टी के लिए 'अच्छे बीते पांच साल, लगे रहो केजरीवाल' नारा गढ़ा है

प्रशांत किशोर को साथ लेने से कई विश्लेषकों को इसलिए ऐतराज़ है क्योंकि उनका काम एक इवेंट मैनेजर के जैसा है. माना जाता है कि वे किसी राजनेता या उसकी पार्टी के लिए इस तरह चुनावी कैंपेन तैयार करते हैं कि उसकी चकाचौंध और शोर-शराबे में असल मुद्दे कहीं गौण से हो जाते हैं. यह बात आम आदमी पार्टी और उसके मुखिया अरविंद केजरीवाल भी अच्छी तरह से जानते हैं. बल्कि प्रशांत किशोर की इसी खासियत की वजह से उन्हें चुना गया है.

उदाहरण, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले आयोजित कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की ‘खाट-सभाओं’ को शायद ही कोई भूला हो! लेकिन यह बता पाने में अधिकतर लोग नाकाम हो जाते हैं कि उन सभाओं में राहुल गांधी ने किन बातों को प्रमुखता से उठाया था या फ़िर कांग्रेस तब किन मुद्दों के आधार पर अपनी खोई ज़मीन तलाश रही थी.

अब अरविंद केजरीवाल द्वारा प्रशांत किशोर को साथ लेने पर एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘केजरीवाल एक ऐसे नायक सरीखे थे जिसने लोकतंत्र को सच्चे अर्थों में उसकी गरिमा लौटाई थी. जब धनबल और बाहुबल के सहारे परिणामवादी संसदीय राजनीति को लोकतंत्र का पर्याय बनाने की कोशिश हो रही थी, जब समाज को बांटने वाली राजनीति पूरी निरंकुशता के साथ आगे बढ़ रही थी, तब केजरीवाल ने कमज़ोर, बेदखल, विस्थापित और लाचार लोगों के स्वस्फूर्त कैंपेन की बदौलत एक बैलेट क्रांति कर डाली. तब आम आदमी पार्टी के दृष्टिकोण से ईमानदारी झलकती थी. लेकिन एक आर्टिफिशियल कैंपेन का सहारा लेने का मतलब है कि आप अब वह नैतिक आधार खो चुकी है.’

लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब आप के तौर-तरीकों से भारत में मौजूद अन्य राजनैतिक दलों की झलक दिखी हो. दरअसल इसकी शुरुआत 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद से ही हो गई थी. तब 70 में से 28 सीटें हासिल कर आम आदमी पार्टी ने उसी कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली थी जिसे कोस-कोसकर उसके प्रमुख नेताओं ने राजनैतिक गलियारों में अपनी पहचान स्थापित की थी.

फ़िर इसके 49 दिन बाद ही जन लोकपाल विधेयक के प्रस्ताव को समर्थन न मिल पाने के कारण अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया. उनके इस फैसले के चलते मीडिया से लेकर राजनैतिक गलियारों में उन्हें अनुभवहीन और भगोड़ा तक कहा गया. लेकिन दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी का साथ नहीं छोड़ा और 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में पार्टी ने 67 सीटों पर जीत का परचम लहराकर इतिहास रच दिया.

लेकिन इस दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही पार्टी में अंदरखाने अरविंद केजरीवाल पर अलोकतांत्रिक और तानाशाह होने के आरोप लगने लगे. इसकी शुरुआत आप की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य रहीं शाज़िया इल्मी ने की थी. उन्होंने जल्द ही पार्टी भी छोड़ दी. ये कुछ वैसे ही आरोप थे जिन्हें आप के बाकी नेताओं की तरह अरविंद केजरीवाल भी देश के मौजूदा राजनैतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व पर जोर-शोर से लगाया करते थे.

फ़िर, आप समर्थकों को बड़ा झटका मार्च-2015 में तब लगा जब पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के साथ प्रोफेसर आनंद कुमार तथा अजीत झा जैसे सदस्यों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने न सिर्फ़ इसे लोकतंत्र की हत्या क़रार दिया बल्कि पार्टी के दूसरे धड़े पर अपने समर्थक सदस्यों से मारपीट करने का भी आरोप लगाया. आदर्शवादी समझे जाने वाले इन दो संस्थापक नेताओं को निकाले जाने से आम आदमी पार्टी की छवि को बड़ा बट्टा लगा था.

