उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने नोएडा के एसएसपी वैभव कृष्ण को निलंबित करके नोएडा वीडियो कांड में बड़ी कार्रवाई की है. लेकिन इसके बाद भी इस मामले में सवालों की कोई कमी नहीं है. वैभव कृष्ण ने पुलिस अधिकारियों के भ्रष्टाचार के बारे में एक गोपनीय रिपोर्ट लगभग ढाई महीने पहले उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह और अपर मुख्य सचिव (गृह) अवनीश अवस्थी को भेजी थी. उस पर मुख्यमंत्री ने तुरंत कार्रवाई का निर्देश दे दिया था. लेकिन इसके बावजूद इस पर तब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई जब तक ऐसा करना मजबूरी नहीं बन गया. सवाल यह है कि जिन लोगों ने ऐसा किया उन दोषियों पर अब तक कोई गाज क्यों नहीं गिरी? क्या सरकार वैभव कृष्ण के मामले को सिर्फ एक अश्लील वीडियो का ही मामला बनाकर उसे उनके चारित्रिक दुराचरण तक ही सीमित कर देना चाहती है? क्या शासन के स्तर पर कोई है जो भ्रष्टाचार के आरोपियों को बचाना चाहता है?

पुलिस भ्रष्टाचार का यह मामला पिछले दिनों वैभव कृष्ण के खिलाफ कुछ अश्लील वीडियो वायरल होने के बाद चर्चा में आया था. वीडियो वायरल होने के बाद वैभव ने दो जनवरी को नोएडा में एक प्रेस कांफ्रेंस करके यह दावा किया था कि यह वीडियो फर्जी हैं. उन्होंने नोएडा के सेक्टर 20 थाने में इसकी रिपोर्ट भी कराई थी. उन्होंने आरोप लगाया था कि उन्होंने पांच आईपीएस अफसरों सहित कुछ अन्य अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों की जानकारी शासन को भेजकर इन अफसरों के खिलाफ जांच करवाने का अनुरोध किया था. इसी कारण उन्हें बदनाम करने के लिए इस तरह के फर्जी वीडियो वायरल किए जा रहे हैं.

वैभव कृष्ण की शिकायत पर वीडियो प्रकरण की जांच हापुड़ के पुलिस अधीक्षक को सौंप दी गयी और वीडियो की निष्पक्ष फोरेंसिक जांच के लिए उन्हें गुजरात भेजा गया. गुजरात की रिपोर्ट में जब ये वीडियो सही पाए गए तो सरकार ने आनन-फानन में वैभव को निलंबित कर दिया. उनके खिलाफ इस वीडियो प्रकरण के साथ-साथ आचरण नियमावली का उल्लंघन करने की विभागीय जांच के आदेश भी दिए गए हैं. वैभव पर गोपनीय सरकारी दस्तावेज लीक करने का आरोप भी लगाया गया है. यह गोपनीय दस्तावेज वही रिपोर्ट है जिसे वैभव ने करीब ढाई महीने पहले शासन को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजा था और जिसमें पांच आईपीएस अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये गये थे.

वैभव कृष्ण की रिपोर्ट में तत्कालीन एसएसपी गाजियाबाद सुधीर कुमार सिंह, एसपी सुल्तानपुर हिमांशु कुमार, एसएसपी एसटीएफ राजीव नारायण मिश्र, एसपी बांदा गणेश साहा और एसपी रामपुर अजय पाल शर्मा और कुछ अन्य के खिलाफ गंभीर आरोप थे. वैभव कृष्ण के मुताबिक़ पिछले वर्ष 23 अगस्त को गिरफ्तार चार कथित पत्रकारों के एक गिरोह की काल डिटेल, चैट एवं कुछ अन्य सुबूतों की जांच के आधार पर वह रिपोर्ट तैयार की गयी थी.

पहले जब वीडियो वायरल हुए तो निशाने पर सिर्फ वैभव कृष्ण ही थे. लेकिन जब यह जानकारी सार्वजनिक हुई कि वे काफी पहले ही पुलिस अधिकारियों की भ्रष्ट लॉबी के खिलाफ जांच के लिए आला अधिकारियों को लिख चुके हैं तो यह सवाल उठने स्वाभाविक थे कि आखिर उनकी रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और क्या इन वीडियोज के वायरल होने से उसका भी कोई संबंध है?

