निर्देशक - मेघना गुलज़ार
लेखक - मेघना गुलज़ार, अतिका चौहान
कलाकार - दीपिका पादुकोण, विक्रांत मेस्सी,
रेटिंग - 3.5/5

बीते मंगलवार को सुबह से सोशल मीडिया पर एक वीडियो तैर रहा था. इसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की एक सदस्य, अणिमा सोनकर हिंसा वाले दिन एसिड लेकर जेएनयू कैंपस में घूमने की बात कहती दिखाई देती हैं. एक न्यूज चैनल पर, जेएनयू में हुई हिंसा की वजह बताते हुए उनका यह भी कहना था कि एबीवीपी के सदस्यों को कहा गया था कि वे आत्मरक्षा के लिए आयरन रॉड, पेपरस्प्रे और अगर हो सके तो एसिड भी साथ लेकर चलें. यह संयोग की बात है कि मंगलवार की ही शाम दीपिका पादुकोण छात्रों के साथ एकजुटता दिखाने जेएनयू पहुंच गईं. उनकी ताजा फिल्म ‘छपाक’ भी एसिड अटैक की ही बात करती है. सोचने वाली बात यह है कि जिस एसिड की भयावहता को दीपिका पादुकोण की फिल्म अपने पूरे समर्पण, कौशल और गंभीरता के साथ हमें दिखाती है, एबीवीपी की यह सदस्य (और अगर उनकी मानें तो एबीवीपी भी) उसे आत्मरक्षा का साधन मानती हैं!

लेकिन एबीवीपी, दीपिका पादुकोण और ‘छपाक’ में सिर्फ यही कॉमन कड़ी नहीं हैं. दीपिका के जेएनयू पहुंचने के बाद सोशल मीडिया पर, सरकार के समर्थकों ने उन्हें देशद्रोही बताते हुए ‘छपाक’ का बहिष्कार करने की बात कही. कुछ लोग जहां उन्हे अनफॉलो और ब्लॉक करते दिखाई दिए, तो कुछ ने फिल्म का टिकट कैंसिल करने की धमकियां दीं. यहां तक कि फिल्म के बारे में बेसिर-पैर की यह अफवाह भी फैलाई गई कि इसमें हिंदुओं की छवि खराब करने की कोशिश की गई है.

‘छपाक’ एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन पर आधारित है और लक्ष्मी पर एसिड एक मुसलमान युवक ने डाला था और फिल्म में भी यही दिखाया गया है. जबकि सोशल मीडिया पर यह झूठ फैलाने की कोशिश की गई कि फिल्म में एसिड फेंकने का अपराधी एक हिंदू को बताया गया है. इसके बाद जो कहना और भी ज़रूरी है, वह यह है कि ‘छपाक’ में हिंदू-मुसलमान वाला कोई एंगल है ही नहीं. इसमें मेघना गुलज़ार अपराधी की धार्मिक पहचान को पूरी स्पष्टता से दिखाते हुए भी किसी धर्म का पक्ष लेती नहीं दिखाई देती हैं. इस फिल्म में भी सच को उतनी ही कल्पना मिलाकर दिखाया गया है, जितना आम तौर पर किसी ईमानदार बायोपिक में दिखाया जा सकता है. यहां पर विवेक ओबेरॉय वाली ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ की बात नहीं हो रही है. आप चाहें तो उसे 100 फीसदी सच मान सकते हैं. :)

‘छपाक’ महज 15 साल की उम्र में एसिड अटैक जैसे हादसे का सामना करने वाली लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन की उस कहानी को कहती है जो इस हादसे के साथ शुरू होती है. यह बड़ी रचनात्मकता के साथ, लक्ष्मी को हादसे का शिकार होते दिखाने से ज्यादा वरीयता, उनके दोबारा उठकर खड़े होने को देती है. फिल्म दिखाती है कि 15-16 साल की एक लड़की जो एक वक्त पर अपना केस भी नहीं लड़ना चाहती थी, आगे हिम्मत बटोरकर कैसे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचती है और इतिहास में दर्ज होने वाले फैसले की वजह बनती है. ‘छपाक’ लक्ष्मी द्वारा एसिड की बिक्री रोकने के लिए लगाई गई जनहित याचिका को लेकर किए गए संघर्ष की झलक भी देती है. साथ ही, दूसरे एसिड सर्वाइवर्स के साथ उनके लिए काम करने के किस्से भी दिखाती है.

फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जो आपको इतना स्तब्ध करते हैं कि आप कई मिनट तक अपनी जगह से हिल तक नहीं पाते हैं. इन दृश्यों में कई परते हैं जो निराशा भर देने वाले घटनाक्रमों के बीच चुपके से, यह बात भी कहती लगती हैं कि जीवन यहां पर खत्म नहीं होता है. अतिका चौहान और मेघना गुलज़ार की लिखी इस पटकथा की खासियत यह है कि यहां सबकुछ बहुत सौम्य और संतुलित आवाज़ में कहा गया है. अगर फिल्म मनोरंजन के लिए देखी जाती है तो वह भी यहां भरपूर मात्रा में हैं और अगर किसी मकसद के लिए बनाई जाती है तो वह भी बखूबी सामने आता है. छपाक के मामले में एक और बात, जिस पर खुश हुआ जा सकता है, यह है कि इसमें लेखन, निर्देशन और निर्माण जैसी तीन सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां महिलाओं ने ही संभाली हैं.

अभिनय पर आएं तो छपाक में दीपिका पादुकोण हर फ्रेम को ज़िंदा करती हुई लगती हैं. भारतीय सुंदरता का प्रतीक मानी जाने वाली दीपिका को लक्ष्मी की सूरत प्रोस्थेटिक मेकअप से मिलती है जिसे वे इतनी सहजता से सामने लेकर आती हैं, मानो यह उनका ही चेहरा हो. एक अभिनेत्री के लिए ऐसा करना बहुत हिम्मत का काम माना जाना चाहिए. चेहरे तक तो ठीक है लेकिन जाने कहां से वे लक्ष्मी का मिज़ाज भी उतनी ही खूबसूरती से अपना लेती हैं. लक्ष्मी के चेहरे पर, उनकी बातों में चुहल औऱ मस्ती तो नज़र आती है लेकिन एक दर्द भी साथ चलता दिखता है. यही विरोधाभास दीपिका पादुकोण अपने किरदार को परदे पर देती दिखाई देती हैं जिसके लिए खड़े होकर ढेर सारी तालियां बजाने का मन करता है.

उनके साथ फिल्म में एक सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका में नज़र आ रहे विक्रांत मेस्सी हमेशा की तरह विश्वसनीय और प्रसन्न करने वाला काम करते हैं. ज्यादातर वक्त अपने आसपास से नाराज रहने वाला उनका किरदार फिल्म में कुछ हल्के-फुल्के और रूमानी दृश्यों की वजह बनता है और कहानी में खुशी-गम का संतुलन कायम रखता है. इनके अलावा, फिल्म में कुछ असली एसिड अटैक सर्वाइवर्स ने भी छोटी-छोटी भूमिकाएं निभाई हैं. अगर आप इसे बॉयकॉट करने वालों में शामिल होकर या उनके चक्कर में आकर ‘छपाक’ को नहीं देखेंगे तो दुनिया के इन सबसे जुझारू लोगों के संघर्ष और सफलता को सम्मान देने से चूक जाएंगे.

भाजपा समर्थकों सहित अच्छे सिनेमा के शौकीनों का ‘छपाक’ देखना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि यह एसिड अटैक के मुद्दे पर बनी पहली मेनस्ट्रीम फिल्म है और ऐसी जरूरी फिल्में रोज-रोज नहीं बनती हैं. इस फिल्म का बहिष्कार वही कर पाएंगे जिनमें इस तरह के हमलों का दर्द और भयावहता समझने लायक संवेदनाएं नहीं बची हों. देश या देशभक्ति के बहाने इस फिल्म से मुंह मोड़ना एक ऐसे सच से मुंह मोड़ना है जो देश की 50 करोड़ महिलाओं के प्रति समाज के एक बड़े हिस्से की सोच और उस सोच से उनके हर दिन के संघर्ष को दिखाता है.

बीते कुछ सालों से हर साल एसिड हमलों के आंकड़ों में लगातार बढ़ोत्तरी होती रही है. ऐसे में अगर हम समर्थन और विरोध की राजनीति में पड़कर यह तय कर रहे हैं कि इस मुद्दे पर बनी फिल्म देखनी चाहिए या नहीं तो यही समझना चाहिए कि असल तेजाब इन लड़कियों के चेहरों पर नहीं हमारे दिमागों पर पड़ चुका है.