निर्देशक - ओम राउत
कलाकार - अजय देवगन, काजोल, सैफ अली खान, शरद केलकर
रेटिंग - 2.5/5

‘गढ़ आला पण सिंह गेला’ यानी किला तो मिल गया लेकिन शेर चला गया. बताया जाता है कि 1670 में हुए सिंहगढ़ युद्ध के दौरान, जब छत्रपति शिवाजी को कोंढाणा के किले पर कब्जे और सूबेदार तानाजी मालुसरे की मृत्यु की सूचना दी गई तो उनके मुंह से यही शब्द निकले थे. अपने विश्वसनीय योद्धा और मित्र के लिए कहे गए उनके ये‌ शब्द इतने लोकप्रिय हुए कि अब कहावत की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं.

इतिहास की किताबें भी कहती हैं कि मुगलों ने जब दक्षिण भारत तक अपना साम्राज्य फैलाने की कोशिश की तो शिवाजी ने जिन मराठा योद्धाओं के दम पर उन्हें रोका, तानाजी उनमें से सबसे महत्वपूर्ण सिपहसालार थे. ‘तानाजी – द अनसंग वॉरियर’ इन्ही तानाजी मालुसरे की आखिरी मुहीम का किस्सा दिखाती है. इसमें उन्होंने मुगलों द्वारा भेजे गए एक राजपूत सेनापति पर चढ़ाई कर, अपनी जान की क़ीमत पर कोंढाणा का किला दोबारा हासिल कर लिया था.

फिल्म की बात करने से पहले आपको बताते चलते हैं कि मराठी संस्कृति में पोवाडा गाए जाने की प्रथा है. 17वीं सदी में अस्तित्व में आया पोवाडा असल में एक तरह का लोकगीत है जिसमें ऐतिहासिक घटनाओं और योद्धाओं की शूरवीरता का बखान बड़े ओज के साथ किया जाता है. यह भी दिलचस्प है कि सबसे ज्यादा जनप्रिय पोवाडे तानाजी मालुसरे पर ही लिखे गये हैं.

यहां पर पोवाडा का जिक्र करने की वजह यह है कि ‘तानाजी’ की पटकथा ऐतिहासिक तथ्यों पर नहीं बल्कि किसी पोवाडे से प्रेरित होकर रची गई लगती है. यह फिल्म देखते हुए आप ज्यादातर वक्त एक्शन सीक्वेंस देखते रहते हैं, इनसे बचे वक्त में तानाजी बने अजय देवगन भगवा झंडे और स्वराज से जुड़े भारी-भरकम संवाद बोलते दिखाई देते हैं, इसके बाद भी अगर थोड़ी गुंजायश बचती है तो वहां नाच-गाना आ जाता है. ये सारे तत्व पोवाडों में भी मौजूद रहते हैं.

वैसे तो ‘तानाजी’ के एक्शन सीक्वेंस कमाल हैं लेकिन पटकथा में रोचकता की कमी इनका भरपूर मज़ा नहीं लेने देती है. तानाजी के किरदार का हर समय स्वराज की बात करना भी आपको खटकता है. क्योंकि ऐतिहासिक रूप से उस दौर में स्वराज जैसी किसी विचारधारा का कोई जिक्र नहीं मिलता है. साथ ही, यह भी एक तथ्य है कि मराठे भी केवल मराठा साम्राज्य को बढ़ाने-बचाने के लिए ही मुगलों और बाकी आक्रमणकारियों से लड़े थे. इनके अलावा, भगवा झंडे को ऊपर उठाने और मुसलमान आक्रमणकारियों के आतंक की बातें भी ‘तानाजी – द अनसंग वॉरियर’ में इतना ज्यादा हैं कि एक वक्त बाद इन्हें गले उतारना मुश्किल लगने लगता है.

