नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी पर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बारे में एक बात हर कोई कहता नज़र आ रहा है कि यह आंदोलन इतनी तेजी से इसलिए आगे बढ़ रहा है क्योंकि इसमें लड़कियां और महिलाएं बराबरी से हिस्सा ले रही हैं. देश में इसकी सबसे बड़ी मिसाल दिल्ली के शाहीन बाग में चल रहे महिलाओं के प्रदर्शन को कहा जा सकता है. नोएडा, दिल्ली और फरीदाबाद को आपस में जोड़ने वाली मुख्य सड़क पर महिलाओं का यह आंदोलन 15 दिसंबर, 2019 से चल रहा है. यानी उस दिन से, जिस दिन दिल्ली पुलिस ने जामिया मिलिया इस्लामिया में घुसकर लाठी चार्ज किया था.

प्रदर्शन में पहले दिन से हिस्सा ले रही शहनाज इसके बारे में पूछने पर कहती हैं कि ‘मोदीजी ने हमें हमारे घरों से बाहर निकालने की तैयारी तो पहले ही कर ली है. अब हम सड़क पर ही तो आ चुके हैं. ऐसे में सड़क पर न बैठें तो कहां जाएं?’ पास ही बैठी शीबा इसमें जोड़ती हैं कि ‘मोदीजी को सीएए वापस लेना पड़ेगा और जब तक ऐसा नहीं होगा, हम चाहें मर-मिट जाएं, हम यहां से नहीं हिलेंगे.’ राजनीति और कानून की बारीकियां बहुत अच्छे से न समझने वाली इन महिलाओं की सीएए को लेकर क्या राय या डर हैं, इसका अंदाजा साठ वर्षीय मेहरुन्निशा की बातों से भी लग जाता है. वे कहती हैं कि ‘हमें इतना ही पता है कि इससे हमारे संविधान को, हमारे मुल्क को और हमारे बच्चों को खतरा है. हम किसी डिटेंशन कैंप में नहीं जाना चाहते हैं. वैसे तो कब्रिस्तान पास में ही है लेकिन अच्छा होगा अगर हम यहीं दब जाएं.’

यहां पर महिलाओं का एक समूह एक साथ हम तक अपनी बातें पहुंचा देना चाहता है. इनमें से एक ज़ेबा कहती हैं कि ‘वे (सरकार) अपनी जिद दिखाएं और हम अपनी जिद दिखाएंगे.’ इस पर एक अन्य महिला का कहना है कि ‘लेकिन हम कागज नहीं दिखाएंगे’ और इसी क्रम में तीसरी आवाज आती है ‘अगर होंगे तो भी नहीं दिखाएंगे.’ इन बातों के बाद ज़ेबा फिर अपनी बात कहना शुरू करती हैं कि ‘हम नौ-दस पीढ़ियों से यहां रहे हैं. वे हमें कैसे हिला सकते हैं. लेकिन जनता जरूर ऐसा कर सकती है. अगर हम उन्हें उठा सकते हैं तो उन्हें गिरा भी सकते हैं. इस बार ऐसे गिरेंगे कि चाय बेचने लायक भी नहीं रहेंगे. शायद वो नहीं जानते कि इस बार उनका पाला हिंदुस्तान की औरतों से पड़ा है.’

प्रदर्शन कर रही महिलाएं

आंदोलन में हिस्सा ले रही इन महिलाओं में एक बड़ा हिस्सा गृहणियों का है. आंदोलन के दौरान अपने रूटीन के बारे में बात करते हुए इनमें से ज्यादातर महिलाएं कहती हैं कि वे सुबह-शाम घर जाकर अपनी जिम्मेदारियां निपटाती हैं और फिर यहां धरने पर मुस्तैद हो जाती हैं. वे महिलाएं जिनके बच्चे हैं, उन्हें अपने साथ लेकर आती हैं. विरोध प्रदर्शन में शामिल बच्चों की उम्र 20 दिन से लेकर चंद तक महीने भी है. यह मज़ेदार है कि जो बच्चे बोल सकते हैं वे आज़ादी और इंकलाब-ज़िंदाबाद जैसे नारे लगाते रहते हैं.

