राष्ट्रपति के अभिभाषण के साथ ही संसद का बजट सत्र शुरू हो चुका है. कल आम बजट पेश होगा. इसके साथ ही बजट में क्या होगा, इस पर चर्चा शुरु हो गई है. बजट के आकलन से जुड़ी चर्चाओं में सबसे महत्वपूर्ण चर्चा होती है आयकर की. कई आर्थिक जानकार मान रहे हैं कि आने वाले बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस मोर्चे पर मध्य वर्ग को राहत दे सकती हैं.

इस चर्चा का सबसे बड़ा आधार यह है कि देश इस समय गहरी आर्थिक सुस्ती में डूबा है और लोग पैसा खर्च नहीं कर रहे हैं. इसलिए, सरकार मध्य वर्ग को आयकर में राहत देकर चाहती है कि वह पैसा खर्च करे. मध्य वर्ग के खर्च करने से खपत में तेजी आएगी और आर्थिक गतिविधियां तेजी पकड़ेंगी. सिद्दांत के तौर पर यह बात ठीक है और इसमें सूत्रों के हवाले से मिली जानकारियों को मिला देने के बाद इस बात की संभावना जताई जा रही है कि सरकार आयकर के मोर्चे पर राहत दे सकती है.

लेकिन, थोड़ा पीछे लौटते हैं और मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले बजट पर जाते हैं. उस समय भी देश में आर्थिक सुस्ती के संकेत मिलने शुरु हो गए थे. विशेषज्ञ कह रहे थे कि सरकार को ऐसे उपायों पर जोर देना चाहिए जिससे लोगों के हाथों में पैसे आएं और खपत बढ़े. उस समय की बजट पूर्व चर्चाओं में जानकारों ने लगभग मान लिया था कि सरकार आयकर के स्लैब में बदलाव करेगी. विश्लेषणों में यह चर्चा सबसे ज्यादा थी कि पांच लाख तक की आय को कर मुक्त कर दिया जाएगा. लेकिन, बजट आया तो ऐसा कुछ नहीं हुआ. टैक्स स्लैब जस के तस रहे बल्कि अधिक आय वालों पर सुपर रिच टैक्स आयद कर दिया गया. यानी मोदी सरकार के कदम इतने अनपेक्षित होते हैं कि किसी एक नजरिये के आधार पर यकीनी तौर पर कुछ भी कह पाना मुश्किल होता है.

हालांकि, जानकार कह रहे हैं कि पिछले एक साल में आर्थिक सुस्ती गहरा चुकी है. इसलिए मोदी सरकार लोगों का खर्च बढ़ाने के लिए आयकर में कटौती का प्रयोग कर सकती है. यह बात सही तो है. लेकिन, इसके साथ कुछ दूसरी बातें भी हैं. आर्थिक सुस्ती के कारण सरकार का राजस्व गिरा है. जीएसटी के कलेक्शन में कमी आई है. इसके अलावा मंदी से निपटने के लिए प्रत्यक्ष कर के मोर्चे पर सरकार ने कंपिनयों को कॉरपोरेट टैक्स की छूट भी दी है. इसके चलते सालाना राजस्व में सीधे-सीधे एक लाख 40 करोड़ रूपये की कमी आई है. यानी सरकार सुस्ती से निपटने के लिहाज से आयकर में कटौती कर तो सकती है. लेकिन उसके पास विकल्प काफी सीमित हैं क्योंकि उसे राजकोषीय घाटे का भी ख्याल रखना है.

यदि मोदी सरकार आयकर में कटौती करती है तो राजकोषीय घाटे के और बढ़ने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है. जानकारों के मुताबिक, इस बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.5 से 3.8 फीसद के बीच समेटने का लक्ष्य रख सकती है. मौजूदा वित्तीय वर्ष में सरकार ने इसे 3.3 फीसद तक नियंत्रित रखने का लक्ष्य रखा था जो पहले ही ज्यादा था. सरकार राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को बढ़ाने के बाद भी इस मोर्चे पर सतर्क रहेगी. इसलिए आयकर में बहुत ज्यादा राहत मिलेगी, यह कहना मुश्किल है.

हालांकि, इन सारी बातों के बाद भी आयकर को लेकर चर्चा तो है ही. सूत्रों के मुताबिक, सरकार का इस समय मुख्य ध्यान आर्थिक वृद्धि को तेज करने पर है. आर्थिक वृद्धि को तेज करने का सूत्र खपत बढ़ाने में ही छिपा है. इसके लिए जरूरी है कि लोगों के पास पैसा आए. जानकारों के मुताबिक, इसके लिए एक तो सरकार लोगों के हाथ में सीधे पैसे देने की योजनाओं पर जोर दे सकती है. पीएम किसान योजना में कुछ बढोतरी की जा सकती है या ऐसी ही कोई अन्य योजनाओं लाई जा सकती है. इसके अलावा वह बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में बड़े खर्चों की घोषणा कर सकती है ताकि लोगों के हाथ में काम आए और आर्थिक गतिविधियां बढ़ें. तीसरा विकल्प यह है कि इनकम टैक्स के जरिये मध्यम वर्ग को छूट दी जाए और उनकी खपत बढ़े.