इसके कुछ ही दिन बाद पार्टी के पूर्व विधायक राजेश गर्ग ने भी एक ऑडियो क्लिप जारी कर अरविंद केजरीवाल को कटघरे में ला खड़ा किया. दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले के इस टेप में केजरीवाल कथित तौर पर गर्ग से कांग्रेस विधायकों के साथ संपर्क साधने और अलग गुट बना कर आम आदमी पार्टी को समर्थन देने की बात करते सुनाई दिए थे.

इस टेप के आने के बाद आप की महाराष्ट्र इकाई का चेहरा रहीं अंजलि दमानिया ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया. इसी तर्ज पर शांति भूषण, मयंक गांधी, कैप्टन गोपीनाथ और कपिल मिश्रा जैसे प्रमुख नेता भी आम आदमी पार्टी से दूर होते गए. इन सभी ने भी केजरीवाल पर टिकट बंटवारों में मनमानी करने, ईमानदारी की राजनीति से पीछे हटने, कार्यकर्ताओं का इस्तेमाल करके उन्हें छोड़ देने और पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को ख़त्म करने जैसे इल्ज़ाम लगाए.

अपने इस कार्यकाल में अरविंद केजरीवाल पर मौकापरस्त राजनेता होने के आरोप भी जमकर लगे. ऐसा खास तौर पर तब हुआ जब उनके दिल्ली छोड़कर पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की चर्चाओं ने जोर पकड़ा था. लेकिन तब आम आदमी पार्टी अपने प्रमुख गढ़ पंजाब में कुछ खास प्रदर्शन करने में बुरी तरह नाकाम हुई. इसके कई कारणों में से एक यह भी माना जाता है कि पंजाब में चुनाव जीतने के लिए आप खालिस्तान समर्थकों और कट्टरपंथियों का समर्थन लेने लगी थी.

इसके अलावा आप शीर्ष नेतृत्व ने पंजाब में संगठन की कमान अपने प्रमुख नेताओं में से किसी को सौंपने के बजाय कांग्रेस से आए उन सुचा सिंह छोटेपुर को दे दी जिनकी छवि प्रदेश में दल-बदलू नेता के तौर पर स्थापित थी. इस पर आप से निलंबित हुए पूर्व सांसद हरिंदर सिंह खालसा ने भरे मंच से पार्टी हाईकमान पर धन के बदले जिम्मेदारियों की बंदरबांट करने का आरोप लगाया. इससे पंजाब में आम आदमी पार्टी का बड़ा समर्थक वर्ग जिसमें खास तौर पर युवा शामिल थे, उससे बिदक गया.

वहीं दिल्ली में आम आदमी पार्टी पर दूसरे राजनैतिक दलों की तरह मीडिया मैनेज करने के आरोपों ने भी ख़ूब सुर्खियां बटोरी थीं. कहा जाता है कि आप ने हिंदी-अंग्रेजी के सभी मुख्य अखबारों और चैनलों के वरिष्ठ पत्रकारों को विभिन्न सरकारी समितियों में नियुक्त करने के साथ-साथ विभिन्ना मीडिया घरानों को करोड़ों रुपए के विज्ञापन देने जैसे हथकंडे भी अपनाए ताकि वह अपने ख़िलाफ़ चलने वाली ख़बरों को प्रभावित कर सके.

2017-18 में दिल्ली सरकार ने सूचना और प्रचार के लिए 198 करोड़ रुपए आवंटित किए थे जबकि 2018-19 के लिए यह बजट बढ़ाकर 257.42 करोड़ रुपये कर दिया गया. बीते पांच साल में आम आदमी पार्टी ने भी अन्य क्षेत्रीय-राष्ट्रीय क्षत्रपों की तरह अपने प्रमुख अरविंद केजरीवाल को ब्रांड बनाया और उनकी तस्वीरों से दिल्ली शहर को पाटे रखा. वहीं, दूसरी तरफ़ अरविंद केजरीवाल अपने एक इंटरव्यू में एक पत्रकार पर सिर्फ़ इसलिए भड़क गए क्योंकि उसने नोटबंदी की वजह से 55 लोगों की मौत हो जाने के उनके आरोपों की पुष्टि करने से इन्कार कर दिया था.