जैसे-जैसे शाम ढलने लगती हैं, महिलाओं की गिनती और आसपास की चहल-पहल बढ़ने लगती है. यह बात जरा उलटबांसी सी ही लगती है कि धुंधलके का जो वक्त आम तौर पर महिलाओं के घर पर कैद या सुरक्षित हो जाने का माना जाता है, उसी समय शाहीन बाग की इस सड़क पर हर दिशा से महिलाएं आती हुई दिखाई देती हैं. वह भीड़ जो दोपहर तीन बजे के वक्त लगभग दो सौ के करीब थी, वह शाम छह बजते-बजते लगभग तीन गुने से ज्यादा हो चुकी है.

शाम को कामकाज के बाद इकट्ठा होती महिलाएं

इस भीड़ के बढ़ने की वजह बताते हुए नरगिस कहती हैं कि ‘यह अभी और बढ़ेगी. वे महिलाएं जो कामकाजी हैं, वो रोज शाम को इकट्ठी होकर रात भर धरना प्रदर्शन करती हैं. उनका साथ हमारी दादी-नानी यानी बुजुर्ग महिलाएं देती हैं. दोपहर के वक्त गृहणियां मोर्चा उठाए रहती हैं. इनमें से ज्यादातर के छोटे बच्चे हैं और इतनी ठंड में प्रोटेस्ट करने के कारण वो बीमार पड़ने लगे थे. इसलिए रात में उन्हें घर भेज दिया जाता है.’ अपने बारे में बताते हुए नरगिस कहती हैं कि वे पिछले महीने तक शाहीन बाग के ही एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थीं लेकिन इस विरोध प्रदर्शन में लगातार बने रहने के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी है. वे एक समूह की तरफ इशारा करते हुए बताती हैं कि वे उनके स्कूल में पढ़ाने वाली महिलाएं हैं जो छुट्टी के बाद यहां पहुंची हैं.

एक निजी कंपनी में करने वाली नाज़िया हुसैन कहती हैं कि ‘हम घर और आंदोलन दोनों को चलाए रखना चाहती हैं इसलिए दिन में एक ग्रुप यहां पर होता है और शाम के बाद दूसरा. यह सोच-समझकर नहीं किया गया है. अपने आप ही अरेंज हो गया है. हममें कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने महीने भर से इत्मीनान से कुछ खाया नहीं है तो कई ऐसे हैं जो नींद भर सोये नहीं है.’ आगे नाज़िया बहुत भावुक होकर पूछती हैं कि ‘आपको पता ही होगा इस सदी में आया यह सबसे सर्द, सर्दी का मौसम है.’ हमारे सहमति जताने पर वे कहती हैं कि ‘और वैसे ही यह सबसे सर्द सरकार है.’

बच्चों के साथ प्रदर्शन में पहुंची महिलाएं

ऐसा नहीं है कि इन कामकाजी महिलाओं में केवल नियमित आय वाली महिलाएं ही शामिल हैं. शाहीन बाग में प्रेस की दुकान चलाने वाली राबिया (बदला हुआ नाम) कहती हैं कि वे सुबह से दोपहर तक दुकान और घर का काम करती हैं. इसके बाद, रोजाना बच्चों को लेकर धरने पर बैठती हैं. राबिया का कहना है कि ‘वोट देते वक्त ही अगर सरकार ने हमसे कागज़ों के बारे में पूछा होता तो शायद हम उन्हे ठीक से जवाब दे सकते थे. लेकिन पहले तो उन्होंने वोट ले लिया, अब हमसे हमारी पहचान पूछ रहे हैं. अगर हम (वोटर) कोई नहीं तो आप (सरकार) भी कोई नहीं हैं.’

लोगों के घर में हाउस-हेल्प का काम करने वाली वज़ीफा बेगम अपना किस्सा बताते हुए कहती हैं कि वे पूर्णिया बिहार की रहने वाली हैं और दसियों साल से अपना घर-बार छोड़कर दिल्ली में किराए के मकानों में रह रही हैं. वज़ीफा कहती हैं कि ‘मैं सुबह जाकर कोठियों में काम करती हूं. फिर घर का काम निपटाती हूं और इसके बाद रात तक के लिए धरने पर आकर बैठती हूं.’ इसकी वजह पूछने पर वज़ीफा खुद को नागरिक साबित न कर पाने की आशंका जताती हैं. वे हताशा से कहती हैं कि ‘अगर हमसे कागज़ मांगे गए तो हम तो कहां से लाएंगे. हमारे वहां पे (बिहार में) सैलाब आते हैं. सबकुछ खतम हो चुका है. हमें देश से निकाल देंगे तो हम कहां जाएंगे.’

