पिछले कुछ समय से पूरे देश में कई विश्वविद्यालयों के छात्र फीसवृद्धि को लेकर उत्तेजित हैं. पड़ोसी देश पाकिस्तान तक से इसी प्रकार के विरोध-प्रदर्शनों की खबरें आ रही हैं. शासक वर्ग की ओर से इसके प्रति या तो उदासीनता दिखाई जा रही है या फिर इसे राजनीतिक रंग देकर खारिज करने की कोशिश की जा रही है. विपक्षी दल भी इस मुद्दे पर ज्यादा कुछ नहीं कर रहे हैं और न ही देश के अन्य युवा और जन-साधारण इस प्रश्न पर बड़ी संख्या में लामबंद हो रहे हैं. बल्कि युवाओं का एक बड़ा हिस्सा दिग्भ्रम का शिकार होकर उल्टे ऐसे आंदोलनों का मजाक बना रहा है. भारत जैसे देश में सस्ती या निःशुल्क शिक्षा जैसे सर्वाधिक महत्वपूर्ण मुद्दे पर जनसाधारण की यह उदासीनता चौंकाने वाली हो सकती है.

शिक्षा के दार्शनिक पक्षों पर चर्चा करना इस आलेख का उद्देश्य नहीं है. क्योंकि कई दार्शनिकों का तो यह भी मत रहा है कि शिक्षा ही मनुष्य की नैसर्गिकता और सहजता को समाप्त करने के लिए उत्तरदायी रही है. लेकिन आज जिस तरह के समाज में हम रह रहे हैं उसमें शिक्षा एक सामाजिक और सांस्कृतिक पूंजी का रूप ले चुकी है. यह सभ्य समाज में मानवीय गरिमा और नागरिकता की जिम्मेदारियों के साथ जीने के लिए एक अनिवार्य तत्व और शर्त बन चुकी है.

लेकिन सभी स्तरों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक सबकी समान पहुंच की मांग अब भी लोकप्रिय राजनीतिक मांग का रूप नहीं ले सकी है. दिलचस्प यह है कि इसका सबसे प्रमुख कारण समाज में अभी भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव ही है. हम अभी तक खुद ही यह समझ नहीं पाए हैं कि एक समाज के रूप में हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं. इसलिए शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण संसाधन को पहली प्राथमिकता देने के लिए जिम्मेदार व्यवस्था पर हम कोई दबाव नहीं बना पाते हैं.

आज किसी भी समाज के लिए इतना स्पष्ट और प्रकट भेद किसी और स्तर पर नहीं दिखाई देगा जितना कि शिक्षा के स्तर पर दिखता है. बच्चे के जन्म के साथ ही यह लगभग तय हो जाता है कि उसके माता-पिता की आय के आधार उसे किस तरह की स्कूली शिक्षा मिल पाएगी. किस तरह की शिक्षा से यहां तात्पर्य है कि उसकी पढ़ाई का माध्यम कौन सी भाषा होगी, स्कूल में शिक्षकों के ज्ञान के स्तर से लेकर खेल एवं अतिरिक्त कला-कौशल के प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं कैसी होंगीं. उसके सर्वांगीण विकास और आत्मविश्वास के निर्माण के लिए दुनिया देखने-दिखाने का उसमें कितना अवसर होगा. अन्य संस्कृतियों के साथ घुलने-मिलने का कितना अवसर होगा. नवीनतम तकनीकों, अध्ययन-सामग्रियों और प्रयोगशालाओं की व्यवस्था कैसी और कितनी होगी. आधुनिक समय में बेहतर शिक्षा के ये ही मानदंड हैं.

