लखनऊ और गौतमबुद्ध नगर जिलों में पुलिस कमिश्नरी प्रणाली को लागू करने को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले 50 वर्षों में पुलिस सुधार का सबसे बड़ा कदम बताया है. मुख्यमंत्री ने कहा कि पुलिस एक्ट में भी 10 लाख से ऊपर की आबादी पर कमिश्नर प्रणाली लागू करने की बात है लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति न होने के चलते अब तक ऐसा नहीं हो सका. यह बात बिल्कुल ठीक है कि योगी सरकार ने पुलिस सुधारों के लिहाज से ऐसा करके एक बड़ा प्रयोग किया है. लेकिन यह प्रयोग कितना सफल होगा और इससे राज्य के इन दो जिलों में अपराध नियंत्रण पर कितनी कामयाबी मिल सकेगी इसको लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं.

नई प्रणाली लागू होने पर सबसे बड़ा बदलाव तो यह होगा कि पुलिस कमिश्नर को जो, एडीजी स्तर का अधिकारी है, आईपीसी और सीआरपीसी के तहत कई महत्वपूर्ण अधिकार मिल जाएंगे. नई व्यवस्था में पुलिस आयुक्त, अपर पुलिस आयुक्त, पुलिस उपायुक्त और सहायक पुलिस आयुक्त स्तर के अधिकारियों को 15 अधिनियमों के तहत मजिस्ट्रेट के विधिक अधिकार दे दिए गए हैं. इनमें गुंडा एक्ट, कारागार अधिनियम, अग्नि सेवा अधिनियम, विष अधिनियम आदि शामिल हैं. हालांकि आर्म्स एक्ट के मामले और शस्त्र लाइसेंस देने का अधिकार उसके पास नहीं होगा.

अनेक अधिकार प्राप्त करने के कारण पुलिस कमिश्नर अब पुरानी व्यवस्था की तरह जिलाधिकारी का सहयोगी अधिकारी न रहकर कई मामलों में उससे अधिक शक्ति रखने वाला और अधिक प्रभावशाली अधिकारी बन जाएगा. आईएएस और आईपीएस कैडर के बीच इसी कारण कमिश्नर प्रणाली को लागू करने को लेकर बड़ा टकराव था. शासन में अधिक प्रभाव रखने के कारण आईएएस कैडर पुलिस कमिश्नर प्रणाली को लागू होने से लंबे समय तक टलवाता रहा. अनौपचारिक बातचीत में कई आईपीएस और आईएएस अधिकारी भी इस बात को स्वीकार करते हैं.

पूर्व आईपीएस अधिकारी भी जहां दिल खोलकर योगी सरकार के इस फैसले की तारीफ कर रहे हैं वहीं पूर्व आईएएस अधिकारी इसे लेकर कई सवाल उठा रहे हैं. इनका मानना है कि नई व्यवस्था में पुलिस के अधिकार तो अवश्य बढ़ जाएंगे मगर इससे जिले के स्तर पर शक्ति संतुलन गड़बड़ा भी सकता है. उनका कहना है कि इस प्रणाली के लागू होने के बाद आम लोगों का जो संवाद डीएम के जरिए प्रशासन से होता था, वह नहीं हो पाएगा. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव योगेन्द्र नारायण के मुताबिक अब तक की व्यवस्था में यदि पुलिस के स्तर पर कोई गड़बड़ी होती थी तो डीएम जिले में शासन के प्रतिनिधि के रूप में संवाद के लिए हमेशा मौजूद रहता था. नई व्यवस्था लागू होने से यह संवाद पहले जैसा नहीं रह जाएगा. वे कहते हैं जिन जिलों में यह व्यवस्था पहले से लागू है वहां भी इसने कोई बड़े बदलाव नहीं किए हैं.

