अशोक वाजपेयी के जन्मदिन पर उत्सव ज़रूर होता है, इस बार भी होगा. इस बार भी जब उनका देश एक गहरी बेचैनी में ऐंठ रहा है. यह शायद इसलिए है कि वे उस यहूदी कहावत में यक़ीन रखते हैं कि “मनुष्य के सामने हंसो, रोओ ईश्वर के सामने!” जीवन का तिरस्कार नहीं किया जा सकता, वह जब सामने हो तो उसे नज़रंदाज़ करना एक तरह से पाप ही है. शायद इसलिए भी कि जब तमाम शैतानी ताक़तें ज़िंदगी को कुचल देना चाहती हों हमें उन्हें जवाब देना पड़ता है, तुम हमसे हमारी हंसी नहीं छीन पाओगी.

नाज़ी जुल्म पर बनी बहुत सारी फ़िल्मों में से एक देख रहा था. नाज़ियों के द्वारा बनाए कॉन्सेंट्रेशन कैम्प में एक औरत आती है. बहुत सारे लोग काफ़ी पहले से वहां क़ैद हैं. वह अचरज से देखती है कि यातना की इस छाया में भी बंदी एक दूसरे को चूम रहे है, कोई अपना गिटार ठीक कर रहा है. वह घिन से उन पर झपट पड़ती है. उस कैम्प का एक तजुर्बेकार क़ैदी उसके पास आता है और उसे समझाता है,” यह जो तुम देख रही हो, वह जीवन है. उससे इंकार नहीं किया जाता.”

जीवन हमेशा अप्रत्याशित रूपों में ही सामने आता है. इसलिए अशोकजी को, जो उनका पहले से जाना नहीं है, जो पूर्व परीक्षित और अधिकारियों के द्वारा प्रमाणित नहीं है, उससे रिश्ता बनाने में कोई संकोच नहीं होता. यह प्रयोग है, ब्रेख़्त के शब्दों में नया, जैसा भी हो, उसका ऐहतराम है. प्रयोग हमेशा सफल हो, इसलिए नहीं किया किया जाता, वह एक और अद्वितीय की अपेक्षा में किया जाता है. मनुष्य हो या संस्था, अशोक वाजपेयी प्रयोग हर तरह की निराशा की आशंका के बावजूद करते ही जाते हैं.

अस्सी के पार निकल गए अशोक वाजपेयी अब ज़रा सावधानी से कदम रखते हैं. अपने शुभचिंतकों की ज़िद पर अब बाहर सफ़र पर जाते वक्त पर एक सहयोगी को ले लेते हैं. लेकिन उनकी सक्रियता दूसरों को दम नहीं लेने देती. दिमाग़ की फुर्ती कम होने का नाम नहीं लेती.

यह जो सार्वजनिक जीवन है अशोकजी का, उसने प्रायः उनके कवि रूप को ढंक लिया है. मुझे इसमें बहुत आश्चर्य न होगा अगर उनसे सांस्थानिक और दूसरे सार्वजनिक रिश्ते रखने वालों में से अधिकतर ने उनकी कविता की तरफ़ देखा ही न हो. अशोक वाजपेयी पर विचार लेकिन हमेशा एक कवि की तरह किया जाना चाहिए. उनके अध्यापक ने उनसे कहा यही था, मरना उनको कवि की तरह ही है. रघुवीर सहाय ने भी तो हर मोर्चे पर लड़ने को कहा था और चेतावनी दी थी कि मरना अपने ही मोर्चे पर चाहिए. तो अशोकजी का अपना मोर्चा कविता का ही है.

लंबे समय तक अशोक वाजपेयी कविता और शब्द की स्वायत्तता के लिए खड्गहस्त रहे हैं. राजनीति या विचारधारा कविता को अपना प्रवक्ता नहीं बना सकती, यही उनकी जिद रही है. यह शायद इसलिए है कि वे कविता की कल्पना इस तरह करते हैं कि वह किसी भी प्रकार की सत्ता की इच्छा से ख़ुद को आज़ाद रख सकती है. वह ज़िंदगी से सिर्फ़ ज़िंदगी के लिए रिश्ता बनाना चाहती है. या यों कह लें कि वह ज़िंदगी को समझ लेने और पूरी तरह से परिभाषित करने के प्रलोभन का ख़तरा जानती है. वह एक ईमानदार शब्द है. विचारधारा और राजनीति में आख़िरकार रणनीति जगह बना ही लेती है. कविता निष्कवचता या वध्यता की मांग है. इसलिए वह यह कह सकती है कि आख़िरकार हम कहीं पहुंचते नहीं:

“हमने यह नहीं सोचा था

कि इतने समय बाद हम फिर वहीं पहुंच जायेंगे

जहां से चले थे”.

इस निराशा का कारण है.

“हुआ यह है” शृंखला की एक कड़ी:

हुआ यह है

कि अब हम जहां नहीं थीं वहां

दीवारें बनाने में लगे हैं;

जो खिड़कियां पहले से थीं

उन्हें तालाबंद कर रहे हैं

ताकि पड़ोस का दृश्य हमें आगे न दीखे;

जो हो रहा है उससे हम मुतमईन रहे आयें.

