आईएएस अधिकारी निशांत जैन ने यूपीएससी-2015 की परीक्षा में 13वीं रैंक हासिल की थी. हिंदी माध्यम से तैयारी करने वाले जैन की यह सफलता बीते कुछ सालों में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में आया सर्वश्रेष्ठ नतीजा था. छात्र तबके में चर्चा बटोर रही उनकी किताब उनके अनुभवों के साथ-साथ उन सुझावों का पिटारा भी है जिसकी ज़रूरत छात्रों को जब-तब पड़ती रहती है.


भारतीय संविधान में अनुच्छेद 51(क) में उल्लिखित मूल कर्तव्यों में से एक कर्तव्य है-

‘व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करना, जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले.’

यानी इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में बेहतरी की ओर बढ़ने का प्रयास करते रहना चाहिए और जीवन में उत्कृष्टता की उपलब्धि करने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए.

हम अपने आस-पास के माहौल में यह भी निरंतर देखते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति यथासंभव कुछ न कुछ प्रयास करके ऊंचाई को छूने की कोशिश करता ही है. एक किसान चाहता है कि अगली बार वह बेहतर पद्धतियों और संसाधनों का प्रयोग कर पहले से ज्यादा और गुणवत्तापूर्ण फसल उगा सके. व्यापारी चाहता है कि उसके ग्राहक बढ़ते जाएं और बैलेंस शीट शिखर को छू जाए. नौकरी पेशा कर्मचारी का ख्वाब है कि उसका लंबित प्रमोशन जल्दी से जल्दी हो सके औऱ उसके वेतन ग्रेड में आशातीत बढ़ोतरी हो जाए. इसी तरह किसी भी परीक्षार्थी का इस दिशा में भरपूर प्रयास है कि वह परीक्षा में सफलता के लिए वांछित सभी चरणों में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर अपने सपनों का साकार कर लें.

बेहतरी की चाहत स्वाभाविक है और बेहतरी की यह चाहत जीवन को सार्थकता की ओर ले जाने में सहायक होती है. लेकिन कभी-कभी आगे बढ़ने और लक्ष्य प्राप्त करने का यह जुनून या फिर उससे भी ज्यादा एक फितूर का रूप लेने लगता है. कुछ परीक्षार्थियों को ऐसा लगने लगता है कि यदि उन्हें यूपीएससी की इस प्रतिष्ठित और सर्वोच्च मानी जाने वाली परीक्षा में पास होना है तो उन्हें हर काम परफेक्शन के साथ करना होगा. इसी धुन में वे ‘परफेक्शनिस्ट’ या ‘अतिमानव’ बनने की कीशिश करने लगते हैं. वे यह भूल जाते हैं कि ‘परफेक्ट’ जैसा कुछ भी नहीं होता और न ही सफलता के लिए आपको परफेक्ट बनने की दरकार है.

परफेक्शनिस्ट बनने की जिद खुद से एक ज्यादती है क्योंकि कोई भी चीज या कोई भी व्यक्ति स्वयं में पूर्ण या परफेक्ट नहीं होता है. अंग्रेजी में एक कहावत भी है – There is no perfect way, There is many good ways. (कोई एक तरीका सबसे अच्छा नहीं होता बल्कि कई अच्छे रास्ते होते हैं.)

हममें से कोई भी अतिमानव या सुपरमौन नहीं है और न ही ऐसा बनना वांछनीय है. ज़रूरत है तो सकारात्मक सोच के साथ, व्यापक व संतुलित नज़रिया अपनाकर सही दिशा में निरंतर प्रयास करते जाने की, ताकि जिस लक्ष्य की चाह है, वह हासिल हो सके.

परफेक्शन के इसी जुनून के चक्कर में कुछ अभ्यर्थी बहुत महत्वकांक्षी और गैर-व्यावहारिक योजनाएं बनाते हैं. ये हवाई प्लान ज़मीन से कोसों दूर होने के कारण वास्तविकता में परिणत न तो होने थे औऱ न ही हो पाते हैं. आपने अपने आस-पास ऐसे अभ्यर्थी ज़रूर देखे होंगे, जो प्लानिंग बहुत बड़ी-बड़ी करते हैं, पर लागू करने में बहुत पीछे रह जाते हैं.

कभी-कभी परीक्षा की तैयारी के दौरान हम परफेक्ट बनना चाहते हैं औऱ हर चीज को बेस्ट तरीके से करना चाहते हैं. जैसे- हमारा स्टडी मटेरियल, कोचिंग, टेस्ट सीरीज, रिवीजन, नोट्स, दिनचर्या सभी कुछ सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए, तभी हमारी बेस्ट रैंक आएगी और हम टॉपर बनेंगे.

इस तरह अतिशय भावुकता में हम बड़ी-बड़ी योजनाएं और आदर्श दिनचर्या का शेड्यूल तो बना लेते हैं, पर जब उनके क्रियान्वयन की बारी आती है तो शुरूआती उत्साह धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगता है और हम अपने लक्ष्यों से पीछे होते जाते हैं, जिससे लक्ष्य लंबित होने लगते हैं और एक के बाद एक बैकलॉग बढ़ता जाता है.

इस बैकलॉग का स्वाभाविक परिणाम धीरे-धीरे खीझ, कुंछा और तनावके रूप में सामने आता है और हम नाहक ही परेशान और व्यग्र रहने लगते हैं. इस स्ट्रेस औऱ व्यग्रता का असर हमारी पढ़ाई औऱ तैयारी पर स्वाभाविक तौर पर पड़ता ही है और आदर्शवादी लक्ष्य पाना तो दूर, हम सामान्य से लक्ष्यों को पाने में ही खुद को अक्षम पाने लगते हैं. लाख टके का सवाल यह है कि अनावश्यक रूप से उपजी इस मुसीबत और नाकारात्मकता से छुटकारा पाने के लिए हम पहले से ही क्या करें, क्या न करें और कैसे करें?