आज यही सुविधाएं तय करने लगी हैं कि आगे उच्च शिक्षा के मामले में किस छात्र के किस स्तर तक पहुंच पाने की संभावना है. यही सामाजिक और सांस्कृतिक पूंजी फिर आगे जाकर राजनीतिक और आर्थिक पूंजी बन जाती है. यही खाई फिर समाज में शासक-वर्ग और शासित-वर्ग के बीच एक द्वैध को रचती है. इसमें कुछेक अपवाद अवश्य होते हैं, लेकिन ऐसे अपवादों की संख्या, जिन्हें कभी ‘गुदड़ी के लाल’ इत्यादि कहकर संबोधित किया जाता था, कम से कमतर होती जा रही हैं. यदि ऐसे गुदड़ी के लाल देश के सर्वोच्च पदों तक पहुंच भी जाते हैं तो शासक वर्ग द्वारा इन्हें ‘को-ऑप्ट’ कर लिया जाता है. यानी इन्हें अपने ही वर्ग-चरित्र में पचा लिया जाता है या ढाल लिया जाता है.

भारतीय संविधान में शिक्षा को एक समवर्ती सूची में रखा गया ताकि भारत की विविधता और संघीय ढांचे को देखते हुए राज्य और केन्द्र दोनों का दखल उसमें रहे. साथ ही, मौलिक अधिकारों के अंतर्गत शिक्षा और संस्कृति का अधिकार दिया गया है ताकि विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के लोग अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए शैक्षणिक संस्थान स्थापित कर सकें. इनके अलावा संविधान में अनुच्छेद 21-ए का सृजन कर ‘शिक्षा के अधिकार’ का प्रावधान किया गया. समय-समय पर सरकारों ने राष्ट्रीय शिक्षा नीतियां बनाईं और पाठ्यक्रमों में संशोधन किए. किसी समय वयस्क शिक्षा पर मिशन के रूप में जोर दिया गया. लगभग दो दशक पहले प्राथमिक शिक्षा को सब तक पहुंचाने के लिए ‘सर्व शिक्षा अभियान’ की शुरुआत की गई. विद्यालयों में उपस्थिति बढ़ाने और पोषण सुनिश्चित करने की दृष्टि से पच्चीस वर्ष पहले ‘मध्याह्न भोजन योजना’ की शुरुआत की गई. छात्रवृत्ति, पोशाक, बस्ता और साईकिल दिए जाने की योजनाएं भी शुरू हुईं.

लेकिन सच्चाई यह है कि इस सबसे शिक्षामात्र में कोई गुणात्मक परिवर्तन देखने को नहीं मिल सका है. आज शिक्षक अपनी कार्यदशा का रोना रोते रहते हैं क्योंकि अब उन्हें न केवल जनगणना, चुनाव, पोलियो और मध्याह्न भोजन जैसी व्यवस्थाओं में लगाया जाता है, बल्कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत सुबह और शाम टॉर्च और पिपही (फूंककर बजाया जानेवाला एक प्रकार का बाजा) लेकर जंगल-झाड़ में घूमना पड़ता है ताकि वे खुले में शौच करने वालों को पकड़कर शर्मसार कर सकें.

इन विद्यालयों में शिक्षा को समाज निर्माण के मिशन के रूप में न तो सरकारों ने देखा और न शिक्षा से जुड़े लोगों और माता-पिताओं ने. विद्यालयों के प्रति स्थानीय समुदायों में किसी प्रकार के अपनापे या ओनरशिप की भावना नहीं पैदा हो सकी और शिक्षा को यांत्रिक रूप से कागजी कार्रवाई की तरह अंजाम दिया जाने लगा. शिक्षकों की नियुक्ति भी इस प्रकार से की गई कि यह मजाक का विषय बन कर रह गई है. इसलिए आज स्थिति यह है कि गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपने बच्चों को इन स्कूलों में नहीं भेजना चाहता. केवल मध्य प्रदेश और हरियाणा में ही हज़ारों सरकारी विद्यालयों को बंद किए जाने की नौबत आ चुकी है. सरकारें इस प्रवृत्ति को अपना खर्च कम करने का एक अवसर मानकर इससे अपना पल्ला झाड़ती रहती हैं.