एक और पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन भी इस नई व्यवस्था को बहुत परिवर्तनकारी नहीं मानते. उनका कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में कोई कमी नहीं है. बल्कि डीएम-एसएसपी प्रणाली में तो बेहतर चैक एण्ड बैलेंस होता है जो कमिश्नर प्रणाली में संभव नहीं है. पूर्व आईएएस अधिकारी प्रताप सिंह कहते हैं, ‘‘यह प्रणाली इस मायने में तो ठीक है कि अभी तक लखनऊ में एक आईपीएस कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालता था अब 14 अधिकारी इसे संभालेंगे. लेकिन इसका लाभ किसी आदर्श स्थिति में ही हो सकता है. अगर ये 14 आईपीएस अधिकारी कमिश्नर के साथ मिलकर काम करेंगे तो ठीक लेकिन जैसी कि राज्य में परंपरा बन गई है कि यहां हर अधिकारी का अपना गाॅड फादर होता है. अगर ये स्थिति ही बनी रही तो फिर हर एक मसले पर 12-14 दिमाग अपने-अपने हित साधने के लिए काम करेंगे. प्रयोग है, कुछ दिन में खुद ही चीजें साफ हो जाएंगी.’’

हालांकि आईपीएस लाॅबी योगी सरकार के फैसले से गदगद है. पूर्व डीजीपी अरविन्द जैन निस्संकोच कहते हैं ‘‘यह एक एतिहासिक निर्णय है. आईएएस लाॅबी के दबाव में अब तक लागू नहीं हो पाया था. हमें मानना पड़ेगा कि अब वक्त 1861 के पुलिस एक्ट से बाहर आने का है.’’ पूर्व डीजीपी और अब भाजपा नेता बृजलाल का कहना है कि ‘‘इस फैसले से एक मिथक टूट गया कि ‘‘यूपी में पुलिस कमिश्नर व्यवस्था लागू हो ही नहीं सकती.’’ पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता तो इसके लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ करते हुए कहते हैं कि ‘‘मैं मुख्यमंत्री जी को मुबारकबाद देना चाहूंगा कि उन्होने एक बोल्ड स्टेप लिया. यह मामला 1977 से चला आ रहा था. देश के अलग-अलग राज्यों के 71 शहरों में यह व्यवस्था थी तो यूपी में क्यों न हो?’’

उत्तर प्रदेश के एक और पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह तो इससे भी आगे जाकर कहते हैं, ‘‘ये किसी क्रान्ति से कम नहीं है. हम मुख्यमंत्री जी के अत्यन्त आभारी हैं. तमाम आयोगों ने इस प्रणाली की संस्तुति की थी. इसके लागू होने से जनसुविधाओं को नया आयाम मिलेगा.’’

लेकिन पूर्व आईएएस अधिकारी एसपी सिंह इसे एक दूसरे रूप में देखते हैं. ‘‘आईपीएस अधिकारियों द्वारा इसे अधिकार पाने की लड़ाई में जीत के रूप में प्रचारित किया जाना मेरी समझ से परे है. जिस लखनऊ जिले में अब तक एक एसएसपी के पास पूरे जिले की कमान थी, नई व्यवस्था में उसके आधे हिस्से में 14 आईपीएस अधिकारी होंगे. यानी एक आईपीएस के हिस्से में दो-दो थाने. इससे सीओ और थानाध्यक्ष की तो अहमियत ही खत्म हो जाएगी. हम तो यह देखना चाहते हैं कि यह फैसला पुलिस की एफीशंसी बढ़ाता है या आईएएस संवर्ग का अपमान. हम छह महीने बाद इसकी समीक्षा करेंगे.

कुछ अन्य विश्लेषक भी इसे आईपीएस-आईएएस के टकराव के रूप में देखे जाने से सहमत नहीं हैं. उन्हे लगता है कि इसे एक सुधारात्मक कदम के रूप में देखा जाना चाहिए. लेकिन राजनीतिक दल इसे विशुद्ध राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं. अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने इसे लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश बताया है. कांग्रेस ने इसे निरर्थक घोषित कर दिया है. और मायावती ने इस मामले में सरकार को दलगत राजनीति से उपर उठकर काम करने की सलाह दे डाली है. उन्होंने कहा कि सिर्फ कुछ शहरों में व्यवस्था बदलने से कानून-व्यवस्था में सुधार होने वाला नहीं.

