बीते शुक्रवार को अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तब चरम पर पहुंच गया जब अमेरिकी सेना ने ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी को बगदाद हवाई अड्डे के बाहर एक रॉकेट हमले में मार दिया. कासिम सुलेमानी ईरान की सेना ‘रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर’ की ‘कुद्स’ इकाई के प्रमुख थे. रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की इस इकाई पर विदेशों में सैन्य अभियान चलाने की जिम्मेदारी रहती है. कुद्स बल लेबनान में हिजबुल्लाह और गाजा पट्टी में हमास के साथ मिल कर काम कर रहे हैं. यह भी कहा जाता है कि यमन में सऊदी विरोधी हूती विद्रोहियों की मदद भी कुद्स बल ही करते हैं. इन्हीं वजहों के चलते कासिम सुलेमानी अमेरिका को बहुत ज्यादा अखरते थे. इसके बाद ईरान ने भी इराक में अमेरिकी बलों की मौजूदगी वाले दो ठिकानों पर मिसाइल हमले करके जवाबी कार्रवाई की है.

बहरहाल, अमेरिका द्वारा कासिम सुलेमानी के मारे जाने के बाद पूरी दुनिया में तेल के दाम में उछाल आया है. इस हमले के कुछ ही घंटों बाद ब्रेंट क्रूड ऑइल 4.4 प्रतिशत बढ़कर 69.16 डॉलर प्रति बैरल, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड ऑइल 4.3 प्रतिशत उछलकर 63.84 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. हालांकि, बाद में इनकी कीमतों में कुछ कमी भी आई, लेकिन मंगलवार देर रात जब ईरान ने इराक स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर हमला किया तो एक बार फिर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गयीं.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब ईरान के साथ किसी देश का तनाव होने की वजह से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं. लेकिन अमेरिका ने ईरान के तेल और गैस पर प्रतिबंध लगा रखा है जिसके चलते वह इन चीजों का बिलकुल भी निर्यात नहीं कर पा रहा है. तो फिर अमेरिका के साथ उसके तनाव के चलते दुनिया भर में तेल के दाम क्यों बढ़ गए हैं?

दुनिया भर के जानकार इसकी सबसे बड़ी वजह ‘होर्मुज जल संधि’ क्षेत्र को बताते हैं. बेहद कम चौड़ाई वाला यह क्षेत्र मध्यपूर्व में स्थित फारस की खाड़ी से ओमान की खाड़ी को जोड़ता है. इसके एक तरफ ईरान और दूसरी तरफ सऊदी अरब और ओमान हैं. जब भी ईरान का अमेरिका या सऊदी अरब से टकराव बढ़ता है तो वह इस हिस्से को बंद करने की धमकी देता है. निवेशकों की मानें तो ऐसा होने पर दुनिया की कच्चे तेल की आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा बुरी तरह प्रभावित होगा.

‘होर्मुज जल संधि’ क्षेत्र दुनिया के लिए ऊर्जा की जीवन रेखा सरीखा

अगर, आंकड़ों पर नजर डालें तो ‘होर्मुज जल संधि’ क्षेत्र का महत्व समझ में आता है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के मुताबिक पूरी दुनिया में निर्यात होने वाले कुल कच्चे तेल का 40 से 46 फीसदी हिस्सा ‘होर्मुज जल संधि’ क्षेत्र से ही जाता है. आईईए के एक अध्ययन की मानें तो 2030 तक दुनिया भर में तेल की खपत में दो फीसदी तक की बढ़ोत्तरी होगी और तब दुनिया के कुल तेल निर्यात का दो-तिहाई हिस्सा होर्मुज जल क्षेत्र से ही होकर जाएगा. बीते साल आई अमेरिकी ऊर्जा सूचना विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018 में प्रतिदिन लगभग 21 मिलियन बैरल तेल टैंकरों के जरिये होर्मुज जल संधि क्षेत्र गुजरा है.