छानबीन में यह बात सामने आयी है कि जिन आला अधिकारियों को वैभव कृष्ण ने अपनी रिपोर्ट भेजी थी उन्होंने न सिर्फ उसे फाइलों में बंद कर दिया बल्कि इस बारे में प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशों की भी खुलेआम अवहेलना की. जानकारी के मुताबिक़ वैभव के बिना तारीख वाले पत्र मुख्यमंत्री कार्यालय को अक्टूबर में मिले थे और 25 अक्टूबर को ही मुख्यमंत्री के निर्देश पर इन्हें आवश्यक कार्रवाई के लिए गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय को भेज दिया गया था. लेकिन मुख्यमंत्री के निर्देश के बावजूद ये ढाई महीने तक ठंडे बस्ते में पड़े रहे. अगर वैभव कृष्ण के वीडियो वायरल होने के बाद इनसे जुड़ी जानकारी सार्वजनिक नहीं होती तो उनकी रिपोर्ट की कहीं चर्चा तक नहीं होती. इसके बाद जिन पांच आईपीएस अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और ट्रांसफर-पोस्टिंग में लाखों की रिश्वत लेने वाले अपराधी गिरोहों से सांठ-गांठ जैसे गंभीर आरोप लगाए गये थे, उन्हें उनके पदों से हटाकर पीएसी में भेज दिया है. लेकिन लंबे समय तक मुख्यमंत्री के आदेश के बावजूद वैभव कृष्ण के पत्रों पर कोई कार्रवाई न होने से यह सवाल उठ रहे हैं कि भ्रष्टाचार के आरोपित इन अफसरों के तार क्या मुख्यमंत्री कार्यालय, गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय से भी जुड़े हुए हैं?

हो सकता है कि वैभव ने अन्य आईपीएस अधिकारियों पर आरोप किसी दुराग्रह या द्वेष भावना से लगाए हों. लेकिन मुख्यमंत्री के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद इन पत्रों पर किसी भी तरह की जांच न किया जाना आरोपों की पुष्टि ही करता दिखता है. अन्यथा शासन के स्तर पर जांच के बाद वैभव की रिपोर्ट को आसानी से ख़ारिज किया जा सकता था. लेकिन शायद आरोपों में सत्यता थी इसीलिए रिपोर्ट को दबाये रखने के लिए वही पुराना तरीका आजमाया गया कि पत्रों पर कोई संज्ञान ही नहीं लिया जाये. ताकि धीरे-धीरे बात खुद ही ख़त्म हो जाए. गौरतलब है कि वैभव कृष्ण की रिपोर्ट के आधार पर ही मुख्य सचिव के मीडिया निदेशक दिवाकर खरे को भी उनके पद से हटा दिया गया है. यानी सरकार ने एक तरह से यह मान लिया है कि यह पूरी तरह से गलत नही है.

इस मामले की गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि वैभव कृष्ण की प्रेस कांफ्रेंस के बाद सफाई देने के लिए खुद डीजीपी ओपी सिंह को सामने आना पड़ा. उन्होंने मीडिया से बात तो निष्पक्ष जांच की की लेकिन उससे पहले ही वैभव पर सर्विस रूल्स के उल्लंघन का आरोप लगा दिया. उन्होंने कहा कि एसएसपी गौतमबुद्ध नगर ने गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक किये हैं और इस बारे में उनसे स्पष्टीकरण मांगा जा रहा है. हालांकि डीजीपी के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि क्या वैभव के पत्रों पर इतने दिनों तक कोई संज्ञान न लिए जाने और मुख्यमंत्री के निर्देश अनदेखे किये जाने की भी कोई जांच होगी?

इस मामले में अब पुलिस के पूर्व अधिकारियों की ओर से भी सवाल उठाये जाने लगे हैं. राज्य के पूर्व पुलिस प्रमुख प्रकाश सिंह ने वैभव कृष्ण के निलंबन को गलत बताया है उनका कहना है कि “वैभव के निलंबन से गलत सन्देश जाएगा. ईमानदार और हिम्मती अफसर सहम जायेंगे. ऐसा प्रतीत होता है कि सीएम को उच्च स्तर पर सही राय नहीं मिल रही जिससे ऐसे फैसले हो रहे हैं.” प्रकाश सिंह मानते है कि अगर वैभव की रिपोर्ट पर सही तरीके से जांच हो गयी तो प्रदेश के कई बड़े नामों पर आंच आ सकती है.

