केरल में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान और प्रदेश सरकार के बीच की तल्खी एक बार फिर सुर्ख़ियों में है. ताजा मामला संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) से जुड़ा है. केरल की पी विजयन सरकार ने हाल ही में सीएए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. इस याचिका में प्रदेश सरकार ने सीएए को भेदभाव और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला बताया.

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक राज्यपाल खान ने इसी बात पर आपत्ति जताई है. उनका आरोप है कि इस याचिका को दायर करने से पहले उनसे इजाजत नहीं ली गई, जबकि प्रदेश का राज्यपाल होने के नाते उन्हें सरकार के इस कदम की जानकारी होनी चाहिए थी. बकौल खान, ‘नियम और शिष्टाचार के विरुद्ध उठाए गए प्रदेश सरकार के इस कदम की जानकारी उन्हें मीडिया रिपोर्ट्स से मिली.’

मीडिया से हुई बातचीत में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने नाराजगी जाहिर करते हुए यह भी कहा कि ‘मुझे केरल सरकार के सुप्रीम कोर्ट जाने से आपत्ति नहीं है. लेकिन उन्हें मुझे सूचित करना चाहिए था. मैं राज्य का मुखिया हूं… कोई रबरस्टांप नहीं हूं… मैं इस बारे में पता करुंगा कि क्या राज्य सरकार बिना मेरी अनुमति या मुझे सूचना दिए सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है या नहीं.’

केरल शुरुआत से ही उन राज्यों में शामिल रहा है जो सीएए का प्रमुखता से विरोध कर रहे हैं. हाल ही में पश्चिम बंगाल की तरह केरल ने भी राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को लागू नहीं करने का फैसला लिया है. एनपीआर देश में रहने वाले निवासियों का रजिस्टर है. नागरिकता कानून 1955 और नागरिकता (नागरिकों का पंजीकरण और राष्ट्रीय पहचान पत्र) नियम, 2003 के प्रावाधनों तहत यह स्थानीय (गांव/कस्बा) उप जिला, जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तैयार किया जाता है.

इससे पहले केरल विधानसभा में बीती 31 दिसंबर को सीएए के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित हुआ था. सत्तारुढ़ सीपीएम की अगुवाई वाले एलडीएफ को इस मुद्दे पर विपक्षी यूडीएफ का समर्थन मिला था जबकि भाजपा के एकमात्र सदस्य ओ राजगोपाल ने इसका विरोध किया था.