दशकों पहले उत्तर प्रदेश के बनारस में रहने वाले कवि धूमिल ने लिखा था - ‘इस क़दर कायर हूं कि उत्तर प्रदेश हूं.’ अब उत्तर प्रदेश में जो हो रहा है उसे हिसाब में लेते हुए इस पंक्ति को यों बदला जा सकता है - ‘इस क़दर बर्बर हूं कि उत्तर प्रदेश हूं.’ खुलेआम पुलिस द्वारा, राजनीति के निर्देश पर, सामान्य नागरिकों पर, धर्मांध और सांप्रदायिक होकर, जो अत्याचार किये जा रहे हैं उनके लिए बर्बरता संज्ञा भी अपर्याप्त लगती है. एक राज्य अपने नागरिकों के विरुद्ध इस तरह सशस्त्र-सक्रिय हो सकता है यह हमारे अपने लोकतंत्र में अभूतपूर्व है.

यह एक ऐसे राजनेता के शासन में हो रहा है जो अपने को योगी कहता है. सौभाग्य से मैं उत्तर प्रदेश का नहीं हूं. अन्यथा मुझे वहां का नागरिक होने और लेखक होने पर शर्म आती. मुझे पता है कि उत्तर प्रदेश के लेखक और बुद्धिजीवी बड़ी संख्या में हिंसा-हत्या-बलात्कार-बर्बरता-अनाचार-अत्याचार की प्रवृत्तियों के विरोध में हैं जिनसे आज भारत का यह सबसे बड़ा और अभागा प्रदेश अब जाना जाता है. इसके बावजूद आज उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य की उजली परंपरा के साथ विश्वासघात कर रहा है. जबकि वह कबीर-तुलसी-सूरदास, निराला-प्रेमचन्द-महादेवी, शमशेर-साही-रघुवंश, रामविलास शर्मा-रघुवीर सहाय, कुंवरनारायण-नामवर सिंह, धूमिल-कमलेश-मलयज आदि का प्रदेश रहा है.

कल जब कई हिंदी लेखकों को कृतज्ञ भाव से योगी मुख्यमंत्री के हाथों पुरस्कार पाते देखा तो अच्छा नहीं लगा, न ही उन लेखकों को बधाई देने का मन हुआ. ऐसी सत्ता को लेखक इस तरह वैधता दें यह लेखक के नागरिक कर्तव्य से विमुख होना है. बरसों पहले मैंने पहले स्वीकार कर भारत भारती पुरस्कार लेने से इसलिए इनकार किया था कि बाद में पता चला कि लगभग सत्तर लेखकों को विभिन्न पुरस्कार देना तब की मुख्यमंत्री ने बिला वजह अस्वीकार कर दिया था. जबकि उनका चयन और मनोनयन बाक़ायदा गठित जूरी ने किया था.

हमारे लेखक बंधुओं का चयन निर्धारित प्रक्रिया और प्रतिमानों के आधार पर किया गया होगा और उस पर आपत्ति उठाने का कोई कारण नहीं है. पर पुरस्कृत लेखक कुछ प्रतिरोध दिखाते यह उनकी नागरिकता और बुद्धिजीवी होने का तकाज़ा था. पुरस्कार पाकर वे बड़े लेखक नहीं हो जायेंगे और उसे अस्वीकार कर वे छोटे नहीं होते. पर शायद उनका क़द, नैतिक आयाम में, कुछ ऊंचा ही हो जाता. बहरहाल, ऐसा नहीं हुआ यह खेदजनक है. जब देश भर में, और उत्तर प्रदेश में युवा व्यापक रूप से नागरिकता के मुद्दे पर विरोध कर रहे हैं, और उन पर साम्प्रदायिक बर्बरता की जा रही है तब लेखक अपने नागरिक अन्तःकरण को न जगाये यह दुखद है. इसी उत्तर प्रदेश में जन्मे-बढ़े कवि रघुवीर सहाय ने कभी तिलमिलाकर पूछा था - ‘क्या लेखक हत्यारों के साझीदार हुए?’ दुर्भाग्य यह है कि आज की सच्चाई ऐसे ही दुखों, प्रतिरोधों और बर्बरता से बनी है.

नागरिकता की परीक्षा

दशकों पहले मेरी अवधारणा थी कि कविता पर्याप्त नागरिकता है. बदले सन्दर्भों में मैंने पिछले कुछ वर्षों में कहना शुरू किया कि कविता पर्याप्त नागरिकता नहीं है, कवि को अलग से कुछ नागरिक कर्तव्य निभाने चाहिये. हमारे हिंसक समय में उसे नागरिक अन्तःकरण बनकर सिर्फ़ लेखन में नहीं, सामाजिक सक्रियता में भी उभरना चाहिये.

इधर नागरिकता को लेकर एक व्यापक बहस शुरू हुई है. यह राज्य तय करनेवाला है कि कौन नागरिक है, कौन नहीं. उसे यह तय करने का हक़ क़ानूनन मिला हुआ है क्योंकि संसद ने ऐसा क़ानून पास किया है. मुझे अपनी या अपने बहुत सारे परिचितों और मित्रों की नागरिकता को लेकर कभी कोई उलझन नहीं रही है. अपनी नागरिकता हम स्वयंसिद्ध जन्मजात मानते रहे हैं. अब हमें उसके सुबूत में दस्तावेज़ पेश करने होंगे. मैंने तो पिछले दिनों अनावश्यक मानकर अपने कई सर्टिफ़िकेट कूड़े में फेंक दिये. अब उन्हें फिर से प्राप्त करना होगा जो बड़ी झंझट का काम है. यह विचित्र समय है जब सत्ता नागरिकों की ज़िन्दगी कठिन से कठिनतर बनाने पर तुली हुई है. जब हमारा यह हाल है तो उन करोड़ों का क्या होगा जो ग़रीब, साधनहीन हैं और जिनके पास ऐसे सबूत कभी नहीं रहे हैं हालांकि वे पूरे भारतीय नागरिक हैं?

