रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने देश में संवैधानिक सुधारों का ऐलान किया है. इसके बाद एक चौंकाने वाले घटनाक्रम के तहत रूसी सरकार ने इस्तीफा दे दिया है. इन संवैधानिक संशोधनों की घोषणा का मकसद यह माना जा रहा है कि व्लादिमीर पुतिन रूस में आगे भी अपनी भूमिका महत्वपूर्ण बनाये रखना चाहते हैं.

राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में पुतिन ने संविधान में संशोधन के संकेत दिये. अपने भाषण में उन्होंने कहा कि सांसदों को प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के सदस्यों को नामित करने का अधिकार होगा. अभी इनकी नियुक्ति का अधिकार रूस के राष्ट्रपति के पास है. पुतिन ने शीर्ष अधिकारियों और सांसदों को संबोधित करते हुए कहा, ‘इससे संसद, प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के सदस्यों की शक्तियां व स्वतंत्रता बढ़ जाएगी.’ लेकिन, इसी के साथ पुतिन ने यह दलील भी दी कि अगर हम एक संसदीय प्रणाली के तहत शासित होंगे तो रूस स्थिर नहीं रहेगा. पुतिन ने कहा कि इसलिए राष्ट्रपति के पास प्रधानमंत्री और मंत्रियों को बर्खास्त करने का अधिकार होना चाहिए. पुतिन ने संवैधानिक बदलाव के लिये राष्ट्रव्यापी रायशुमारी की भी वकालत की.

जानकारों के मुताबिक, पुतिन इन सुधारों के जरिये एक ऐसा पद सृजित करना चाहते हैं कि जिससे राष्ट्रपति का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी वे महत्वपूर्ण पद पर बनें रहें. मौजूदा कानून के तहत कार्यकाल पूरा होने के बाद पुतिन को पद छोड़ना पड़ता क्योंकि यह प्रावधान किसी भी राष्ट्रपति को लगातार दो कार्यकाल से ज्यादा पद पर बने रहने से रोकता है.

व्लादिमीर पुतिन का मौजूदा कार्यकाल 2024 में पूरा हो रहा है. रूस की राजनीति के शीर्ष लोग इस बात को लेकर कयास लगा रहे थे कि उनकी भविष्य की योजना क्या है? लेकिन पुतिन की नई घोषणा के बाद यह साफ हो गया है कि रूस की राजनीति में अभी उनकी भूमिका बनी रहेगी. पुतिन (67) रूस में बीस साल से भी ज्यादा समय से शीर्ष नेतृत्व संभाल रहे हैं. जो जोसफ स्टालिन को छोड़कर किसी भी दूसरे रूसी या सोवियत नेता के कार्यकाल से लंबा है. हालांकि रूस के प्रमुख विपक्षी नेता अलेक्सेई नवालेनी ने ट्वीट के जरिये पुतिन के भाषण की आलोचना की है. उन्होंने आरोप लगाया, ‘पुतिन का एक मात्र लक्ष्य सत्ता को अपने कब्जे में रखना, पूरे देश को अपनी संपत्ति समझना और धन को अपने व अपने दोस्तों के लिये रखना है.’