संवादों और नारों के अलावा, फिल्म के नायक-खलनायक की खासियतें भी कुछ कहती सी दिखाई देती हैं. खलनायक उदयभान की हरकतें ‘पद्मावत’ में रणवीर सिंह द्वारा निभाए गए खिलजी के किरदार से मिलती-जुलती लगती हैं. नदी के किनारे मगरमच्छ को रोस्ट करके खाने वाला उदयभान ज्यादातर वक्त काले कपड़ों में नज़र आता है, यह किरदार अजीब तरह के स्टेप्स के साथ नाचता है और उसकी देहबोली में एक शैतानी लचक भी दिखाई देती है. ये सब मिलकर परदे पर, मुगलिया सल्तनत के किसी राजपूत सिपहसालार की नहीं बल्कि महिषासुर-भस्मासुर जैसे किसी असुर की उपस्थिति का आभास करवाते हैं.

इसके उलट, नायक ज्यादातर वक्त भगवा और गहरे लाल (मरून) रंग के कपड़े पहने दिखाई देता है और देश-धर्म की बातें करता रहता है. हो सकता है कि फिल्मकार ने किरदारों को भव्यता देने के लिहाज से यह अति अपनाई हो. लेकिन बेवजह ठूंसे गए संवाद और अति की हद तक अच्छे-बुरे बनाए गए ये चरित्र इस बात की शंका पैदा कर देते हैं कि कहीं यह फिल्म भी राजनीतिक प्रोपगैंडा के सहारे अपनी नैय्या पार लगाने की कोशिश तो नहीं कर रही.

अभिनय की बात करें तो उदयभान बने सैफ अली खान यहां पर सबसे कमाल का काम करते हैं. वे जिस तरह के दुर्दांत खलनायक बने हैं, आज की भाषा में कहें तो बेहद स्टाइलिश और कूल नज़र आते हैं. संवाद बोलते हुए एक खास तरह का कमीनापन उनके चेहरे पर नज़र आता है जो इस किरदार को ज़रूरी भयावहता देता है. कहना चाहिए कि जिस अति के साथ इसे लिखा गया था, उसी अति के साथ सैफ ने इसे निभाया भी है और इसके लिए उनकी खूब-खूब तारीफ होनी चाहिए.

नायक अजय देवगन पर आएं तो वे ‘तानाजी – द अनसंग वॉरियर’ में 17वीं सदी के एंग्रीयंग मैन लगते हैं. इसमें एक्शन करते हुए तो उन्होंने कमाल किया है लेकिन जहां पर उन्हें एक सेनानायक की तरह लोगों को संबोधित करना था, वहां उनकी संवाद अदायगी थोड़ी कमजोर लगती है. कुछ भावुक करने वाले दृश्यों में वे जरूर प्रभावित करते हैं. वहीं, उनकी यानी तानाजी की पत्नी पार्वतीबाई की भूमिका निभा रही काजोल अपनी छोटी सी भूमिका में ऐसा काम करती हैं जिसके लिए न तो तारीफ करने की जरूरत महसूस होती है और न ही बुराई करने की. शरद केलकर भी शिवाजी महाराज के किरदार में कुछ ऐसा ही काम करते हैं.

फिल्म के बाकी पक्षों की बात करें तो इसका गीत-संगीत प्रभावित करने वाला है और थिएटर से बाहर निकलने के बाद भी याद रह जाता है. साथ ही, इसकी प्रोडक्शन क्वालिटी और विजुअल इफेक्ट्स लाजवाब हैं. इस फिल्म को सत्रहवीं सदी में युद्ध में इस्तेमाल की जाने वाली कुछ कमाल की तकनीकों को जानने के लिए भी देखा जा सकता है. इसके अलावा ‘तानाजी – द अनसंग वॉरियर’ में विशाल किले, मंदिर और घाटियों के सेट्स बहुत बारीकी और खूबसूरती से रचे गए हैं और इन्हीं के चलते इसे थ्रीडी में देखना पैसा वसूल लगता है. लेकिन इन सबके बावजूद, ओम राउत निर्देशित यह हिस्टोरिकल ड्रामा ऐसा नहीं बन पाया है कि इसे न देखें तो कुछ मिस कर देने का अफसोस होगा.

चलते-चलते आपको तानाजी का पोवाडा ज़रा फिल्मी अंदाज में सुनाते हैं. फिल्मी अंदाज़ में इसलिए कि यह गैर-मराठीभाषियों को भी आसानी से समझ आ सकता है.

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