निर्देशक: रमेश सिप्पी
कलाकार: राजकुमार राव, रकुल प्रीत सिंह, हेमा मालिनी, शक्ति कपूर, कंवलजीत
रेटिंग: 2/5

‘शोले’ नाम के सिनेमैटिक मास्टरपीस को रिलीज हुए करीब साढ़े चार दशक होने को आ रहे हैं. इतने वक्त में इस फिल्म पर न जाने कितनी किताबें लिखी जा चुकी हैं और कितने ही समाजशास्त्रीय अध्ययन हो चुके हैं. इस फिल्म के कद का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जब मशहूर अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने इसकी आलोचना की तो इसकी कामयाबी को पूरे-पूरे हिंदी सिनेमा की नाकामयाबी बता दिया. इन सबके बावजूद, इसे चाहने और पसंद करने वाले अपने रुख पर कायम हैं. लोकप्रियता के चरम तक पहुंचने वाली इस फिल्म का निर्देशन रमेश सिप्पी ने किया था.

लेकिन बॉलीवुड के बारे में कहा जाता है कि यहां एक शुक्रवार में ही तकदीरें बदल जाती हैं. शायद इसीलिए जब एक लंबे वक्त बाद रमेश सिप्पी ने वापसी करनी चाही तो उनकी फिल्म को वितरक मिलने में पांच साल से ज्यादा का वक्त लग गया. यही वजह रही कि 2014-15 में बनकर तैयार हुई ‘शिमला मिर्ची’ अब रिलीज हो सकी है. खैर, अब जब 25 साल बाद सिप्पी साहब की कोई फिल्म दर्शकों तक पहुंच रही है तो इसे एक खास मौका ही माना जाना चाहिए.

‘शिमला मिर्ची’ की कहानी पर आएं तो यह रॉम-कॉम का वही फॉर्मूला अपनाती है जो 60-70 के दशक में खासा पॉपुलर रहा था. यह फॉर्मूला अक्सर हिलस्टेशन पहुंचे सैलानी नायक और लोकल नायिका की प्रेमकथा रचाया करता था. ‘शिमला मिर्ची’ में खास यह है कि यह एक त्रिकोणीय प्रेमकथा है. इसमें तीसरे सिरे पर हिरोइन की मां का खड़ा होना, इसे और भी दिलचस्प बना देता है. इस ट्विस्ट के सहारे फिल्म थोड़ा कन्फ्यूजन, थोड़ा रोमांस और थोड़ी कॉमेडी लेकर आगे बढ़ती है. सब थोड़ा-थोड़ा इसलिए कि फिल्म में शामिल किए गए ज्यादातर मसाले पुरानेपन की महक लिए हुए हैं. फिर चाहे वह अंग्रेजों के जमाने की कोठियां हों, कहानी में आए ट्विस्ट हों या संवाद बोलने का तरीका. दूसरे शब्दों में कहें तो यह फिल्म, पहले कहानी के बासीपन और फिर ट्रीटमेंट के सतहीकरण के चलते, एक चुटीले विचार वाले सिनेमा की संभावना को खत्म कर देती है.

अभिनय की बात करें तो यह फिल्म राजकुमार राव के शुरूआती कामों में से एक है. ‘शिमला मिर्ची’ अगर वक्त पर रिलीज होती तो शायद उनकी पहली ऐसी मेनस्ट्रीम फिल्म कही जाती जिसमें उन्हें एक फुल-लेंथ रोल मिला था. राव के करियर के लिहाज से देखें तो फिल्म की रिलीज में हुई देरी उनके लिए फायदेमंद ही रही. नहीं तो, इस तरह की फिल्में करने के बाद, उन्हें टाइपकास्ट होने और फिर भीड़ में गुम होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता. उनके अभिनय पर लौटें तो यहां पर भी वे काम तो बढ़िया ही करते हैं लेकिन रूमानी दृश्यों में उनकी असहजता साफ दिखाई दे जाती है. ऐसा ही कुछ फिल्म की नायिका रकुल प्रीत सिंह के बारे में भी कहा जा सकता है. रूमानी दृश्यों के अलावा, कई बार खुश या दुखी होते हुए भी वे बनावटी लगती है. मतलब यह कि अपनी सुंदरता और मासूमियत से खुद पर नज़रें टिकाने को मजबूर करने वाली रकुल प्रीत का काम भी ‘शिमला मिर्ची’ में ठीक-ठाक वाली श्रेणी में ही ठहरता है.

अगर ‘शिमला मिर्ची’ की सबसे मजबूत कड़ी हेमा मालिनी हैं तो उसकी सबसे कमजोर कड़ी उनके द्वारा निभाया गया किरदार रुक्मिणी है. रुक्मिणी और बाकी किरदारों के बीच समीकरण स्थापित करने के लिए रखे गए दृश्य काफी आधे-अधूरे से हैं. सही डिटेलिंग न मिलने के चलते, जीवन में अकेलेपन से जूझ रही एक संवेदनशील महिला हमें सनकी नज़र आती है. हालांकि हेमा मालिनी के सधे हुए अभिनय के चलते यह किरदार बहुत हद तक संभल जाता है लेकिन लिखाई की ढिलाई खटकती रहती है.

फिल्म के बाकी पक्षों की बात करें तो सुरीले संगीत के बावजूद गानों का जब-तब आ जाना आपके गले नहीं उतर पाता है. इनमें से कुछ ड्रीम सीक्वेंस हैं जिनकी प्लेसिंग के साथ-साथ उन्हें फिल्माने का तरीका भी बिल्कुल आउटडेटेड लगता है. इसके अलावा भी सिनेमैटोग्राफी में कई खामियां नज़र आती हैं. उदाहरण के लिए कई जगह ऐसा लगता है मानो नाक को बिलकुल छूते हुए क्लोजअप शॉट्स लिए गए हैं. वहीं कई इंडोर दृश्यों में डगमग होते कैमरे ने उनकी सुंदरता खराब की है. संवादों की बात करें तो इन्हें औसत कहा जा सकता है. लेकिन इनमें से कुछ अपने चुटीलेपन के कारण ठहाकों की वजह भी बनते हैं. कुल मिलाकर, इस शिमला मिर्ची में अनोखे विचार की महक तो है लेकिन मनोरंजन का चटपटापन नहीं आ पाया है यानी यह भी सिर्फ नाम की मिर्च है!