सुप्रीम कोर्ट ने साइरस मिस्त्री को टाटा समूह के कार्यकारी चेयरमैन पद पर बहाल करने के राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के आदेश पर रोक लगा दी है. टाटा समूह के पूर्व चेयरमैन रतन टाटा ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे ने कहा कि एनसीएलएटी का यह फैसला एक न्यायिक खामी हो सकता है. संस्था ने यह फैसला बीते महीने सुनाया था. समूह की धारक यानी होल्डिंग कंपनी टाटा संस ने भी इस फैसले को अदालत में चुनौती दी थी. साइरस मिस्त्री को 2016 में अचानक टाटा समूह के मुखिया के पद से हटा दिया गया था.

रतन टाटा 110 अरब डॉलर के टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस के मानद चेयरमैन हैं. टाटा संस में टाटा के अलग-अलग ट्रस्टों की 65.89 प्रतिशत हिस्सेदारी है. रतन टाटा लंबे समय तक इन ट्रस्टों के भी चेयरमैन रहे हैं. अपनी याचिका में उन्होंने कहा था कि साइरस मिस्त्री ने अपने समय में निदेशक मंडल के सदस्यों की शक्तियां अपने हाथों में ले ली थीं. रतन टाटा ने उन पर ‘टाटा ब्रांड’ की छवि खराब करने का भी आरोप लगाया. उनके मुताबिक साइरस मिस्त्री के ‘नेतृत्व में कमी थी’ क्योंकि टाटा संस का चेयरमैन बन जाने के बाद भी वे खुद को अपने परिवार के कारोबार से दूर नहीं करना चाहते थे, जबकि उनके चयन के साथ यह शर्त लगी हुई थी.

रतन टाटा ने अपनी याचिका में कहा था, ‘साइरस मिस्त्री को टाटा संस का कार्यकारी चेयरमैन पूरी तरह से पेशेवर तरीके से चुना गया था, न कि टाटा संस में 18.4 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली कंपनी शपूरजी पलोनजी समूह के प्रतिनिधि के तौर पर.’ इसमें आगे कहा गया था, ‘एनसीएलएटी ने गलत तरीके से यह मान लिया कि शपूरजी पलोनजी समूह का कोई व्यक्ति किसी वैधानिक अधिकार के तहत टाटा संस का निदेशक बन जाता है. यह गलत है और टाटा संस के संविधान के प्रतिकूल है.’