लेखक-निर्देशक: नवजोत गुलाटी
कलाकार: सनी सिंह, सोनाली सैगल, सुप्रिया पाठक, पूनम ढिल्लों
रेटिंग: 1/5

दो परिवारों के बीच दुश्मनी बॉलीवुड का पसंदीदा विषय रहा है. ऐसी हिंदी फिल्मों में कभी दुश्मनी की वजह तो कभी इसकी शिकार बनकर महिलाओं ने मुख्य किरदार भी निभाए हैं. इन दोनों खासियतों को खुद में समेटने वाली ‘जय मम्मी दी,’ इस मायने में अलग है कि यहां पर बाप-दादाओं की बजाय मांओं की लड़ाई की वजह से परिवारों में दुश्मनी का सिलसिला चलता है. यह बात और है कि फिल्म की पटकथा इतनी लापरवाही से लिखी गई है कि संभावनाओं से भरे इस विचार की जान निकल गई है. नतीजतन, ‘जय मम्मी दी’ कोई ढंग की बात कहना तो दूर अपने दिलचस्प शीर्षक तक को जस्टिफाई नहीं कर पाती है. यानी यह भी नहीं बता पाती कि यहां पर किस बात के लिए मम्मी के जयकारे लगाए जा रहे हैं.

प्यार का पंचनामा सीरीज की फिल्में बनाने वाले फिल्मकार लव रंजन ‘जय मम्मी दी’ के निर्माता हैं. आम तौर पर महिला किरदारों में भलमनसाहत के लक्षण ना दिखाई देना, उनकी फिल्मों की खासियत रही है. ऐसे में उनके प्रोडक्शन तले एक ऐसी फिल्म का बनना चौंकाने वाला लगा था, जिसमें महिलाओं की तरफ से कोई कहानी कही जा रही हो. लेकिन उम्मीद के उलट, इस फिल्म में भी वही महिलाएं दिखाई देती हैं जिन्हें कमअक्ल और झगड़ालू जैसे शब्दों से नवाज़ा जाता है. इसके मुताबिक इनका काम सुबह-शाम खाना पकाना, अपने बच्चों में कंपटीशन रखना और आते-जाते नाक चढ़ाकर बातें करना ही है. कहने का मतलब यह कि यह फिल्म भी बिल्कुल लव रंजन वाला मिज़ाज ही लेकर आई है.

फिल्म जिन मांओं को मोगैम्बो और गब्बर जैसे विशेषण देती है, उनके बीच की दुश्मनी दिखाने के लिए कुछ मुंह बिचकाने और एक-दूजे को नज़रअंदाज करने वाले दृश्य ही रखती है. इससे न तो उनकी दुश्मनी की गहराई का अंदाजा लग पाता है और न ही सुप्रिया पाठक और पूनम ढिल्लों जैसी बेहतरीन अभिनेत्रियों का बढ़िया इस्तेमाल हो पाता है. इसके अलावा, ‘जय मम्मी दी’ पूरे वक्त मम्मियों की दुश्मनी के कारण को टटोलती रहती है और वहां तक पहुंचने के लिए पूरे 130 मिनट इंतज़ार करवाती है. लेकिन जब यह आपके सामने आता है तो थिएटर में ही चिल्लाकर ‘अरे भक्क!’ कहने का मन करता है. कुल मिलाकर, ‘जय मम्मी दी’ के मनोरंजन रचने में नाकामयाब होने के पीछे कोई आश्चर्यजनक वजह बिल्कुल नहीं है. ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि यह फिल्म एक छिछली प्रेमकहानी को थोड़े कन्फ्यूजन और कुछ लाउड पंजाबी किरदारों के सहारे हमारे गले उतार देना चाहती है.

अभिनय पर आएं तो सनी सिंह यहां पर भी उतना ही ‘वजनदार’ अभिनय करते हैं जितना उन्होंने अपनी पिछली फिल्म ‘उजड़ा चमन’ में किया था. यानी यहां पर भी वे आश्चर्यचकित होने के अपने स्टैंडर्ड एक्सप्रेशन से चिपके रहते हैं. उनके अपोजिट नज़र आईं सोनाली सैगल को सिर्फ इतराना था तो वे जीभर कर इतराई हैं. फिल्म में अभिनय करने के लिए तो शायद उनसे कहा ही नहीं गया था.

वहीं, एक लंबे वक्त के बाद सिल्वर स्क्रीन पर लौटीं पूनम ढिल्लों को फिल्म उनका जादू दिखाने का मौका नहीं देती है. वे ज्यादातर वक्त या तो दुखी लगती हैं या भृकुटियां तानकर जबरन का गुस्सा दिखाते हुए दिखती हैं. ऐसा ही कुछ सुप्रिया पाठक के साथ भी होता है. शुरूआत में तो वे बढ़िया अभिनय करती हैं लेकिन बाद में उनकी असहजता साफ दिखती है. यहां पर इन दोनों अभिनेत्रियों को देखकर ऐसा लगता है कि शायद इन्हें यह अंदाजा रहा होगा कि वे कैसा भी अभिनय करेंगी, बाकियों से अच्छी ही दिखाई देंगी.

फिल्म के बाकी पक्षों की बात करें तो इसकी प्रोडक्शन क्वालिटी और संगीत बेहतरीन हैं. साथ ही इसके गाने जिस मिज़ाज से रचे गए हैं, वे बतौर पार्टी सॉन्ग पॉपुलर होने का ताब रखते हैं. फिल्मांकन पर आएं तो यह बढ़िया है और दिल्ली-एनसीआर को कुछ इस तरह दिखाता है कि शहर आकर्षित करने के साथ-साथ आसानी से पहचान में भी आता है. बस फिल्म में क्लोजअप शॉट्स की अधिकता, सब्ज़ी में‌ ज्यादा पड़ गए नमक सी लगती है. ‘जय मम्मी दी’ से बतौर निर्देशक डेब्यू कर रहे नवजोत गुलाटी ने इसकी पटकथा भी लिखी है और यही इसकी सबसे कमजोर कड़ी है. इसके चलते तमाम चमक-दमक के बाद भी फिल्म देखने लायक नहीं बन पाती है.