इस स्थिति से बचने के लिए बेहतर समाधान यह हो सकता है कि जब भी हम योजनाएं या स्टडी प्लान बनाएं तो उसमें अपनी क्षमता, सामयिक परिस्थितियां य़ा स्टडी प्लान बनाएं तो उसमें अपनी क्षमता, सामयिक परिस्थितियां, अपने उद्देश्यों, अपनी महत्वकांक्षा का स्तर और उपलब्ध समय आदि को ध्यान में रखते हुए प्लानिंग करें. यह प्लानिंग व्यावहारिकता और वास्तविकता के धरातल पर रहकर बनाएं, न कि खुद को सुपरमैन समझकर. हर विद्यार्थी की क्षमताएं और अध्ययन व अभ्यास का स्तर व कौशल भिन्न-भिन्न होते हैं. प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में विशिष्ट होता है. किसी भी सफल व्यक्ति या टॉपर को ज्यों का त्यों कॉपी करने के चक्कर में अपने लिए अव्यावहारिक और कुछ हद तक असंभव योजनाएं बनाना कहां की समझदारी है.

किसी सफल व्यक्ति से प्रेरणा लेना या उससे मार्गदर्शन लेना अच्छी बात है, पर अपने व्यक्तित्व औऱ तैयारी के स्तर को अनदेखा करके परफेक्शन के पीछे भागना आपके लक्ष्यों को वास्तविकता से दूर ले जा सकता है. परीङा की तैयारी के दौरान कभी-कभी एक और उलझन होती है. हम हर महीने नए टॉपर का इंटरव्यू पढ़ते हैं औऱ हर टॉपर से प्रभावित होते हैं. यह स्वाभाविक है और उससे प्रेरणा और मोटिवेशन लेने में कोई समस्या भी नहीं हैं. पर कभी-कभी हम किसी व्यक्ति या टॉपर को परफेक्ट समझने के चक्कर में हम आंख बंद करके उसका अनुकरण करने लगते हैं. मेरा यही आग्रह है कि प्रेरणा ले, पर अंधानुकरण न करें.

यहां यह भी समझना ज़रूरी है कि टॉपरों और अभ्यर्थियों में कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं होता. ज्यादातर टॉपर सफलता के बाद खुद स्वीकारते हैं कि उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि वे ऐसा असाधारण प्रदर्शन करेंगे. कोई भी समझदार अभ्यर्थी सही तरीके से परिश्रम और पुरुषार्थ के द्वारा टॉपर बन सकता है. पर टॉपरों के इंटरव्यू पढ़कर कई अभ्यर्थी यह सोचकर कनफ्यूज हो जाते हैं कि कौन सी रणनीति सर्वेश्रेष्ठ है? कारण यह है कि हर टॉपर की पृष्ठभूमि, व्यक्तित्व और रणनीति अलग-अलग हेती है. उदाहरण के तौर पर, किसी टॉपर ने किसी जॉब के साथ तैयारी की थी, किसी ने पढ़ाई करते-करते तैयारी की तो कोई सब कुछ छोड़कर समर्पित रूप से तैयारी करके सफल हुआ. अब यदी हम सभी टॉपरों का एक साथ अनुकरण करने लगेंगे तो ऊहापोह होना तय है.

मैं आपसे यही कहूंगा कि आपके लिए वही रणनीति श्रेष्ठ है जो आपके व्यक्तित्व औऱ अध्ययन-अनुभव-तैयारी के स्तर के अनुकूल हो. बस इतना सा करना है कि एक बेहतर और व्यावहारिक रणनीति बनाकर उसका क्रियान्वयन करें और सुधार की कोशिश हमेशा जारी रखें. छोट-छोटे व्यावहारिक लक्ष्य बनाएं औऱ उन्हें धीरे-धीरे पूरा करते जाएं और तनावमुक्त रहें.

जब हम परफेक्शन पर बात कर ही रहे हैं तो हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि हम भले ही काल्पनिक परफेक्शन से दूर रहें, पर अपना बेस्ट देने में भी कोई कसर न छोड़े. अगर आप अपने लक्ष्य को लेकर गंभीर हैं तो आप अपनी पूरी क्षमता और पूरे मनोयोग से तैयारी करे और अपना सर्वश्रेष्ठ दें ताकि आप अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर वांछित परिणाम हासिल कर सकें. ये औऱ बात है कि परिणाम आपके पक्ष में आए या नहीं पर कम से कम यह तसल्ली तो रहेगी कि मैंने अपना बेस्ट किया और अपनी कोशिशों में कोई कसर नहीं छोड़ी. यदि आप पूरे मन और विश्वास से पुरूषार्थ करते हैं, तो आपकी सफलता की संभवनाएं कई गुना बढ़ जाती हैं.

जब आप अपनी यात्रा को मस्ती के साथ जीना शुरू कर देंगे तो आपको महसूस होगा कि कभी-कभी सफर मंजिल से भी ज्यादा खूबसूरत होता है.

किसी शायर ने लिखा भी है – मंजिल मिले या नहीं, मुझे उसका गम नहीं, मंजिल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है.

इसलिए ‘चरैवेति-चरैवति’ का मंत्र अपनाएं और ‘यूं ही चला चल राही’ की तर्ज पर अपना ‘बेस्ट’ देते हुए अपने सपनों की राह पर सही दिशा में पूरी हिम्मत के साथ बढ़ते जाएं.