निर्भया मामले के चारों दोषियों की फांसी कल तय हो चुकी है. डेथ वारंट के मुताबिक उन्हें कल सुबह साढ़े पांच बजे तिहाड़ जेल में फांसी दी जानी है. चारों ने दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में इसके खिलाफ याचिकाएं दायर की थीं जो आज खारिज हो गईं.

निर्भया मामले के चारों दोषी बचाव के लिए मौजूद सभी कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल कर चुके हैं. एक को छोड़कर सभी की घर वालों के साथ आखिरी मुलाकात भी हो गई है. कल उनकी फांसी के साथ ही करीब सात साल पुराने इस मामले में जारी कानूनी प्रक्रिया पर पूर्णविराम लग जाएगा.

डेथ वारंट जारी होने के बाद

नियमों के अनुसार डेथ वारंट जारी होने के बाद इसकी सूचना एक लाल लिफाफे में दोषियों के परिजनों को दी जाती है. यह लिफाफा उन्हें किस तारीख को कितने बजे सौंपा गया, इसका विवरण भी दर्ज होता है. दोषियों को परिजनों से मिलने की छूट भी दी जाती है. इस दौरान वे अपनी वसीयत या दूसरी चीजें परिजनों को सौंप सकते हैं.

डेथ वारंट जारी होने के बाद जेल प्रशासन का काम होता है कैदियों को मानसिक रूप से मौत के लिए तैयार करना. उन्हें एक अलग कोठरी में शिफ्ट किया जाता है और उनकी लगातार निगरानी की जाती है. वे आपस में मिल भी सकते हैं. इस मुलाकात के दौरान भी उन पर कड़ी निगरानी रखने का प्रावधान है.

निर्भया मामले के चारों दोषी

डेथ वारंट से फांसी होने तक दोषी कैदियों की लगातार काउंसलिंग की जाती है. उन्हें सादा खाना और एक जोड़ी कपड़े मिलते हैं. अगर वे चाहें तो धार्मिक ग्रंथों का पाठ भी सुन सकते हैं. इस बात का काफी ध्यान रखा जाता है कि वे शारीरिक या मानसिक रूप से बीमार न पड़ें.

विशेष रस्सी

फांसी देने के लिए विशेष रस्सी का इंतजाम किया जाता है. यह रस्सी सिर्फ बिहार की बक्सर जेल में बनती है और इसे मनीला रोप कहा जाता है. बताया जाता है कि पहले यह फिलीपींस की राजधानी मनीला से मंगाई जाती थी इसलिए उसका यह नाम पड़ा. बक्सर जेल के कैदियों को इस रस्सी को बनाने की खास ट्रेनिंग मिलती है.

एक साक्षात्कार में बक्सर जेल के अधीक्षक विजय कुमार अरोड़ा कहते हैं, ‘यहां लंबे समय से फांसी के फंदे बनाए जाते रहे हैं. एक फंदा 7200 कच्चे धागों से बनता है.’ उनके मुताबिक पांच-छह कैदी दो-तीन दिन में इसे तैयार करते हैं. बताया जा रहा है कि तिहाड़ जेल प्रशासन ने ऐसे 12 फंदे मंगाए हैं. फांसी देने से पहले रस्सी पर मोम या मक्खन लगाया जाता है. ऐसा इसलिए किया जाता है कि यह गर्दन को छीले नहीं बल्कि आराम से दबाव बनाए और साथ ही फंदे के लिए लगाई गई गांठ कहीं अटके नहीं. बताया जा रहा है कि इस बार तिहाड़ अधिकारी रस्सी को मुलायम बनाने के लिए उस पर केले का लेप लगा रहे हैं.

फांसी देते वक्त सब काम इशारों में ही होता है ताकि कैदी विचलित न हो. फांसी के बाद चिकित्सक शव की जांच करके मौत की पुष्टि करते हैं.

तिहाड़ में तैयारियां

तिहाड़ में फांसी का तख्ता 1950 के शुरुआती वर्षों में बना था. इस पर दो फंदे लटकाने का इंतजाम था. वक्त के साथ लोहे की वह रॉड भी कमजोर पड़ गई थी जिससे फंदे लटकाए जाते हैं. इसलिए इसकी मरम्मत कर इसे चार फांसियों के लिए तैयार किया गया है. इस पर डमी की मदद से रिहर्सल भी हो चुकी है. इस रिहर्सल के लिए कैदियों का वजन और उनकी गर्दन का नाप लिया जाता है. बताया जा रहा है कि चारों दोषियों के साथ जब ऐसा किया जा रहा था तो वे फूट-फूटकर रोने लगे. उन्होंने जेल अधिकारियों से जिंदगी की भीख मांगी. इसके बाद उन्हें शांत करने के लिए एक काउंसलर को बुलाया गया.

फांसी देने के लिए उत्तर प्रदेश जेल विभाग के पवन जल्लाद तिहाड़ पहुंच चुके हैं. उन्हें हर फांसी के लिए 15 हजार रु मिलते हैं. यह पहली बार है जब तिहाड़ में एक साथ चार कैदियों को फांसी दी जाएगी. इससे पहले संसद हमले के दोषी अफजल गुरु को 2013 में यहां फांसी दी गई थी.

जेल के एक अधिकारी कहते हैं, ‘आज हम एक बार फिर फांसी की रिहर्सल करेंगे. दोषियों से यह भी पूछा जाएगा कि उनकी आखिरी इच्छा क्या है या फिर क्या वे अपने परिवार को कोई चिट्ठी लिखना चाहते हैं.’ अधिकारियों के मुताबिक फांसी की प्रक्रिया 6.30 बजे तक पूरी हो जाएगी.