पांच साल पहले हजारों बर्लिनवासियों ने पहली बार होली खेली थी. देखते ही देखते यह त्योहार अब पूरे यूरोप का बन गया है. इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि यूरोप में कुछ लोगों को भारत का सांस्कृतिक प्रभाववाद, अमेरिका के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को टक्कर देता दिख रहा है.

यूरोप का यह सबसे प्रभावशाली देश पिछले कुछ सालों से मई के महीने से होली के असर में आने लगता है. तब लंबी रातें और बर्फीली सर्दियां बीत चुकी होती हैं. दिन की लंबाई और तापमान की ऊंचाई इतनी हो जाती है कि नीले गगन के तले खुले मैदानों में खुलकर होली-मेले लग सकें. इनमें शामिल होने वाले मदमस्त होली के दीवाने भारतीय मूल के रसिया नहीं बल्कि विशुद्ध जर्मन होते हैं. यहां भी रंग-बिरंगे गुलाल की बौछार, जी भर रेल-पेल, नाच-गान, मदिरापान और मौज-मस्ती बिलकुल भारत की तरह ही होती है. बस होलिका दहन और पूजा की रस्म छोड़कर.

होली की इस हुड़दंगी लहर से सराबोर होने में जर्मनी के महानगरों से लेकर छोटे-मोटे शहरों और कस्बों तक कोई पीछे नहीं रहना चाहता. दिलचस्प बात है कि यह लहर अब जर्मनी तक सीमित नहीं है. यूरोप के बाकी देशों में भी युवा होली के रंग से प्रभावित हो रहे हैं. जर्मनभाषी पड़ोसी देशों ऑस्ट्रिया और स्विट्ज़रलैंड के अलावा इटली, ब्रिटेन, आयरलैंड, नीदरलैंड (हॉलैंड), बेल्जियम, फ्रांस, स्पेन, डेनमार्क और हंगरी जैसे देश भी होली की टोली में शामिल हो चुके हैं.

नई-नवेली है यूरोप की होली

जर्मनी सहित इन सभी देशों में होली अभी बहुत नई-नवेली है. पांच साल पहले तक शायद ही किसी ने इसका नाम भी सुना था. इसकी शुरुआत हुई 29 जुलाई, 2012 के दिन जर्मनी की राजधानी बर्लिन से. बर्लिन शहर के बीचों-बीच खुले मैदान में उस रविवार को पूरे दिन और देर रात तक एक ‘ओपन एयर होली फेस्टिवल’ की धूम रही. फ़ेसबुक और विभिन्न वेबसाइटों के माध्यम से बर्लिनवासियों को उसका पता चला था. उन्होंने यह भी सुना था कि भारतीय होली की तर्ज पर वहां खूब नाच-गाना होगा, रंग खेले जाएंगे.

उस दिन 25-25 यूरो (लगभग 1800 रुपए) के टिकट लेकर मैदान में बने मंच के पास 10 हजार से अधिक युवाओं की भीड़ लग चुकी थी. इन युवाओं से पहले से ही कहा गया था कि उनके कमर से ऊपर के कपड़े सफेद हों, ताकि उस पर पड़ा गुलाल अपनी छटा बिखेर सके. ठीक तीन बजे 10 से 0 की उलटी गिनती (काउन्ट डाउन) शुरू हुई और फिर हजारों कंठ खुशी से चीख पड़े. कुछ ही सेकंडों में हजारों लोगों की यह भीड़ रंग-बिरंगे बादलों के बीच दिखने लगी. रंगीन धुंध छंटी तो पश्चिमी इलेक्ट्रो बीट पर भीड़ का थिरकना शुरू हुआ. बाद में बॉलीवुड के फिल्मी संगीत ने भी समां बंधा और भीड़ के मनोरंजन के लिए कुछ खेल-करतब भी दिखाए गए.

बर्लिन का यह पहला होली उत्सव इसी शहर के 28 वर्षीय युवा यास्पर हेलमान और 25 वर्षीय मक्सीम देरेंको के दिमाग की उपज थी. हेलमान 2011 में भारत आए थे. दिल्ली में उन्होंने पहली बार होली का त्योहार देखा. लोगों की उमंग और रंगों की छटा से वे इतने दंग रह गए कि जर्मनी में भी होली मनाने की ठानी. जब वे भारत से लौटे तो अपने साथ कुछ अबीर-गुलाल भी लेते गए.