22 जुलाई, 2006 को आश्चर्यजनक रूप से बिहार सरकार ने ‘समान स्कूल प्रणाली’ (कॉमन स्कूल सिस्टम) की व्यवस्था लागू करने के लिए एक तीन-सदस्यीय आयोग का गठन किया. कहा गया कि यह नई व्यवस्था प्रदेश में प्राइवेट और सरकारी स्कूलों की विभेदकारी व्यवस्था को समाप्त कर देगी. इसके उद्देश्यों में डॉ. राममनोहर लोहिया के उस प्रसिद्ध नारे तक का उल्लेख किया गया जिसमें उन्होंने कहा था- राष्ट्रपति की हो या चपरासी की संतान, सबको शिक्षा एक समान. पूर्व विदेश सचिव एवं नई दिल्ली स्थित काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट के अध्यक्ष प्रो. मुचकुंद दुबे को इसका अध्यक्ष बनाया गया. देश के जाने-माने शिक्षाविद् अनिल सदगोपाल को इसका सदस्य बनाया गया. डॉ. मदन मोहन झा इस आयोग के सचिव बनाए गए थे. डॉ झा केन्द्र सरकार में एक शीर्ष अधिकारी थे और लगभग एक दशक से कॉमन स्कूल सिस्टम की व्यवस्था में दिलचस्पी ले रहे थे. इस विषय पर उनके कई शोध-पत्र पहले ही प्रकाशित हो चुके थे. बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उन्हें विशेष रूप से शिक्षा व्यवस्था को पुनरुज्जीवित करने के लिए बिहार आमंत्रित किया था.

इस आयोग ने 8 जून, 2007 को अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए इसे बिहार के सभी बच्चों को समर्पित किया था. यह रिपोर्ट वास्तव में एक क्रांतिकारी रिपोर्ट थी. इसे यदि लागू कर दिया जाता, तो यह पूरी शिक्षा व्यवस्था में युगांतरकारी परिवर्तन ला सकती थी और दूसरे राज्यों के लिए भी अनुकरणीय साबित हो सकती थी. लेकिन जैसा कि होता है, ऐसी रिपोर्टों को धूल फांकने के लिए सरकारी फ़ाइलों में हमेशा के लिए कैद कर दिया जाता है. साल 2009 में इन पंक्तियों के लेखक को इस आयोग के अध्यक्ष प्रो मुचकुंद दुबे ने एक निजी बातचीत में कहा था कि ‘इस तरह के साहसिक कार्यों के लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता की जरूरत होती है.’ लेकिन राजनीतिक कायरता की वजह से नीतीश कुमार वैसा करने के लिए उस समय चूक गए जब वे ऐसा करने की स्थिति में थे.

दूसरी तरफ केन्द्र सरकार के स्तर पर स्कूली शिक्षा के रूप में नवोदय विद्यालय और केन्द्रीय विद्यालय जैसे प्रयोग हुए हैं. ग्रामीण क्षेत्रों के मेधावी बच्चों को निःशुल्क और गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा देने में नवोदय विद्यालय कारगर तो साबित हुए हैं, लेकिन इसका फायदा भी चंद भाग्यशालियों तक सीमित होकर रह जाता है. केन्द्र सरकार के कर्मचारियों और सैन्य सेवाओं के कर्मचारियों के लिए विशेष विद्यालयों के प्रावधान किए गए हैं, लेकिन वे भी एक विशेष वर्ग की पहुंच तक ही सीमित हैं.

यह तो हुई स्कूली स्तर की शिक्षा की स्थिति. आंकड़ों के मुताबिक जहां 95 प्रतिशत बच्चों की पहुंच प्राथमिक शिक्षा तक है, वहीं उनमें से केवल 40 प्रतिशत ही माध्यमिक कक्षाओं (कक्षा 9-12) तक पहुंच पाते हैं. और 10 प्रतिशत से भी कम उच्च शिक्षा के स्तर तक पहुंच पाते हैं. इनमें भी वंचित तबकों का प्रतिशत बहुत कम है. फिर कइयों को बीच में ही शिक्षा छोड़नी पड़ती है.