प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव प्रशांत मिश्र कहते हैं कि मामले को दूसरी ओर मोड़ा जा रहा है. मामले की निष्पक्ष जांच जरुरी है. राज्य के एक एडीजी जसबीर सिंह ने भी नोएडा मामले में वैभव कृष्ण की रिपोर्ट के आधार पर पांच आईपीएस अफसरों के खिलाफ नोएडा के सेक्टर 20 थाने में तहरीर देकर आईपीएस एसोसिएशन से भी इस मुद्दे पर चर्चा की मांग की है. जसबीर सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर कहा है कि वैभव कृष्ण की रिपोर्ट में अफसरों द्वारा थानाध्यक्षों की पोस्टिंग की रेट लिस्ट और अपराधियों के साथ सांठ-गांठ के तमाम प्रमाण हैं. उन्होंने इसका संज्ञान लेते हुए आरोपित अफसरों को निलंबित करके उनके खिलाफ अलग से एफआईआर दर्ज करने की मांग की है. एडीजी जसबीर सिंह ने ढाई महीने पहले भेजी गयी रिपोर्ट पर अब तक कोई कारवाई न होने पर भी सवाल उठाये हैं

मुरादाबाद में तैनात आईपीएस जुगल किशोर के ट्वीट - “धुंआ उठ रहा है तो आग अवश्य है” को भी इसी प्रकरण से जोड़कर देखा जा रहा है. ट्रांसफर- पोस्टिंग के खेल से जुडी एक डायरी भी इन दिनों खूब चर्चा में है. इस डायरी में अलग-अलग थानों में पोस्टिंग के रेट दर्ज बताये जा रहे हैं.

इस बीच सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर ने लोकायुक्त के यहां इस मामले की सीबीआई जांच के लिए एक याचिका दायर कर दी है. आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर की पत्नी नूतन इस बारे में मुख्यमंत्री को उच्चस्तरीय जांच के लिए पत्र भी लिख चुकी हैं. इस पत्र में उन्होंने लिखा है कि “वैभव कृष्ण ने पहले ही इन अफसरों द्वारा थानाध्यक्षों की ट्रांसफर पोस्टिंग में 30 से 80 लाख तक लेने की शिकायत अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी तथा डीजीपी ओपी सिंह को की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.अतः इस प्रकरण में सीबीआई से उच्चस्तरीय तथा निष्पक्ष जांच की तत्काल आवश्यकता है ताकि आप द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध कही जा रही बात वास्तव में चरितार्थ हो तथा इस प्रकरण में उच्चतम स्तर तक जो भी व्यक्ति सम्मिलित हैं, उनके खिलाफ कठोरतम कार्रवाई हो सके.” लेकिन मुख्यमंत्री ने इस मामले में अभी तक सिर्फ एसआईटी जांच के ही आदेश दिये हैं.

वैभव कृष्ण का मामला एक पुलिस अफसर के कथित अश्लील वीडियो का मामला ही बनकर रह जाता है या फिर इसके धुंए की तह तक भी देखा जा सकेगा, यह तो इस मामले की जांच के अंतिम निष्कर्षों से ही तय होगा. लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यूपी पुलिस में ट्रांसफर और पोस्टिंग भ्रष्टाचार की एक बड़ी वजह हैं. अखिलेश सरकार के कार्यकाल में भी आगरा से पकडे गए एक सफेदपोश अपराधी के पास मौजूद डायरी में डीजीपी से लेकर थानेदार तक की रिश्वत के रेट देखे गए थे. तब उस मामले में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन डीजीपी बीएल बनर्जी तक का नाम खूब उछला था. लेकिन उस प्रकरण की कोई जांच रिपोर्ट आज तक सामने नहीं आ सकी है. भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा करने वाली योगी सरकार से इतनी उम्मीद तो की ही जानी चाहिए कि वह उस बात की पुनरावृत्ति नहीं होने देगी.

योगी सरकार ने दुराचरण के मामले में वैभव कृष्ण को निलंबित करके एक बड़ा संदेश देने की कोशिश तो जरूर की है लेकिन भ्रष्टाचार पर वैभव कृष्ण की रिपोर्ट पर होने वाली ठोस कार्रवाई से बहुत बड़ा सन्देश दिया जा सकता था. फिलहाल योगी सरकार यहां पर साफ़ चूक गयी है. लेकिन उसे इस बात का जवाब देना ही पडेगा कि अगर भ्रष्टाचार के दस्तावेज लीक करने की सजा निलंबन है तो भ्रष्टाचार की जांच को दबा देना और मुख्यमंत्री के निर्देश को न मानने की सजा क्या होनी चाहिए?