अपने मित्र मक्सीम देरेंको के सहयोग से 2012 की गर्मियों में उन्होंने पहले बर्लिन में फिर ड्रेस्डेन, हनोवर तथा म्यूनिक में ‘ओपन एयर होली फेस्टिवल’ नाम से होली-महोत्सव आयोजित किए. सभी आयोजन इतने सफल रहे कि एक ही साल के भीतर पूरे जर्मनी में इसी तर्ज पर या इससे मिलते-जुलते होली-महोत्सव आयोजित करने की होड़-सी लग गई. जर्मन युवाओं के लिए यह जी-भर कर मौज-मस्ती करने की एक ‘ओपन एयर पार्टी’ थी. पार्टी में रगों की बरसात एक अलग तरह का आकर्षण था जिसने देखते ही देखते देश के हजारों युवाओं को होली से जोड़ दिया.

बर्लिन वाले उत्सव के आयोजकों ने फेसबुक और अपनी अलग वेबसाइट के माध्यम से लोगों को होली के बारे में जितनी हो सके जानकारी देने का भी प्रयास किया. उन्होंने लिखा, ‘रंगों के इस भारतीय उत्सव को बर्लिन लाने के विचार ने एक तीव्र इच्छा का रूप ले लिया. ...लेकिन उसे उसके मूल रूप में यहां साकार कर पाना इतना कठिन होता कि हम अपना इरादा टालते रहे. कुछ परिवर्तनों के साथ अब हमने उसकी नींव डाल दी है और हर साल अपने सपने के और निकट पहुंचने की आशा रखते हैं.’

यूरोप के 30 से ज्यादा महानगरों में होली पहुंच चुकी है

जर्मनी का पहला होली-मेला लगाने वाली बर्लिन की ‘होली कांसेप्ट’ कंपनी अकेले 2016 में यूरोप के 15 से ज्यादा प्रमुख शहरों में ‘होली फेस्टिवल्स ऑफ़ कलर्स’ नाम से होली-महोत्सव आयोजित किये थे. मई से शुरू होने वाले ये आयोजन वहां अक्टूबर तक चलते हैं. कम से कम आधा दर्जन दूसरी कंपनियों ने भी जर्मनी तथा यूरोप के अन्य देशों के लंदन, वियेना, रोम, अमस्टरडम या ज्यूरिच जैसे 30 से अधिक महानगरों में इसी तरह के आयोजन किये. 

जर्मनी में आयोजित इन आयोजनों में पश्चिमी खान-पान और संगीत के अतिरिक्त भारतीय व्यंजनों, बॉलीवुड संगीत और भांगड़ा नृत्य को भी शामिल करने की कोशिश रहती है. सवा आठ करोड़ की जनसंख्या वाले इस देश में भारतीय मूल के लोग मुश्किल से एक लाख है. इस वजह से आयोजकों को स्थानीय भारतीयों के बीच सही कलाकार खोजने में काफी कठिनाई होती है. इसके बाद भी उनका उत्साह कहीं से कम नहीं होता. होली कांसेप्ट कंपनी के यास्पर हेलमान बताते हैं, ‘होली महोत्सव हमारे लिए भी हर बार एक नया अनुभव है. हमने भारतीय होली को अपने रंगों में रंग लिया है. हर बार होली फेस्टिवल्स ऑफ़ कलर्स में पेशेवर डीजे तो होते ही हैं, साथ ही मंच पर कुछेक भारतीय कलाकार भी पेश किए जाते हैं.’

ऑस्ट्रिया और स्विट्ज़रलैंड में भी होली

जर्मनी के बाद 2013 से उस के पड़ोसी जर्मन-भाषी ऑस्ट्रिया और स्विट्ज़रलैंड में भी होली महोत्सव होने लगे हैं. बर्लिन की ‘होली कांसेप्ट’ कंपनी के अलावा एक ऑस्ट्रियन और एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी ‘होली वन वर्ल्ड लिमिटेड’ ने अलग-अलग दिनों पर ऑस्ट्रिया की राजधानी वियेना के अलावा सात अन्य बड़े शहरों में होली-मिलन आयोजित किए. वहां भी देखते ही देखते होली की धूम मच गई.