कॉलेज और विश्वविद्यालयी शिक्षा की स्थिति तो और भी विचित्र हो चुकी है. इनमें पठन-पाठन का पूरा वातावरण दशकों पहले ही चौपट हो चुका है. बड़ी संख्या में इनके प्राध्यापकों ने आर्थिक निश्चिंतता, मानसिक निराशा और राजनीतिक प्रपंच में उलझे रहने की वजह से नवीनतम ज्ञान-विज्ञान और शोध से स्वयं को काट लिया है. समय के साथ बेतहाशा वेतनवृद्धि की वजह से इनमें से कई इस व्यवस्था पर बोझ बने हुए हैं. सरकारी विश्वविद्यालयों को नए जमाने की शिक्षा के अनुरूप संसाधन और शिक्षक मुहैया कराने से सरकारें भी हाथ खींचती गई हैं.

हमारी उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम, परीक्षा और परिणाम सबकुछ इतने हास्यास्पद हैं कि छात्रों का इन पर से कब का भरोसा उठ चुका है. लेकिन वे करें भी तो क्या, जाएं भी तो कहां, इसलिए सबकुछ जानते-बूझते किसी तरह खानापूर्ति और डिग्री हासिल करने की कवायद चलती रहती है. तीन साल की डिग्री पांच साल में पूरी होती है. गंभीरतापूर्वक अध्ययन की इच्छा रखने वाले छात्र खून के आंसू रोते हैं. दूसरी तरफ ईमानदारीपूर्वक अध्यापन की इच्छा रखने वाले अध्यापकों की स्थिति भी वैसी ही है.

हमारे विश्वविद्यालय बहुत पहले से संकीर्ण दलीय राजनीति का अड्डा भी रहे हैं. और इनकी फर्जी डिग्रियों के मामले भी अक्सर प्रकाश में आते ही रहते हैं. इस प्रकार सरकारी विश्वविद्यालयों की छवि दिनानुदिन बद से बदतर होती गई है, और सरकारों ने भी इस पर कोई ध्यान नहीं दिया है.

यही हालत केंद्रीय विश्वविद्यालयों और आईआईटी-आईआईएम जैसी संस्थाओं की भी है. इनकी संख्या इतनी कम है कि कुछ प्रतिशत छात्र ही इन तक पहुंच पाते हैं. यानी कि छात्रों का एक बहुत ही छोटा हिस्सा जो किसी तरह उच्च शिक्षा की दहलीज पर पहुंचता है, उसका भी एक बड़ा हिस्सा इन संस्थानों की दौड़ से पहले ही बाहर हो जाता है. फिर भी फीस इत्यादि कम होने की वजह से कुछेक ग्रामीण और कस्बाई छात्र अपनी मेधा और संघर्ष के बल पर ऐसे संस्थानों में किसी न किसी तरह पहुंच ही जाते थे. लेकिन दिनोंदिन अब इसकी संभावना कम-से-कमतर होती जा रही है.

ऐसा केवल भारत में ही नहीं हो रहा है. संयुक्त राज्य अमेरिका जहां सरकारी सहायता वाले विश्वविद्यालय बहुत अच्छे हुआ करते थे, वहां भी अब सरकारें इनसे हाथ खींचती जा रही हैं और उन पर फीस बढ़ाने का दबाव डाला जा रहा है. दूसरी तरफ महंगे निजी विश्वविद्यालयों की भरमार होती जा रही है. कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सांता बारबरा के प्रोफेसर क्रिस्टोफर न्यूफ़ील्ड लंबे समय से विश्वविद्यालयी व्यवस्थाओं में आ रहे परिवर्तनों का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं. वे सस्ती उच्च शिक्षा के प्रबल और मुखर हिमायती रहे हैं. 2016 में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘भारी भूल: किस तरह हमने सरकारी विश्वविद्यालयों को तबाह किया और किस तरह हम उन्हें दुरुस्त कर सकते हैं’ (द ग्रेट मिस्टेक: हाउ वी रेक्ड पब्लिक यूनिवर्सिटीज़ एंड हाउ वी कैन फिक्स देम) में उन्होंने आंखें खोलने वाले तथ्य सामने लाए.