इससे पहले पुलिस आयुक्त व्यवस्था को 1976-77 में कानपुर में लागू करने घोषणा हुई थी, मगर वह परवान नहीं चढ़ सकी. आईपीएस और पीपीएस एसोसिएशन अनेक बार इस बारे में प्रस्ताव भी सरकार को भेज चुकी थी. मगर जब 27 दिसम्बर 2018 को तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक ने लखनऊ, कानपुर और गाजियाबाद जैसे 20 लाख की आबादी से बड़े शहरों में इस व्यवस्था को पायलट प्रोजक्ट के तौर पर लागू करने की सिफारिश की तो उसके बाद सरकार भी इस दिशा में गंभीर दिखी.

आयुक्त व्यवस्था के लागू होने से गुंडों, गेंगस्टरों और अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने में आसानी और कर्फ्यू व धारा 144 लगने में सुविधा होने जैसे कई लाभों की बात की जा रही है. लेकिन इस प्रणाली से आशंकित लोगों को लगता है कि वर्तमान व्यवस्था में पीड़ित व्यक्ति जिलाधिकारी के पास न्याय के लिए आसानी से चला जाता था. क्योंकि वहां फरियाद करने पर हवालात या प्रताड़ना का भय नहीं होता था. लेकिन नई व्यवस्था में थाने में जा पाने की हिम्मत न रखने वाला आम आदमी बड़े-बड़े आईपीएस अधिकारियों के पास जाकर कैसे अपनी व्यथा सुना पाएगा?

इन लोगों को लगता है कि नई व्यवस्था पुलिस अधिकारियों की एक बहुत पुरानी भावनात्मक मांग की पूर्ति से अधिक कुछ नहीं है और अगर इसको लागू करने के साथ पुलिसिंग के चरित्र और कार्य प्रणाली को सुधारने पर ध्यान न दिया गया तो इसका कोई फायदा नहीं होने वाला.

कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर ही योगी सरकार सत्ता में आई थी. लेकिन एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि राज्य सरकार इस मामले में सुधार करने में असफल रही है. कुल अपराधों के लिहाज से 2018 में राज्य में 5,85157 आपराधिक मामले दर्ज हुए थे जो देश भर के अपराधों का लगभग 12 फीसदी है. महिलाओं के प्रति अपराध में भी 59,445 मामलों के साथ उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर रहा. आर्थिक अपराधों में भी 14.6 फीसदी मामलों के साथ उत्तर प्रदेश ही सबसे ऊपर था. शहरी महिला अपराधों के लिहाज से 2736 मामलों के साथ उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का देश में चौथा स्थान रहा.

कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर 3000 से ज्यादा मुठभेड़ों के बावजूद ठोस सुधार न होना योगी सरकार की एक बड़ी कमजोरी बनता जा रहा है. और इसकी सबसे बड़ी वजह पुलिस की कार्य संस्कृति और उसे मिलने वाला राजनीतिक संरक्षण है. योगी सरकार ने सत्ता में आते ही इस स्थिति में बदलाव के प्रयास किए थे. खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शुरूआती दिनों में पुलिस थानों का मुआयना करते, सफाई करते हुए और फरियादियों के लिए गुड़-पानी का इन्तजाम करते हुए खूब दिखाई दिए थे. लेकिन भ्रष्ट और मक्कार हो चुके पुलिस तंत्र ने उन्हे भी पचा ही लिया. ऐसे में कमिश्नर प्रणाली की शुरूआत कुछ प्रभाव दिखा पाएगी या फिर इसका हश्र भी दूसरे अन्य कार्यक्रमों जैसा ही होगा इसका फैसला तो कुछ समय बाद ही हो पाएगा, फिलहाल तो योगी सरकार के इस कदम को क्रान्तिकारी बताने के लिए ही पुलिस अधिकारियों में होड़ मची हुई है.