राजस्थान के कोटा में बच्चों की मौत का सिलसिला अभी तक नहीं थमा है. यहां के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल जेके लोन में एक दिसंबर से सात जनवरी के बीच कम से कम 112 बच्चे मौत के आगोश में समा चुके हैं. इनमें से अधिकतर नवजात थे. जेके लोन में कोटा संभाग के अलावा मध्यप्रदेश के सीमावर्ती जिलों तक से बीमार बच्चों को इलाज के लिए लाया जाता है.

जानने वाले इन बच्चों की मौत के लिए अस्पताल के कुप्रंबधन और अव्यवस्था को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराते हैं. जेके लोन अस्पताल में सिर्फ़ दो नियोनेटल (नवजातों के) आईसीयू है. इनमें से एक में बीते तीन महीनों से ऊपर की मंजिल के बाथरूम का पानी टपक रहा था. इन दोनों एनआईसीयू में कुल 24 बेड लगे हैं जिनमें से प्रत्येक पर कमोबेश पूरे साल कम से कम दो बच्चों का इलाज चलता है.

जेके लोन अस्पताल के कुप्रबंधन को इस बात से भी समझा जा सकता है कि यहां एनआईसीयू में सेंट्रल ऑक्सीजन लाइन तक नहीं है और ज़रूरत पड़ने पर कई बार ऑक्सीजन के सिलेंडरों के लिए मारा-मारी की स्थिति तक बन जाती है. अस्पताल के गायनी व पीडियाट्रिक्स (बाल चिकित्सा) वार्डों की खिड़कियों के कांच भी एक लंबे समय से टूटे हुए हैं.

जयपुर के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ जगदीश सिंह कहते हैं कि ‘जाड़ों की ठंडी हवा किसी भी शिशु को मौत के मुंह में ले जाने के लिए काफी होती है. बच्चे के साथ शीतलहर नवप्रसूता के लिए भी बेहद नुकसानदायक साबित होती हैं.’ सेंट्रल ऑक्सीजन पाइप न होने के बारे में डॉ सिंह कहते हैं कि ऑक्सीजन सिलेंडरों को बाहर से मंगवाए जाने पर उनसे भी बच्चों में संक्रमण फैलने का ख़तरा बना रहता है.’

राजस्थान सरकार द्वारा गठित की गई जांच कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में ठंड और ऑक्सीजन सिलेंडरों की वजह से फैलने वाले संक्रमण को बच्चों की मौत की सबसे बड़ी संभावित वजह माना है. इस कमेटी ने जांच में यह भी पाया कि अस्पताल में उपचार के दौरान काम आने वाले उपकरणों के रखरखाव में कोताही बरती जा रही थी और किसी शिशु रोगी के उपचार या मृत्यु के बाद उसके बेड कोे जीवाणु मुक्त भी नहीं किया जा रहा था. ऐसे में नए रोगी शिशुओं में संक्रमण का ख़तरा बढ़ गया.

इस मामले को सबसे पहले सामने लाने वाले स्थानीय पत्रकार आशीष जैन हमें बताते हैं, ‘जेके लोन अस्पताल में डॉक्टर और नर्सिंगकर्मी बिना दस्तानों और मास्क के ही बच्चों का इलाज कर रहे थे. अधिकतर स्टाफ एनआईसीयू जैसी संवेदनशील जगह पर भी जूते-चप्पल समेत ही घुस रहे थे. उनकी देखा-देखी बच्चों के परिजन भी ऐसा ही कर रहे थे. इससे भी बच्चों में संक्रमण बढ़ा.’ आंकड़े बताते हैं कि बीते तीन साल में जेके लोन में 428 शिशुओं की मौत सिर्फ़ संक्रमण की वजह से ही हुई थी.

आशीष जैन के मुताबिक ‘जेके लोन में जीवनरक्षक या गंभीर स्थिति में काम आने वाले उपकरणों में से आधे ख़राब पड़े थे. यहां न्युमोनिया और अस्थमा के इलाज में काम आने वाले नेबुलाइज़र, वार्मर, पीलिया को नियंत्रति करने वाली फोटोथेरेपी मशीन, बच्चों को तय मात्रा में दवा देने वाले इंफ्यूजन पंप और उनके सांस न ले पाने की स्थिति में अलर्ट करने वाले एपनिया मीटर जैसे मूलभूत उपकरण भी पर्याप्त संख्या में नहीं थे.’

जेके लोन मामले में केंद्र सरकार द्वारा गठित की गई जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2019 में राजस्थान के अस्पतालों के एनआईसीयू में कुल 104209 बच्चे भर्ती हुए जिनमें से 10.5 प्रतिशत यानी 10941 की मौत हो गई. जबकि जेके लोन अस्पताल के एसएनसीयू में इस साल 3087 बच्चे भर्ती किए गए जिनमें से 622 से अधिक की मौत हुई. बच्चों की मृत्यु का यह आंकड़ा प्रदेश के दूसरे अस्पतालों की तुलना में दोगुना (20.2 फीसदी) है.