उन्होंने दिखाया है कि किस तरह निहित राजनीतिक स्वार्थों की वजह से अमेरिका में उच्च शिक्षा आम लोगों की पहुंच से दूर होती गई है. पहली बार वहां ऐसा देखने में आ रहा है कि लोग अपने से पहले की पीढ़ी से कम शिक्षित हैं. कॉलेज की शिक्षा पूरी करने की दर यहां महज 56 फीसदी रह गई है. और इस मामले में विकसित माने जाने वाले 30 देशों (ओईसीडी देशों) की सूची में अमेरिका सबसे नीचे यानी 29वें पायदान पर पहुंच गया है. दुनिया के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में आने वाले कैलिफोर्निया में कॉलेज शिक्षा पूरी करने की दर केवल आठ सालों (1996-2004) के बीच 66 फीसदी से घटकर 44 फीसदी रह गई है. इसी अवधि के दौरान वहां शिक्षा में सरकारी निवेश भी घटकर 5वें पायदान से 47वें पायदान पर पहुंच गया. अमेरिका अब विश्वविद्यालय में प्रवेश कर सकने वाले छात्रों के अनुपात के आधार पर 23 देशों की सूची में 19वें पायदान पर पहुंच गया है.

यह सब बहुत सुनियोजित तरीके से किया गया है और अब इसे वहां ‘अकादमिक पूंजीवाद’ का नाम दिया जा रहा है. इसके तहत पहले सरकारी विश्वविद्यालयों को अकर्मण्य, खराब गुणवत्ता वाले, टैक्सपेयर पर बोझ, सब्सिडी का दुरुपयोग करने वाले, शोध और प्रौद्योगिकी विकास में योगदान न देने वाले, बाज़ार या कॉरपोरेट सेक्टर के लायक मानव-संसाधन नहीं तैयार करने वाले के रूप में प्रचारित कर एक राजनीतिक वातावरण तैयार किया गया. इसके साथ ही महंगे निजी विश्वविद्यालयों के चकाचौंध करने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर और एजुकेशन लोन देनेवाले बैंकों का भरपूर विज्ञापन कर लोगों के मन में यह बिठाया गया कि वहीं जाने पर उनका भविष्य सुरक्षित हो सकता है. तमाम सरकारी विश्विद्यालयों के शीर्ष पदों पर अकादमिक लोगों के स्थान पर नौकरशाहों की नियुक्ति गई और उनकी ट्यूशन फी में जबर्दस्त इजाफा किया गया. यह भी भ्रमजाल पैदा किया गया कि सरकारी विश्वविद्यालयों में महंगी फीस के बावजूद एजुकेशन लोन लेकर पढ़ना बहुत आसान है.

अब ठीक यही स्थिति भारत में भी लागू करने की कोशिशें हो रही हैं. साल 2000 में भारत सरकार ने शिक्षा में सुधार हेतु एक नीतिगत ढांचा तय करने के लिए एक समूह का गठन किया था. इसका संयोजक उद्योगपति मुकेश अंबानी को बनाया गया था और एक दूसरे उद्योगपति कुमारमंगलम बिड़ला इसके सदस्य थे. इस रिपोर्ट को अंबानी-बिड़ला रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है. इस रिपोर्ट ने खुले तौर पर सरकार से कहा था कि वह उच्च शिक्षा से लगभग पूरी तरह हाथ खींच ले और इसकी जगह वह एजुकेशन लोन के लिए वित्तीय गारंटी प्रदान करे. इस रिपोर्ट ने यह भी कहा था कि शिक्षा पूरी तरह से बाजारोन्मुखी होना चाहिए. इसने एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी विधेयक लाकर निजी विश्वविद्यालयों को बढ़ावा देने की बात भी खुलकर की थी.