यूरोप ही नहीं बाहर के नए-नए देशों और शहरों पर भी होली का त्योहार अपनी विजय-पताका फहराता जा रहा है. जहां-जहां उसकी विजय-पताका पहुंच चुकी है, वहां के सोशल मीडिया ही नहीं, पत्र-पत्रिकाओं और रेडियो-टेलीविज़न पर भी उसकी चर्चा-समीक्षा होने लगी है. जर्मनी के दो प्रमुख व्यावसायिक टेलीविजन चैनल ‘प्रो 7’ और ‘आरटीएल 2’ होली महोत्सवों वाली दो बड़ी जर्मन कंपनियों के ‘मीडिया पार्टनर’ बन गए हैं. जापान की ‘सोनी’ कंपनी का वह टीवी-विज्ञापन भारत में ही नहीं, जर्मनी सहित बहुतेरे देशों में भी दिखाया जाता है, जिसमें भारत में होली की एक झलक ‘सोनी’ के टेलीविजन सेटों की गुणवत्ता बताती है.

त्योहार भी, कारोबार भी 

जर्मनी में होली के पहले आयोजकों का सपना था कि यह त्योहार देश के कोने-कोने तक पहुंचे. मौज-मस्ती वाले उसके चरित्र के साथ-साथ आपसी भाईचारे और समता-समानता का उसका पारंपरिक संदेश भी लोगों के दिलों में उतरे. फिलहाल तो लोगों की भीड़ होली के मौज-मस्ती वाले चरित्र पर ही फिदा है और आयोजकों को इस तरह मालामाल कर रही है कि हर कुछ दिन में होली आयोजन करने वाली नई कंपनयां मैदान में आ रही हैं.

इन उत्सवों में आयोजकों द्वारा वितरित गुलाल के सिवाय किसी और रंगीन पाउडर का इस्तेमाल मना होता है. बर्लिन में 2012 वाले प्रथम उत्सव के लिए मक्के के आटे में विभिन्न प्राकृतिक रंग मिला कर बना ऐसा ही डेढ़ टन विशेष गुलाल भारत से मंगाया गया था. उसे दो यूरो (145 रु) मूल्य की 100-100 ग्राम की थैलियों में वितरित किया गया गया था. लेकिन अब बड़ी खपत को देखते हुए बढ़िया गुणवत्ता का गुलाल स्थानीय स्तर पर भी बनने लगा है. वैसे एक या दो पैकेट गुलाल होली उत्सवों की टिकट में ही शामिल होता है. अतिरिक्त गुलाल आम तौर पर दो यूरो प्रति पैकेट के भाव से अलग से ख़रीदना पड़ता है.

अमेरिकी मीडिया में भी चर्चा

अमेरिकी मीडिया भी यूरोप में होली मनाने के बहाने से पैसा कमाने की इस नई विधा की अनदेखी नहीं कर पा रहा है. वहां के बिजनेस अखबार ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने 3 अक्टूबर, 2013 के अपने एक विश्लेषण में लिखा, ‘ वे महंगे विज्ञापनों पर निर्भर नहीं हैं. वाणिज्यिक किस्म के होली आयोजन, सामान्य संगीत महोत्सवों की अपेक्षा कहीं अधिक लाभ कमा सकते हैं. 10 हजार से अधिक लोगों वाली होली-पार्टी, टिकटों और वस्तुओं की बिक्री द्वारा, पांच लाख डॉलर तक की आय का 80 प्रतिशत तक लाभ दिला सकती है.’ अखबार के अनुसार यूरोपीय संघ के ट्रेडमार्क कार्यालय में ऐसे आवेदनों का तांता लग गया है जिनके नामों में ‘होली’ शब्द शामिल है.

एक जर्मन वेबसाइट ‘मेडियावांडल’ इन आयोजनों की धूमकेतुओं जैसी तेज सफलता का रहस्य ‘फेसबुक जैसे’ सोशल मीडिया मंचो के द्वारा उनकी कुशल मार्केटिंग में देखती है. उसका कहना है,  ‘होली महोत्सव अपने लच्छेदार शब्दों के द्वारा भारत की इस त्योहारी परंपरा की जीवंतता से जीवन में शब्दशः रंग भर देते हैं.’

पूरे यूरोप में तेजी प्रचलन में आ रही होली के बीच एक सवाल यह है कि यह रंग क्या निरंतर चढ़ता ही रहेगा या समय के साथ उतरने भी लगेगा? स्वाभाविक है कि इस पर सभी एकमत नहीं हैं.

क्या रंग चढ़ता ही रहेगा? 