‘बजट एनालिसिस एंड रिसर्च सेंटर ट्रस्ट’ के निदेशक निसार अहमद इस पूरे मामले से जुड़े कुछ अन्य ज़रूरी पहलुओं की तरफ़ भी हमारा ध्यान ले जाते हैं, ‘बीते कुछ सालों से प्रदेश में स्वास्थ्य के लिए ज़ारी होने वाले बजट में कटौती की जाने लगी है. लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक ये है कि उपकरणों समेत अन्य मेडिकल सुविधाओं के लिए आवंटित हुए बजट में से आधा भी ख़र्च नहीं किया जाता. क्योंकि अव्वल तो सरकारी सिस्टम में मामूली सा ख़र्च करने की प्रक्रिया भी बेहद जटिल होती है. दूसरे, अस्पतालों में ऐसा कोई एक व्यक्ति नहीं होता जिसे आधिकारिक तौर पर इस राशि का उपयोग न करने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सके.’

बकौल अहमद, ‘ख़बरें बताती हैं कि जेके लोन के पास पैसे उपलब्ध होने के बावज़ूद नए उपकरण नहीं खरीदे गए. ऐसा करके संबंधित अधिकारी या अधीक्षक ख़ुद को जिम्मेदारी और कुछ अतिरिक्त कार्यभार से बचा लेते हैं. वहीं ये राशि ख़र्च न होने से चिकित्सा विभाग का भी फायदा हो जाता है.’

अपनी बात के पक्ष में निसार अहमद अलवर के सरकारी शिशु चिकित्सालय में हुए एक हालिया दर्दनाक हादसे का उदाहरण देते हैं. वे बताते हैं, ‘जनवरी 2019 से फैसिलिटी बेस्ड न्यूबोर्न केयर (एफबीएनसी) वार्ड के वार्मर का बटन खराब था जिसकी कीमत महज 250 रुपए थी. लेकिन डॉक्टर और मेडिकल ऑफिसर की आपसी तनातनी के चलते न ये राशि ज़ारी हुई और न बटन बदला गया. बीती 31 दिसबंर को इस स्विच में शॉर्ट-सर्किट होने से वार्मर ने आग पकड़ ली. धूंए भरे वार्ड से 14 बच्चों को बचा लिया गया. लेकिन वार्मर में लेटी एक 15 दिन की नवजात बच्ची जिंदा ही जल गई.’

अहमद आगे जोड़ते हैं, ‘इस स्थिति से निपटने के लिए कांग्रेस ने राजस्थान में सत्ता में आने से पहले अपने घोषणा पत्र में ‘जवाबदेही’ और ‘स्वास्थ्य का अधिकार’ जैसे कानून लाने का वायदा किया था जो अभी तक पूरा नहीं किया जा सका है.’

लेकिन इस मामले में राजस्थान सरकार की किरकरी की सबसे बड़ी वजह अस्पताल का कुप्रबंधन नहीं बल्कि वह खुद ही थी. इसकी शुरुआत मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के एक बयान से हुई. मीडिया से हुई एक बातचीत में गहलोत ने कहा कि ‘देश-प्रदेश के प्रत्येक अस्पताल में बच्चों की मौत होती है. ये कोई नई बात नहीं है...’ जानकारों को इस बात ने इसलिए भी चौंकाया क्योंकि गहलोत की छवि हर बात को बहुत नाप-तोल कर बोलने वाले नेता की रही है.

उनके इस बयान के बाद न सिर्फ़ राजस्थान बल्कि इसके बाहर भी कांग्रेस के विरोधियों को उसे घेरने का मौका मिल गया. हालांकि गहलोत ने तुरंत इस बारे में सफाई दी कि उनकी बात को ग़लत ढंग से पेश किया गया ताकि उस पर राजनीति की जा सके. लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था.

अगर आंकड़ों पर ध्यान दें तो अशोक गहलोत ने जो कहा वह पूरी तरह से गलत नहीं था. इस अस्पताल में पिछले छह सालों में कई महीने ऐसे रहे जब यहां सौ से ज्यादा बच्चों की मृत्यु हुई. और साल 2019 में इस अस्पताल में इससे पहले के पांच वर्षों के मुकाबले सबसे कम मौतें दर्ज की गईं. लेकिन जिस तरह से अशोक गहलोत ने इस मामले पर टिप्पणी की वह इतने जिम्मेदार पद पर बैठे किसी उतने ही अनुभवी व्यक्ति के मुंह से स्वीकार्य नहीं हो सकती. और फिर यह तथ्य भी अपनी जगह है ही कि इतनी मौतें जेके लोन अस्पताल के लिए सामान्य भले हों अपने आप में सामान्य बिलकुल नहीं हैं.