बिहार के ही समस्तीपुर जिले से ताल्लुक रखने वाली रेहाना खातून भी ऐसी ही कहानी कहती हैं. वे बताती हैं कि उनकी उम्र साठ साल से ऊपर है और वे मधुमेह, थायरॉइड और हाई ब्लडप्रेशर जैसी बीमारियों का शिकार हैं. प्रदर्शन में शामिल होने की वजह पूछने पर रेहाना कहती हैं कि ‘मैं इतनी उम्र और बीमारी में सिर्फ हिम्मत ही दिखा सकती हूं. मेरे चार बच्चों में से तीन की पैदाइश हमारे गांव वाले घर पर हुई थी, उनके जन्म से जुड़ा कोई दस्तावेज नहीं है. और जब बच्चों का कोई कागज नहीं है तो मैं अपना कहां से लेकर आऊंगी. वह भी तब जब मेरे मां-बाप, सास-ससुर सब गुजर चुके हैं और अपने लोगों से छूटे हमें कई साल बीत चुके हैं.’

प्रदर्शन स्थल के पास लगी कलाकृति और संदेश

प्रदर्शन में रोज हिस्सा ले रही 17 साल की सबा बताती हैं कि वे मेडिकल के एंट्रेंस एग्जाम की तैयारी कर रही हैं लेकिन बीते एक महीने से उन्होंने अपनी पढ़ाई-लिखाई को किनारे रख दिया है. इसकी वजह पूछने पर उनका कहना था कि ‘अभी तो यही ज्यादा ज़रूरी लग रहा है. जब देश रहेगा, हम लोग रहेंगे तब तो डॉक्टर बनेंगे.’ सबा की तरह ही आरिफा और ज़ैनब भी इस आंदोलन में हिस्सा लेने आई हैं. जामिया मिलिया इस्लामिया से ग्रेजुएशन कर रही ये लड़कियां कहती हैं कि ‘हमारी यूनिवर्सिटी पर हुए हमले के बाद हमने इस आंदोलन की ज़रूरत को सबसे ज्यादा शिद्दत से महसूस किया है, इसीलिए यूनिवर्सिटी के साथ-साथ हम यहां पर भी सॉलिडैरिटी दिखाने जरूर पहुंचते हैं.’

आंदोलन की व्यवस्था देखने वाली सामाजिक कार्यकर्ता शाहीन कौसर बताती हैं कि ‘इन महिलाओं ने बाबरी पर कुछ नहीं कहा, तीन तलाक पर चुप रहीं, यहां तक कि कश्मीर पर भी चुप रहीं. लेकिन जिस दिन जामिया में बच्चों पर लाठियां बरसाईं गई, उस दिन ये भी वहां मौजूद थीं. इन्होंने अपने आंखों से अपने बच्चों को पिटते हुए देखा और उसके बाद से ये सड़क पर आकर जम गई हैं.’ शाहीन कौसर से हमारी बातचीत के दौरान हमें पता चलता है कि मंच पर शाहीन बाग एरिया के एसएचओ महिलाओं को संबोधित करने आ रहे हैं और उनसे हमारी बात अधूरी रह जाती है.

एनआरसी-सीएए के विरोध में बनाया गया रोड-आर्ट
एनआरसी-सीएए के विरोध में बनाया गया रोड-आर्ट