एक पक्ष का मानना है कि होली में रंग और उमंग की इतनी मिठास है कि मौज-मस्ती के हमेशा नए बहानों का भूखा यूरोप का युवा वर्ग न तो उससे आसानी से बच पाएगा और न सरलता से छोड़ पाएगा. जर्मनी में कई युवा इस त्योहार से अभिभूत हैं. एक बार होली आयोजन में शामिल हो चुके मात्से डब्लू कहते हैं, ‘मैं रंगों और खुशियों की इस अनोखी दुनिया में दोबारा लौट जाना चाहता हूं... एक ऐसा दिन, जो कभी भूलेगा नहीं... कैसा सौभाग्य कि हम भी वहां थे... हम अपने बच्चों को कभी इसके किस्से सुनाएंगे.’ अल्यी बी इसे अविश्सनीय बताते हुए कहती हैं, ‘जीवन में इससे पहले ऐसा कभी देखा ही नहीं था.’

 दूसरे पक्ष का मत है कि होली का जर्मनी में इतना व्यापारीकरण कर दिया गया है कि यह धंधा बहुत दिनों तक नहीं चल सकता. क्रिस्टियान एम इसकी एक और वजह बताती हैं, ‘कोई धार्मिक पृष्ठभूमि नहीं रह जाने से वह मौज-मस्ती के केवल नए रिकॉर्ड स्थापित कर सकता है और कुछ नहीं.’ लिंडा के इसी बात को अपने शब्दों में आगे बढ़ाती हैं, ‘जर्मनी में यह (होली महोत्सव) निरंतर पियक्कड़ी और रंगों के साथ खिलवाड़ का पर्याय बन गया है. मुझे यह सब पसंद नहीं. होली फेस्टिवल सिरदर्द हैं. उनमें अब कोई मौलिकता या विशेषता भी नहीं रह गयी क्योंकि अब वे हर गांव-पुरवे में भी होने लगे हैं.’

जर्मनी की देखादेखी पड़ोसी देश नीदरलैंड में भी होली महोत्सव चल पड़े हैं. वहां सूरीनाम से आकर बस गए हिंदुओं की परिषद के अध्यक्ष राज भोंदू का कहना है, ‘इन आयोजनों में उस एकता की भावना अभाव है जो होली की जान है. यह तो बस एक धंधा है. लोगों को पैसा बनाना है.’ राज यूरोप में होली की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हुए पूछते हैं, ‘क्या ईसाई जुलाई महीने में कभी क्रिसमस मनाएंगे?’  राज भोंदू इन आयोजनों के अंत में ही होली का भला देखते हैं.

इस पूरी बहस से अलग भारत में इस तरह से होली मनाना इस त्योहार की मूल भावना से बेशक बहुत दूर हो लेकिन तब भी वह इसलिए स्वागत-योग्य है कि बॉलीवुड, योग और आयुर्वेद की तरह होली भी भारत का एक ऐसा सांस्कृतिक संदेश है जिसे पश्चिम स्वेच्छा से अपना रहा है. भारत के प्रति पश्चिम में फैले पूर्वाग्रहों की पकड़ ढीली करने में यह भी उसकी मदद कर सकता है. जर्मनी के ‘जर्मन-भारत मैत्री समाज’ का भी यही मानना है, ‘होली महोत्सव भारत की एक ऐसी सुखद छवि पेश करते हैं जो वहां बलात्कारों की दुखद घटनाओं के कारण बहुत विकृत हो गयी थी.’

यहां कुछ लोगों का मानना है कि अमेरिका के बाद भारत ऐसा पहला सागरपारीय देश है जिसके सांस्कृतिक प्रभाववाद को यूरोप स्वयं ही न्योता दे रहा है. जिस जर्मनी और यूरोप में अब तक केवल अमेरिकी फिल्मों, गीत-संगीत और तीज-त्योहारों की तूती बोलती रही है, वहां अब भारतीय ढोल-मंजीरे, सितार और शहनाई के स्वर भी ऊंचे होते जा रहे हैं. भारत का सांस्कृतिक प्रभाववाद अमेरिकी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को यूरोप से विस्थापित तो नहीं कर पाएगा पर उसे टक्कर तो देने ही लगा है. निपट गरीबी और परम भ्रष्टाचार से बीमार देश होने की भारत की अब तक की छवि में दरारें पड़ने लगी हैं. यूरोप में होली आयोजन का एक सीधा-सा संदेश यही है कि भारत में अब भी ऐसा बहुत कुछ ऐसा है जो औरों के पास नहीं है.