शिक्षाविदों से लेकर जागरूक छात्रों तक में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. इन पंक्तियों का लेखक उस दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र था और उसे याद है कि इस रिपोर्ट के विरोध में दिल्ली के तीनों प्रमुख विश्वविद्यालयों (डीयू, जेएनयू और जामिया मिलिया) के छात्रों ने संयुक्त रूप से संसद भवन का घेराव करने के लिए विशाल मार्च निकाला था. उनका नारा था- ‘शिक्षा पर जो खर्चा हो, बजट का दसवां हिस्सा हो’. इसलिए जो नवयुवक आज इस आधार पर जेएनयू के छात्रों का मजाक उड़ा रहे हैं कि उन्होंने दूसरे विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए कब आवाज़ उठाई, उन्हें यह जानने की जरूरत है कि यह सही नहीं है.

लेकिन जैसा कि होता है परवर्ती सरकारों ने अंबानी-बिड़ला रिपोर्ट को आधार बनाकर ही काम करना शुरू कर दिया. इसके लिए दलीलें भी वही दी गईं जो ऊपर अमरीका के संदर्भ में वहां के निहित स्वार्थों ने दी थीं. आज जब दिल्ली की केजरीवाल सरकार या बिहार की नीतीश कुमार सरकार कहती है कि हम छात्रों को पढ़ने के लिए चार लाख तक का लोन बिना किसी जमानत के देंगे, तो लोगों को खुशी होती है. क्योंकि धीरे-धीरे कुछ चीजें इतनी सामान्य हो जाती हैं कि हम उनके बारे में सोचना तक बंद कर देते हैं. रिजर्व बैंक के मुताबिक फरवरी 2017 में भारतीय छात्रों पर बकाया एजुकेशन लोन 720 अरब रुपये का था, फरवरी 2018 में दो प्रतिशत गिरावट के साथ यह 705 अरब रुपये हो गया. इनमें से 95 फीसदी लोन सरकारी बैंकों का था. प्राइवेट वित्तीय संस्थाएं गरीब छात्रों को लोन भी नहीं देते. वे केवल कुछ ही सीमित कोर्स और संस्थाओं तक अपने लोन को सीमित रखते हैं जहां केवल एक खास वर्ग के छात्र ही महंगी फीस देकर बाद में अच्छा आर्थिक रिटर्न देने वाली शिक्षा हासिल करते हैं.

पक्षपाती मीडिया द्वारा यह बहुप्रचारित किया जाता है कि सस्ती उच्च शिक्षा देकर टैक्सपेयर के पैसे का दुरुपयोग किया रहा है. लेकन इस बात को बड़ी चालाकी से छिपाया जाता रहा है कि भारत का हर नागरिक टैक्सपेयर है, क्योंकि अप्रत्यक्ष करों के रूप में सभी टैक्स भरते हैं. और यह भी कि जब बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों को टैक्स में हज़ारों करोड़ की राहत दी जाती है तो वह भी देश के हर आम करदाता नागरिक का ही पैसा होता है.

आज भारत में भी निजी विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग कॉलेजों तथा प्रबंधन संस्थानों ने बैंकों से ऋण लेकर विशाल दिखावटी इंफ्रास्ट्रक्चर खड़े कर लिए हैं. घटिया गुणवत्ता वाली निकम्मी शिक्षा देने वाली ये संस्थाएं उस ऋण की भरपाई के लिए छात्रों से महंगी फीस वसूल रही हैं और उन्हें भरोसा दे रही हैं कि आपको आसान शर्तों पर जितना चाहिए लोन दिला देंगे. आज भारत का निरीह युवा बैचलर की डिग्री हासिल करते-करते लाखों के ऋण तले दबा होता है. बाद में रोजगार नहीं मिलने पर वह कुछ भी करने को बाध्य होता है. उसका आत्मविश्वास पूरी तरह टूट चुका होता है. अगर वह निम्न-मध्यवर्गीय परिवार से हुआ तो उस पर परिवार की उम्मीदों, अपेक्षाओं और अनिवार्य जरूरतों का बोझ भी होता है.