अपने कार्यकाल में अरविंद केजरीवाल ने कई बार अपने विरोधियों पर पहले तो बेबुनियाद आरोप लगाए, फ़िर बाद में इसके लिए बिना शर्त माफी मांगकर अपनी और पार्टी की फ़ज़ीहत भी करवाई. इसके उदाहरण के तौर पर शिरोमणि अकाली दल के नेता बिक्रम मजीठिया, भाजपा के अरुण जेटली, नितिन गडकरी और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल से जुड़े मामलों को याद किया जा सकता है. जानकारों के मुताबिक इन घटनाओं ने उन लोगों को केजरीवाल से दूर करने में बड़ी भूमिका निभाई जो बतौर राजनेता उनसे जिम्मेदारी भरे आचरण और उस पर टिके रहने की उम्मीद रखते थे.

इसके अलावा अरविंद केजरीवाल द्वारा अपनी हर नाकामी के लिए बार-बार दिल्ली के उपराज्यपाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराने, या कहें कि उनके एक मजबूत विकल्प की बजाय शिकायतों की पोटली बन जाने ने भी कई लोगों को खिजाने का काम किया. यह कुछ वैसा ही था जैसा कि भाजपा कांग्रेस या देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को लेकर करती रही है.

आम आदमी पार्टी के अन्य राजनैतिक दलों की क़तार में खड़े होने में जो कसर बाकी रही थी वह बीते साल राज्यसभा चुनाव ने पूरी कर दी. तब आप हाईकमान ने दिल्ली की तीन में से दो राज्यसभा सीटों पर कांग्रेस छोड़कर आए नारायण दास गुप्ता और सुशील गुप्ता को अपना उम्मीदवार बना दिया. जबकि इन सीटों पर कुमार विश्वास, मीरा सान्याल और आशुतोष जैसे आप के नेताओं की दावेदारी शुरुआत से ही तय मानी जा रही थी. इसके बाद से कुमार विश्वास खुलकर अरविंद केजरीवाल के विरोध में आ गए.

शायद आम आदमी पार्टी पर से लोगों का घटता हुआ भरोसा ही था कि पहले राजौरी गार्डन की विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव और फ़िर नगर निगम चुनावों में कमजोर प्रदर्शन के बाद पार्टी पिछले लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सात में से पांच सीटों पर तीसरे पायदान पर फिसल गई. जबकि 2014 के चुनाव में आप प्रदेश के सभी लोकसभा क्षेत्रों में दूसरे स्थान पर रही थी.

गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में आप को दिल्ली में 33 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि इस बार यह आंकड़ा सिर्फ़ 18 प्रतिशत पर ही सिमट गया. कुछ-कुछ ऐसा ही हाल पंजाब का भी था जहां 2014 में जबरदस्त मोदी लहर के बावजूद आम आदमी पार्टी 19 में से चार सीटें जीतने में सफल रही थी. इस बार वहां पार्टी को सिर्फ एक ही सीट पर जीत हासिल हो सकी.

हालांकि इस सब के बाद भी दिल्ली में ऐसे मतदाताओं की कमी नहीं जिनका भरोसा आम आदमी पार्टी में पहले की तरह कायम है. इसमें अरविंद केजरीवाल के बदले अंदाज ने भी बड़ी भूमिका निभाई है. उन्होंने बीते कुछ महीनों के दौरान फिज़ूल के विवादों में उलझे बिना जनहित से जुड़ी योजनाओं को अमली जामा पहनाने की दिशा में काफी काम किया है.

इसे देखते हुए दिल्ली में आम आदमी पार्टी के समर्थक जिस बात को जोर देकर कहते हैं, उसका लब्बोलुआब यह है - अंदरखाने आप में जो कुछ हुआ वह उसका निजी मसला था. राजनीति में टिके रहने के लिए मजबूरन कई तरह के दांव-पेंच अपनाने पड़ते हैं. लेकिन यह बात नज़रअंदाज नहीं की जा सकती कि आप देश की इकलौती ऐसी पार्टी है जो लगातार दूसरी बार शिक्षा, स्वास्थ्य, सस्ती बिजली, सस्ते पानी और सुरक्षित शहर जैसे बुनियादी मुद्दों पर चुनाव लड़ने जा रही है. इसके लिए अरविंद केजरीवाल निश्चित तौर पर साधुवाद के पात्र हैं, क्योंकि भारत की सड़ चुकी राजनीतिक व्यवस्था के बीच ऐसा कर पाना आज भी कोई आम बात नहीं है.

अच्छा होता कि प्रशांत किशोर के बजाय अरविंद केजरीवाल अपने काम और दिल्ली के मतदाताओं पर ज्यादा भरोसा कर पाते.