हुआ यह है कि

हमारे पास कोई सवाल नहीं बचे हैं

और हमारी दराज़ दूसरों के बने-बनाये उत्तरों से भरी पड़ी है:

हम आश्वस्त हो गये हैं कि

सभी ज़रूरी मसलों का हल मिल गया है.

हुआ यह है

कि हम अब बहस नहीं करते, सिर्फ़ झुंझलाते-झगड़ते हैं

क्योंकि हमें यक़ीन है कि आखि़र में हम ही जीतेंगे

और बहसों से कोई फ़ायदा नहीं होता.

हुआ यह है

कि हम अब एक-दूसरे पर निगरानी रख रहे हैं

क्योंकि हम पर शक किया जा रहा है और अब हमें भी

दूसरों पर भरोसा कम, शक ज़्यादा होने लगा है.

हुआ यह है

कि अब हम आदमी थोड़ा कम हो रहे हैं

और हमें इसकी परवाह करने की फुरसत नहीं मिल रही है.

साहित्य और कविता का दावा मनुष्यता के सृजन का था. अब वह उसके उलट हुआ दीखता है. संभवतः इसी वजह से अब अशोक वाजपेयी अपनी उस धारणा पर विचार कर रहे हैं कि कविता अपने आप में पर्याप्त नागरिकता है. वे ठीक ही कहते हैं कि कविता अपना काम कर सके उसके लिए ज़रूरी कई दूसरी सामाजिक संस्थाओं को काम करना है. वे काम करें इसके लिए राजनीतिक कार्रवाई की ज़रूरत होगी.

शब्द अपना काम तभी ठीक कर सकते हैं जब मनुष्य ठीक तरीक़े से काम करे. कवि शायद तब तक सिर्फ़ यही कह सकता है,

प्रार्थना करता हूं

बढ़ती निराशा के ओसारे से

कि भले गढ़े अंधेरे में हाथ को हाथ न सूझता हो,

हाथ दूसरे हाथों को छू तो सकते हैं

और ऐसे हाथ मेरे हों.

दूसरों के जूते मेरे पैरों पर ठीक बैठें

मेरी आवाज़ में दूसरों की आवाज़ भी गूंजे

और मेरी कविता दूसरों को अपनी लगे.

अशोक वाजपेयी को कविता की ताक़त की सीमा का अहसास है. वे जानते हैं कि कविता का स्वप्न संभवतः कभी चरितार्थ न होगा. मनुष्यता हमेशा अधूरी रहेगी लेकिन उसी वजह से उसे हासिल करने की होड़ में रोमांच बना रहेगा, “हमारे समय और समाज में अपनी ही नहीं समूची कविता की विफलता का तीख़ा-गहरा अहसास मुझे है. लेकिन ‘आस उस दर से छूटती ही नहीं, जा के देखा, न जा के देख लिया’ जैसा कि फ़ैज़ ने कहा था. अगर कहीं भी मेरी मानवीयता पूरी होती या उसका भ्रम महसूस करती है तो कविता में ही. मेरे लिए जीना कविता के लिए जीना है. कविता के बाहर बहुत सारा जीवन है यह सही है और मुझे पता है. पर सही या ग़लत मेरे लिए वही जीवन अर्थ रखता है जो कविता में है या जिसे कविता रचती है. यह कविता में एक तरह की अबोध आस्था नहीं है: यह आस्था है उसकी घटती जगह और साख को जानते हुए. यह एक ‘हारी होड़’ है. हारी है पर होड़ है.”

अशोक वाजपेयी ने इसी होड़ में जीवन लगा दिया है. कम ही ऐसी जिंदगियां हैं जो कह सकती हैं कि उनका पूरा निवेश एक काल्पनिक लोक में था. इस निवेश से यह मर्त्य लोक किंचित समृद्ध होना चाहिए था. वैसा न हुआ देख यही कहने को जी चाहता है,

समय आ गया है

जब हम अपनी पराजय का स्तुतिगान लिखें:

बिना किसी वीरता या शहादत के

हमारा जीवन होम होने को है

और न इस्तगासे न किस स्मृतिगाथा में

हमारा ज़िक्र होगा:

शायद हम भी भूल जायें कि कभी हम थे.

हमसे हमारी गोधूलि तक छिनने की कगार पर है.

लेकिन फिर, निराला के शब्दों में वह जो एक और मन है, वह थकता नहीं:

अभी आवाज़ उठ सकती है, अभी पुकार का उत्तर दिया जा सकता है

अभी कविता से रूठे शब्दों को मनाकर वापस लाया जा सकता है

अभी झूठों की भीड़ में कम से कम एक सच को घुसाया जा सकता है

बस कैसे करूं?

बहुत से काम बाक़ी हैं

दूसरे साथ आने को तैयार हैं

लोग फिर सच की ओर मुड़ रहे हैं

बस कैसे करूं?

अशोकजी बस कर नहीं सकते और दूसरों को भी बस करने दे नहीं सकते.