मंच पर पहुंचे एसएचओ साहब यह अपील करते हैं कि महिलाएं उन्हें बगल की सड़क चालू करने दें क्योंकि सड़क बंद होने से आम लोगों को आने-जाने में परेशानी हो रही है. पुलिस की इस अपील का विरोध नारेबाज़ी से होता है. इस दौरान देखने वाली बात यह रही कि नारेबाजी शुरू तो महिलाओं की तरफ से होती है लेकिन इसमें ज़ोर तब आता है जब बगल की सड़क पर खड़े पुरुष भी इसमें शामिल हो जाते हैं. दिलचस्प यह है कि जैसे ही पुरुषों की तरफ से नारेबाज़ी शुरू होती है, तुरंत मंच से उन्हें शांत होने का निर्देश दिया जाता है. शाहीन कौसर मंच से कहती हैं कि ‘यह सिर्फ महिलाओं का विरोध है इसलिए यहां पर केवल उनकी राय सुनी और मानी जाएगी.’ कुछ मिनटों में तय होता है कि महिलाएं पुलिस की अपील मानने से इनकार कर रही हैं. इस इनकार की वजह पूछने पर एक बुजुर्ग महिला सत्याग्रह को बताती हैं कि ‘पहली बात तो पुलिस हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह से ले ही नहीं रही है. फिर हम आधी सड़क चालू करवाकर अपने लिए खतरा मोल क्यों लें? पता चले कल कोई राह चलते हम पर हमला कर दे या हमारी बेटियों को कुछ कह जाए. फिर एक नया मसला खड़ा हो जाएगा. और फिर इससे हमारा आंदोलन भी कमजोर होता है.’

सड़क खाली करने के मसले पर आसपास खड़े पुरुषों की राय जानने की कोशिश करने पर एक शख्स हमें अपना नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि ‘सड़क छोड़िए, पीछे मेरी तीन-चार दुकाने हैं. एक मेरी खुद की है और बाकी किराए पर उठाई हुई हैं. इनमें से कोई भी दुकान बीते एक महीने से नहीं खुली है. अपना नफा-नुकसान भूलकर हम लोग यह सोच रहे हैं कि बाकी दुकानों का किराया भी लिया जाए या नहीं. हमारे बच्चे भी स्कूल नहीं जा पा रहे हैं. तकलीफें हमें भी हैं लेकिन देश से निकाले जाने की तकलीफ से बड़ा क्या होगा?’ यहीं पर एक मोबाइल शोरूम चलाने वाले यासिर कहते हैं कि ‘यह हमारे लिए धर्मसंकट की स्थिति है कि अगर रोजी-रोटी चुनते हैं तो देश जाता है, देश चुनते हैं तो फाके पड़ने की नौबत आ रही है. लेकिन हम यह करने को तैयार हैं. जो चार किलोमीटर का चक्कर लगने से परेशान हैं, हमें उनकी परेशानी का एहसास है लेकिन वे हमारी भी तो सोचें. हमारा नहीं तो कम से कम इन औरतों का ख्याल करें. सरकार तो जाने कब करेगी?’

महिलाओं की राय को ही पूरी तवज्जो देने वाली बात पर लौटें तो इसके अलावा भी इस आंदोलन की कुछ खासियतें हैं. जैसे यहां किसी भी तरह के धार्मिक नारे लगाए जाने पर पाबंदी है. साथ ही, पब्लिक प्रॉपर्टी को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाने की बात भी कही जाती है. इसके लिए महिलाओं से यहां तक अपील की जाती है कि वे आसपास की दुकानों की रेलिंग पर बच्चों को लटकने से रोकें. वालंटियर लगातार इस बात का ख्याल भी रखते देखे जाते हैं कि कोई मीडियाकर्मी बनकर भी बगैर पहचान बताए लोगों से बातचीत न करे.

आंदोलन के लिए चंदा न देने की अपील करने वाले पोस्टर

इसके अलावा, मंच से लगातार यह अपील की जाती है कि इस प्रदर्शन के लिए कोई कमेटी नहीं बनाई गई है और इसके नाम पर लोग कोई चंदा न दें. इसके लिए हर जगह नो कैश, नो पेटीएम और नो अकाउंट वाले बैनर भी लगाए गए हैं. लेकिन लोगों को अपनी तरफ से चीजें बंटवाने और लोगों की मदद करने से नहीं रोका गया है. बीच-बीच में समोसे, बिस्किट जैसी नाश्ते की चीजें बांटने या बैठने के लिए दरी और रोशनी के इंतजामात भी लोगों की तरफ से ही किए जाते हैं.

चलते-चलते, चूंकि यह सर्दियों का मौसम है इसलिए बीच-बीच में चाय की तलब लगना सहज ही है. विरोध प्रदर्शन में आए लोग भी अक्सर पूछते दिखाई देते हैं कि चाय मिलेगी क्या? इसके जवाब में हमने शाहीन बाग में यह एक (अघोषित) चुटकुला बार-बार लोगों को दोहराते सुना कि ‘चाय के अलावा और है क्या यहां?’