1-प्रचंड बहुमत के साथ फिर केंद्र की सत्ता में आने के छह महीनों बाद ही मोदी सरकार को छात्रों और युवाओं के व्यापक असंतोष से जूझना पड़ रहा है. द प्रिंट हिंदी पर अपने इस लेख में वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता का मानना है कि मोदी सरकार उस वर्ग से उलझ पड़ी है, जो कभी उसका घोर समर्थक था मगर आज उससे निराश, नाउम्मीद और नाराज है.

मोदी-शाह की भाजपा ने देश के युवाओं को नाउम्मीद तो किया ही, उससे लड़ने पर भी उतारू हो गई

2-लजीज खानों और सस्ते कपड़ों के लिए मशहूर दिल्ली का शाहीन बाग इलाका पिछले एक महीने से एक अलग वजह से चर्चा में है. यहां पर कई दिनों से महिलाएं नए नागरिकता कानून और एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शन कर रही हैं. कई बार इस विरोध प्रदर्शन को खत्म करने की कोशिश की गई, लेकिन महिलाओं ने हटने से इनकार कर दिया. शाहीन बाग के इतिहास और वर्तमान को टटोलती बीबीसी पर चिंकी सिन्हा की रिपोर्ट.

शाहीन बाग़ ने इन मुसलमान ‘महिलाओं को दी है नई उड़ान’

3-सुप्रीम कोर्ट ने नए नागरिकता कानून को लेकर देश में जगह-जगह हो रही हिंसा पर चिंता जताई है. बीते हफ्ते एक मामले की सुनवाई के दौरान उसने कहा कि इस हिंसा के चलते देश मुश्किल हालात से गुज रहा है. इस संदर्भ में द वायर हिंदी पर इस लेख में अपूर्वानंद मानते हैं कि राज्य हमेशा से हिंसा का स्रोत रहा है और पहली बार भारत में वह अपनी मदद के लिए समाज में हिंसक गिरोह बना रहा है.

हिंसा अदालत को सोचने से रोक रही है, लेकिन हिंसा हो कैसे रही है?

4-उत्तर प्रदेश के पुलिस महकमे में पिछले कई दिन से चल रही खींचतान में बीते दिनों तब नया मोड़ आ गया जब नोएडा के पूर्व पुलिस कप्तान वैभव कृष्ण को सरकार ने सस्पेंड कर दिया. पिछले दिनों उनका एक महिला से चैट का वीडियो वायरल हुआ था जिसे उन्होंने फर्जी बताया था. लेकिन गुजरात की फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट में वह वीडियो और चैट सही बताया गया. इसके बाद वैभव कृष्ण को सस्पेंड कर दिया गया. न्यूजलॉन्ड्री हिंदी पर उत्पल पाठक की यह रिपोर्ट इस विवाद के एक कम चर्चित पक्ष की तरफ ध्यान खींचती है.

नोएडा एसएसपी वैभव कृष्ण का निलंबन और मीडिया कनेक्शन

5-जनवरी 1980 में जर्मनी में एक नई पार्टी वजूद में आई थी. इसका नाम था ग्रीन पार्टी. तब अराजक लोगों द्वारा बनाई गई पार्टी आज समाज के मध्य में है. बहुत से लोग इसे देश का सबसे बड़ा ‘डिरैडिकलाइजेशन प्रोजेक्ट ‘मानते हैं. व्यवस्था विरोधियों की यह पार्टी अब आम लोगों की पार्टी है. डॉयचे वैले हिंदी पर येंस थुराऊ का लेख.

ग्रीन पार्टी: कभी अराजक लोगों का जमावड़ा, आज आम लोगों की पार्टी