जेके लोन अस्पताल की तरफ़ से जारी किए गए आंकड़े

इस पूरे घटनाक्रम में राजस्थान सरकार की एक बड़ी ग़लती यह भी रही कि बच्चों की मौत की ख़बरें सामने आने के करीब दस दिन तक उसका कोई मंत्री या कांग्रेस का कोई बड़ा नेता जेके लोन अस्पताल की व्यवस्थाएं देखने नहीं पहुंचा. और जब प्रदेश के चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा वहां हालात का जायज़ा लेने पहुंचे भी तो उनके स्वागत के लिए कालीन बिछाया गया. इस घटना ने भी राजस्थान कांग्रेस की जमकर फ़जीहत करवाई. इससे पहले रघु शर्मा पीड़ितों को मुआवज़ा देने के सवाल पर एक लाइव कार्यक्रम में एंकर पर भड़क गए थे. बाद में इस कार्यक्रम के चुनिंदा हिस्से सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हुए.

राजस्थान कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, इस मामले को ठीक से न संभाल पाने और राजस्थान सरकार के रवैये से कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी भी खासी नाराज़ थीं. उन्होंने पार्टी के प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे के माध्यम से नाख़ुशी ज़ाहिर करते हुए गहलोत सरकार से इस पर रिपोर्ट भी मांगी है.

इस मामले में राजस्थान सरकार की फ़जीहत होने में जो कसर बाकी थी वह प्रदेश के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के कोटा दौरे ने पूरी कर दी. हालांकि पायलट ने संजीदगी भरे लहजे में बच्चों की मौत के लिए अपनी सरकार की जिम्मेदारी स्वीकार की. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों ने उनके इस बयान को मुख्यमंत्री गहलोत पर निशाने के तौर पर ज्यादा देखा. राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनने के समय से ही मुख्यमंत्री पद को लेकर अशोक गहलोत और सचिन पायलट की आपसी अदावत किसी से नहीं छिपी है.

सचिन पायलट का यह बयान कुछ समय पहले तक उनके बेहद करीबी माने जाने रघु शर्मा को रास नहीं आया और उन्होंने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए अस्पताल में टूटे दरवाज़ों और खिड़कियों के मरम्मत कार्यों को लेकर पीडब्ल्यूडी विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया जिसकी जिम्मेदारी अभी पायलट के पास ही है. लेकिन पीडब्ल्यूडी विभाग भी भला कहां चुप रहने वाला था. उसने तुरंत ही प्रेस रिलीज जारी करके चिकित्सा विभाग पर ही जेके लोन अस्पताल में काम कराने के लिए बजट उपलब्ध न करवाने का आरोप लगा दिया.

शुक्रवार को मीडिया से हुई बातचीत में मुख्यमंत्री गहलोत ने भी पायलट पर तंज कसते हुए कहा कि ‘उनके (पायलट) पास पार्टी अध्यक्ष व उपमुख्यमंत्री दो तरह की जिम्मेदारियां हैं, उन्हें कमियां बताने के साथ सुझाव भी देने चाहिए ताकि उनमें सुधार हो सके. विपक्ष किसी बात को कहने का अधिकार रख सकता है तो सत्ता पक्ष के अध्यक्ष को भी उसका अधिकार होना चाहिए.’

अशोक गहलोत के हालिया बयान समेत इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष सतीश पूनियां हमसे कहते हैं, ‘कांग्रेस के नेताओं की ख़ुद को एक-दूसरे सेे ऊपर दिखाने की होड़ ने दिखा दिया है कि उनके लिए सौ बच्चों की मौतें कोई मायने नहीं रखती. उनकी (कांग्रेस नेताओं) रस्साकशी का प्रदेश पर जबरदस्त विपरीत असर पड़ रहा है. ख़ुद उपमुख्यमंत्री और चिकित्सा मंत्री ने बच्चों की मौत के मामले में सरकार की लापरवाही स्वीकारी है. लेकिन उसके बावज़ूद दोषियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाही नहीं की गई है. इस तरह एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगाने से सौ बच्चों की जान वापिस नहीं आएगी.’

वहीं वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक डॉ राजन महान का इस बारे में कहना है कि ‘यह दुखद है कि देश के दूसरे राज्यों की तरह राजस्थान में भी मासूम बच्चों की मौत हुई है. लेकिन उससे भी ज्यादा अफ़सोसजनक इस मामले में राजस्थान सरकार का रवैया रहा है. यदि इस पूरे मामले में प्रदेश सरकार के जिम्मेदार नेता समय रहते जेके लोन में भर्ती होने वाले या मर चुके नवजातों के परिवारों से मिलते, अस्पताल की अव्यवस्थाओं को सुधारने की दिशा में जल्द से जल्द क़दम उठाते, मौके की नजाकत को समझते हुए बयान देते और इस दुखद मौके का इस्तेमाल आपस में ही छींटाकशी के लिए न करते तो शायद लोगों में उनके लिए वो नाराज़गी नहीं देखने को मिलती, जो अभी नज़र आ रही है.’