ऐसे लाखों युवाओं की कहानियां न हमें टीवी और सिनेमा में दिखाई जाती हैं और न मीडिया ही उसे सामने लाता है. एक पूरी की पूरी पीढ़ी मानसिक रूप से इतना टूट चुकी है, असुरक्षित हो चुकी है या अपनी जरूरतों में घिर चुकी है कि व्यवस्था से कोई ठोस सवाल पूछने लायक आत्मविश्वास और निर्भीकता उसमें नहीं बची है. उन्हें स्वयं को तुष्ट करने के लिए और अपनी स्वतंत्रता साबित करने के लिए यथास्थिति या व्यवस्था के पक्ष में ही जोर-शोर से जो-सो बोलना होता है.

आज भारत में ही नहीं दुनिया भर में छात्रों को वैसा ही आर्थिक यंत्रमानव बनाने की कोशिश की जा रही है जिसे पारिभाषिक शब्दावली में ‘होमो-इकॉनॉमिकस’ कहा जाता है. इसमें स्वामी, कामगार और उपभोक्ता के साथ-साथ जीवन और जगत की हर वस्तु और प्राणी को भी एक आर्थिक इकाई के ही एक रूप में देखने की प्रवृत्ति होती है. इसमें शिक्षा को भी आर्थिक निवेश और आर्थिक रिटर्न के एकपक्षीय नजरिए से देखा जाता है. अंबानी-बिरला रिपोर्ट में हमें स्पष्ट रूप से इसकी प्रतिध्वनि सुनाई देती है. बड़ी ही चालाकी से इसमें शिक्षा के गैर-बाज़ारी महत्व को दरकिनार कर दिया जाता है.

शिक्षा का मतलब बाज़ारी भेड़ पैदा करना नहीं, बल्कि चिंतनशील और निर्भीक शेर पैदा करना होता है. शिक्षा का व्यापक उद्देश्य ऐसे स्वतंत्रचेता व्यक्ति का निर्माण करना होता है जो सामाजिक और मानवीय समस्याओं को भी समझने, उनसे जुड़ने और उन्हें सुलझाने की क्षमता रखता हो. वह अपने स्वास्थ्य, जीवन-शैली, पर्यावरण, अस्तित्वमूलक प्रश्नों, जीवन और जगत के असल संतोष और आनंद को भी समझने की क्षमता रखता हो. वह पूंजीपतियों और राजनीतिक शासक-वर्ग के प्रति दास-भाव की जगह समानता, बंधुता, निर्भीकता और स्वतंत्रता जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों से लैस हो. जो केवन निजी स्वार्थों या अंध-मतवादों की जगह संवाद, भागीदारी और साझेदारी की भावना से ओत-प्रोत हो. वह सूचनाओं, प्रोपगैंडा और अफवाहों में भेद कर सकने में सक्षम हो. अब हमें तय करना है कि हम खुद क्या बनना चाहते हैं और अपने बच्चों को क्या बनाना चाहते हैं.

किसी सेठ, जमींदार, उद्योगपति या राजनेता द्वारा स्थापित निजी विश्वविद्यालय स्वतंत्र चिंतन को तभी बढ़ावा दे सकता था जब वह विशुद्ध लोकोपकार की दृष्टि से स्थापित किया गया हो. लेकिन वहां तो शिक्षकों और कर्मचारियों से लेकर छात्रों तक की स्थिति और भी दासानुदास की कर दी जाती है. सबकुछ एक व्यक्ति, परिवार या समूह के इशारों पर चलता है. निजी आर्थिक-राजनीतिक लाभ सर्वोपरि होता है.

यही शर्त जनता के पैसे से चलने वाले सरकारी विश्वविद्यालयों पर भी लागू होती है. उन्हें शुद्ध लोकोपकार की दृष्टि से चलाया जाना होगा. वहां के शिक्षकों को अनंत बौद्धिक स्वायत्तता दी जानी होगी. छात्रों को भी स्वतंत्रचेत्ता बनने का आत्मविश्वास और वातावरण दिया जाना होगा. और इन दोनों को संकीर्ण दलीय राजनीति से ऊपर उठकर विशुद्ध सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों पर चिंतन करना सीखना होगा.