इतना ही नहीं केंद्र सरकार के अनेक मंत्रियों ने परस्पर विरोधी बयान दिये हैं. एक कहता है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर लागू करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है जबकि दूसरा कहता है कि इसके लिए सिर्फ‌ नियमावली बनाना बाक़ी है. तीसरा कह रहा है कि किसी को भी अपनी भारतीय नागरिकता से वंचित नहीं किया जायेगा. तो फिर हज़ारों करोड़ों रुपये ख़र्च कर इतनी बेचैनी फैलाने, असुरक्षा की भावना फैलाने की ज़रूरत क्या? ज़ाहिर है कि वर्तमान सत्ता आर्थिक मोर्चे पर अपनी भयानक विफलता को छुपाने के लिए यह विकल्प अपना रही है. असली मुद्दा नागरिकता है ही नहीं, असली मुद्दा बेरोज़गारी, अर्थव्यवस्था में आयी मंदी है. उससे ध्यान हटाने के लिए वर्तमान सत्ता एक ग़ैर मुद्दे को केंद्र में लाकर ध्यान बंटा रही है.

एक उजला पक्ष यह है कि देश के विभिन्न भागों में युवाओं और छात्रों को यह चाल समझ में आ गयी है और वे एक अहिंसक स्वतःस्फूर्त आन्दोलन कर रहे हैं. आन्दोलन में स्त्रियों की पहल और भागीदारी बहुत उत्साहजनक है. उसे सत्ता बर्बरता की हद तक जाकर दबाने की कोशिश कर रही है. उन्हें हिन्दू-मुस्लिम में बांटने की कोशिश भी हो रही है. पर अब तक वह इस दुश्चक्र में सफल नहीं हुई है. विपक्ष के अनेक दल इस आन्दोलन का लाभ उठाने का कोशिश कर रहे हैं. लेकिन आन्दोलन में, जो देशव्यापी है, अभी तक किसी राजनैतिक दल या दलों का वर्चस्व नहीं हो पाया है. यह शुभ लक्षण है कि राजनैतिक दलों के परे भी परिवर्तनकारी राजनीति सम्भव है. नये वर्ष के पहले सप्ताहांत पर यह उम्मीद काफ़ी है.

कालछाया

अभी दो दिनों पहले हम देवीप्रसाद त्रिपाठी के घर गये थे, उन्हें देखने, वे कष्ट में थे और कई दिनों अस्पताल में रहकर घर लौटे थे. मेरे यह कहने पर कि इस समय जो हो रहा है उसमें आपका सक्रिय होना ज़रूरी है, वे बोले बस दो दिन और. पर दो दिन बाद ही वे चल बसे. कैंसर से वे बहुत जीवट और हिम्मत से लम्बे समय तक लड़ते रहे पर उनकी जिजीविषा कभी मंद नहीं हुई.

उनसे पहले-पहल परिचय इलाहाबाद में हुआ था, वे वहां राजनीति शास्त्र के अध्यापक थे. उनकी साहित्य और कलाओं में रूचि और गति असाधारण थी. उनकी स्मृति अत्यन्त तीक्ष्ण और सक्रिय थी. वे कालिदास, मार्क्स, गांधी, लोहिया आदि को एक साथ समान अधिकार से उद्धृत कर सकते थे. शास्त्र से वे सीधे राजनीति में जब आये तो भी उनका लेखकों-कलाकारों-बुद्धिजीवियों-अकादेमिकों से संवाद और सम्पर्क कभी शिथिल नहीं हुआ. उनका घर, राज्यसभा सदस्य के रूप में उन्हें मिला बंगला एक ऐसा अनोखा अड्डा था जहां उनके निमंत्रण पर केन्द्रीय मंत्रियों, राजनेताओं आदि का लेखकों-कलाकारों-विद्वानों आदि से सामान्य और लगातार संवाद होता था. दिल्ली में रहते मुझे 25 से अधिक बरस हो गये पर डीपीटी के अलावा कभी रामकृष्ण हेगड़े के यहां ऐसी महफ़िलें जुड़ती थीं, और कहीं नहीं.

त्रिपाठी जी बहुत मददगार व्यक्ति थे. मदद करने की कोई न कोई राह वे निकाल ही लेते थे. उनसे मदद चाहने वालों की संख्या से मदद पाने वालों की संख्या बहुत कम नहीं थी. उन्हें विचारों और सृजन की दुनिया में रहना-रमना पसन्द था. उन्होंने विचार न्यास गठित किया था और कई दशकों से अंग्रेज़ी में विचारों की एक सुसंपादित पत्रिका ‘थिंक इंडिया’ वे निकालते थे. इसी छह जनवरी को उनका, सत्तरवां जन्मदिन होना था. उनकी बीमारी के कारण उस अवसर के आयोजन को रद्द कर दिया गया था.

त्रिपाठी जी हिंदी और अंग्रेज़ी में धाराप्रवाह वक्ता थे. अकसर वे कवियों-बुद्धिजीवियों के लिए अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग करते थे पर राजनेताओं पर अतिशयोक्ति करते, कम-से-कम, मैंने नहीं सुना. बहुतों को उनका राज्यसभा से विदा लेते हुए दिया भाषण अपनी सघनता, बौद्धिक तत्व और प्रवाहमयता के लिए याद होगा.