सूत्रों के मुताबिक, सरकार में बजट को लेकर चर्चा इन्हीं बिंदुओं के इर्द-गिर्द है. और इनके पक्ष और विपक्ष दोनों में तर्क हैं. सरकार का एक खेमा इनकम टैक्स कम करने के पक्ष में है. लेकिन, दूसरे का मानना है कि इनकम टैक्स में कटौती सिर्फ तीन करोड़ आयकर देने वालों को फायदा पहुंचाती है. जबकि बुनियादी ढांचे पर बड़े खर्च का फैसला ज्यादा फायदेमंद होगा. इससे कई कोर सेक्टर्स में तेजी आएगी और यह गुणात्मक रूप से असर करेगा. इस खेमे का यह भी तर्क है कि आयकर के जरिये खपत बढ़ाने की नीति तब फायदेमंद होती है जब उसमें निरंतरता हो. लगातार थोड़ा-थोड़ा आयकर घटने पर लोग अपने खर्च बढ़ाना शुरु करते हैं. एक साल आयकर कम करना फिर उसे जस का तस रखना और फिर अगले साल बढ़ा देना लोगों को अनिश्चितता में ऱखता है. इसलिए इनकम टैक्स कट आर्थिक वृद्धि को फौरन गति दे पाएगा, ऐसा नहीं लगता. इनका मानना है कि आयकर में राहत से फिलहाल आर्थिक वृद्धि को तो कोई मदद नहीं मिलेगी. हां. इससे राजस्व जरूर गिर जाएगा.

आयकर में कटौती पर कुछ और भी बातें है. प्रत्यक्ष कर पर गठित कमेटी ने इस सबंध में अपनी जो सिफारिशें दी थीं, वह कुछ यूं हैं: कमेटी के मुताबिक, 10 लाख तक की आय पर कर की सीमा दस फीसद होनी चाहिए. 10 से 20 लाख की आय पर 20 फीसद और 20 लाख से दो करोड़ की आय पर 30 फीसद टैक्स होना चाहिए. दो करोड़ से ऊपर की आय पर कर 35 फीसद होना चाहिए. अब आयकर के मौजूदा स्लैब को देखते हैं. अभी 2.5 लाख तक की आय कर मुक्त है. 2.5 से पांच लाख तक की आय पर पांच फीसद टैक्स लगता है, पांच से दस लाख की आय पर 20 फीसद और दस लाख से ऊपर की आय पर तीस फीसद.

यह वर्तमान टैक्स स्लैब्स और सिफारिशों की तुलना है. लेकिन यह यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कमेटी आयकर मुक्त आय की सीमा बढ़ाने की बात नहीं करती हैं. यानी आयकर मुक्त आय 2.5 लाख से बढेगी, इसकी संभावना सीमित है. जबकि मध्यम वर्ग की ओर से यह सबसे बड़ी मांग है कि पांच लाख तक की आय को आयकर मुक्त कर दिया जाए. कुछ जानकारों का मानना है कि सरकार आयकर के स्लैब में बहुत छेड़छाड़ करेगी, ऐसा नहीं लगता. हां, यह जरूर हो सकता है कि होम लोन आदि में कुछ छूट दे दी जाए. जानकारों का कहना है कि सरकार कमेटी की सिफारिशों पर अमल करेगी तो उच्च आय वर्ग पर टैक्स दर घटने के कारण उसका राजस्व तेजी से घटेगा.

आने वाले बजट में आयकर कटौती की जो चर्चा है, उसमे कुछ और भी दिलचस्प है. सूत्रों के मुताबिक, सरकार आयकर में राहत के प्रस्ताव पर कुछ इस तरह का भी विचार कर रही है कि टैक्स देने वालों को कम से कम 10 फीसदी कम टैक्स देना पड़े. यानी अगर आप सलाना एक लाख रूपये का टैक्स देते हैं तो आपको दस हजार का कम कर चुकाना पड़े. इसके लिए एक तरीका यह है कि आयकर के ढांचे को जस का तस रखते हुए आयकर से हर तरह के सरचार्ज हटा दिए जाएं. दूसरा तरीका यह है कि आयकर के स्लैब में बदलाव किया जाए.

यानी अगर आयकर में कटौती हुई भी तो वह कैसे और किस तरह होगी, इसकी सूरत बहुत साफ नहीं है. ऊपर से मोदी सरकार अपने फैसलों से सभी को चौंकाती रही है. पिछले साल जब सभी ने यह मान लिया था कि आयकर में छूट मिलेगी ही. तब उसने ऐसा नहीं किया था. इसके बाद मंदी से निपटने के लिए जब सभी लोग मान रहे थे कि सरकार लोगों के हाथ में पैसे पहुंचाने के लिए कुछ करेगी. तब सरकार ने सबको चौंकाते हुए कंपनियों को सौगात दी और कॉरपोरेट टैक्स में कमी कर दी. इसलिए आने वाले बजट में आयकर पर क्या बदलाव होगा, यह बजट आने के बाद ही ठीक-ठीक समझ आएगा.