कच्चे तेल की तरह ही प्राकृतिक गैस का भी एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से दुनिया भर में पहुंचाया जाता है. आईईए के ही आंकड़ों के अनुसार हर साल 33 बिलियन क्यूबिक मीटर गैस होर्मुज जल क्षेत्र से होकर जाती है. एक अन्य रिपोर्ट यह भी बताती है कि इस क्षेत्र से औसतन हर 10 मिनट में तेल या गैस का एक टैंकर गुजरता है.

हॉर्मुज जल क्षेत्र तेल के व्यापार के लिए कितना महत्व रखता है इसे 2009 में हुई एक घटना से भी समझा जा सकता है. मार्च 2009 में इसी क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना के दो पोत गलती से टकरा गए थे. हालांकि, इस दौरान कोई भी पोत न तो डूबा और न ही यातायात प्रभावित हुआ. लेकिन यह खबर आते ही दुनिया भर में तेल की कीमतें अचानक बढ़ गईं. यह दिखाता है तेल के व्यापार के लिहाज से यह क्षेत्र कितना संवेदनशील है.

ईरान के पास अमेरिका को जवाब देने का इससे अच्छा रास्ता नहीं

हॉर्मुज को लेकर कूटनीति के विशेषज्ञ कहते हैं कि ईरान के पास अमेरिका पर दवाब बनाने के लिए इस जल क्षेत्र से बेहतर विकल्प कोई दूसरा नहीं है. किंग्स कॉलेज लंदन में मध्यपूर्व मामलों के चर्चित विशेषज्ञ एंड्रियास क्रिग सीएनबीसी से बातचीत में कहते हैं कि इस क्षेत्र से जाने वाला तेल और गैस दुनिया के अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्था का सबसे जरूरी हिस्सा है. यानी होर्मुज जल क्षेत्र पूरी दुनिया के लिए ऊर्जा की जीवन रेखा सरीखा है, ऐसे में इसे बंद करने का मतलब है कि पूरी दुनिया को बड़ी परेशानी में डालना. वे आगे कहते हैं कि ईरान अच्छे से जानता है कि वह अमेरिकी फ़ौज का सामना नहीं कर सकता, ऐसे में इस क्षेत्र को बंद करके ही वह अमेरिका सहित पूरी पर दुनिया पर दबाव बना सकता है.

कुछ जानकार यह भी कहते हैं कि अगर ईरान हॉर्मुज जल क्षेत्र को बंद न भी करे तो भी वह यहां पर बहुत कुछ ऐसा कर सकता है जिससे दुनिया भर में तेल के व्यापार पर संकट छा जाएगा. बीते साल के मध्य में ईरान ने ऐसा ही कुछ किया भी था.

अप्रैल 2019 में अमेरिका ने ईरान की सेना - ‘रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर’ को आतंकवादी संगठन घोषित कर उसके खिलाफ प्रतिबंध और कड़े कर दिए थे. डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले पर यूरोपीय देश भी चुप्पी साधे हुए थे. तब ईरान ने अमेरिका और यूरोप पर दबाव बनाने के लिए होर्मुज जल क्षेत्र में कथित रूप से छह तेलवाहक जहाजों (टैंकरों) पर मिसाइल से हमले किए थे. ब्रिटेन के एक तेलवाहक जहाज को उसने अपने कब्जे में भी ले लिया था. यही नहीं ईरान ने इसी क्षेत्र में अमेरिका के एक अति-उन्नत निगरानी ड्रोन-विमान को भी मार गिराया था. इन घटनाओं के चलते तेल का आयात काफी प्रभावित हुआ था और और तेल के दामों में भारी इजाफा देखने को मिला था.

दुनिया भर में कच्चे तेल के व्यापार पर नजर रखने वाले जानकार कहते हैं कि जब ईरान का अमेरिका के साथ तनाव बढ़ता है तो होर्मुज जल क्षेत्र को लेकर आशंकाए पैदा हो जाती हैं. फिर होता ये है कि तेल कंपनियां अपने तेल के भंडार को बढ़ाने लगती हैं जिस वजह से कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा देखने को मिलता है.