अगले महीने दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है. केंद्र की सत्ता में 2014 से काबिज भाजपा के लिए राष्ट्रीय राजधानी को जीतना 2015 के मुकाबले और अधिक मुश्किल माना जा रहा है. 2015 के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया था. लेकिन फिर भी वह दिल्ली की 70 सीटों में से सिर्फ तीन सीटें ही जीत पाई थी.

इस बार माना जा रहा है कि आम आदमी पार्टी की अरविंद केजरीवाल सरकार ने पिछले पांच सालों में जिस तरह का काम किया है उसे देखते हुए भाजपा की दावेदारी पहले से भी कमजोर हो गई है. केजरीवाल सरकार की कुछ योजनाएं तो ऐसी हैं कि जिनकी आलोचना भाजपा खुलकर कर ही नहीं सकती है. राजनीतिक जानकार यह भी कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार का अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाना भी दिल्ली में भाजपा की संभावनाओं को कमजोर कर रहा है.

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वे कौन से मुद्दे और रणनीतियां हैं जिनके सहारे भाजपा इस बार के चुनावों में न सिर्फ अपना प्रदर्शन सुधारने बल्कि दो दशक बाद दिल्ली की सत्ता में वापसी की उम्मीद भी कर रही है. दिल्ली प्रदेश भाजपा के कुछ प्रमुख नेताओं और दिल्ली प्रदेश का कामकाज देख रहे भाजपा के कुछ राष्ट्रीय नेताओं से बातचीत के बाद जो उभरकर सामने आता है वह इस तरह है:

नागरिकता संशोधन अधिनियम

भाजपा के चुनावी रणनीतिकारों ने यह योजना बनाई है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर दिल्ली विधानसभा चुनावों में आक्रामक रहना है. अब तक पार्टी ने किसी भी स्तर पर यह माना ही नहीं है कि इस कानून में कोई दिक्कत है और इससे किसी तरह की परेशानी आम लोगों को आने वाली है. भाजपा ने इस कानून को लेकर पूरे देश भर में अभियान चला रखा है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी सोमवार को लखनऊ में कहा कि, ‘जिसको विरोध करना हो करे, मगर सीएए वापस नहीं होने वाला है.’ दिल्ली में भी भाजपा भी इस मसले को जोर-शोर से उठा रही है.

इस बारे में दिल्ली प्रदेश भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘भाजपा का स्पष्ट मत है कि इस कानून से भारत के सही नागरिकों को सुविधा होगी और जो लोग बाहर से आकर भारत में घुसपैठ करना चाहते हैं, उन्हें दिक्कत होगी. पार्टी यह भी मानती है कि विपक्षी पार्टियां और उनसे प्रभावित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मसले पर समाज में भ्रम फैलाने का काम किया है. इसलिए हम लोगों ने अपने कार्यकर्ताओं से न सिर्फ इस भ्रम को दूर करने के लिए कहा है बल्कि आम लोगों को इसके फायदे समझाने के साफ निर्देश दिए हैं. हमें लगता है कि इससे हमें चुनावों में फायदा होगा.’

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण

भाजपा सीधे तौर पर तो यह नहीं मानती कि वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके उसका चुनावी लाभ लेना चाहती है लेकिन वह जिस तरह से मुद्दों को उठाती है, उससे कहीं न कहीं हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा चुनावों में एक प्रमुख मुद्दा बन जाता है. दिल्ली में भी भाजपा की ओर से न सिर्फ नागरिकता संशोधन अधिनियम का मुद्दा उठाया जा रहा है बल्कि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के साथ-साथ अयोध्या में राम मंदिर पर उच्चतम न्यायालय के निर्णय के साथ-साथ शाहीन बाग में चल रहे विरोध-प्रदर्शन को भी चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश हो रही है.

पोस्टर, बैनर और पर्चों में तो नहीं लेकिन जमीनी स्तर पर जो कार्यकर्ता प्रचार कर रहे हैं, वे इस्लामिक आतंकवाद का मुद्दा भी उठा रहे हैं. जमीनी स्तर पर भाजपा के कार्यकर्ताओं के प्रचार और मुद्दों को देखने पर यह साफ तौर पर पता चलता है कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का फायदा उठाने की प्रत्यक्ष न भी सही पर परोक्ष कोशिश तो की ही जा रही है.

केजरीवाल सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन में दोष

अरविंद केजरीवाल सरकार की कुछ योजनाएं ऐसी हैं जिनकी खुली आलोचना भाजपा नहीं कर पा रही है. खास तौर पर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उसने जो काम किए हैं, उनकी आलोचना करने में पार्टी को दिक्कत हो रही है. बिजली और पानी के बिलों की माफी पर भी केजरीवाल सरकार की आलोचना करना भाजपा के लिए आसान नहीं है. क्योंकि इससे आम लोगों को सीधा फायदा मिल रहा है. ऐसे में भाजपा इन योजनाओं के क्रियान्वयन में खामियों को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है. भाजपा का यह भी कहना है कि बिजली और पानी के क्षेत्र में जिस तरह से बिल कम करने का काम केजरीवाल सरकार ने किया है, उससे इन क्षेत्रों में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाएगा. वहीं मोहल्ला क्लीनिक और स्कूलों में लाए जा रहे सुधारों में भी कुछ खामियां गिनाने का काम भाजपा कर रही है.

केंद्र से तालमेल के फायदे

भाजपा की ओर से इस बार के दिल्ली विधानसभा चुनावों में प्रमुखता से एक मुद्दा यह बनाया जा रहा है कि केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार है और ऐसे में अगर दिल्ली प्रदेश में भी भाजपा सरकार हो तो यहां विकास की एक नई कहानी लिखी जा सकती है. इस मुद्दे को न सिर्फ जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता उठा रहे हैं बल्कि पार्टी की प्रचार सामग्री में भी इसे प्रमुखता से जगह दी जा रही है.

इस बारे में दिल्ली प्रदेश भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘हम न सिर्फ प्रचार अभियानों में बल्कि इसे अपने चुनावी घोषणापत्र में भी शामिल करने जा रहे हैं. हम लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि प्रदेश में अभी जो सरकार है, वह केंद्र सरकार से टकराव के अवसर तलाशते रहती है. इससे दिल्ली के लोगों का नुकसान हो रहा है. हम लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर प्रदेश में और केंद्र में एक ही पार्टी की सरकार होगी तो इससे दिल्ली को कितना अधिक लाभ होगा.’

बुनियादी जरूरतें

दिल्ली प्रदेश भाजपा ने कुछ ऐसी सीटों की पहचान की है जहां अब भी बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है. ये ऐसी सीटें हैं जिनके कुछ क्षेत्रों में न तो अब तक पाइप से पानी पहुंचा है और न ही सड़कें. इनमें नालियों की भी व्यवस्था है. इन क्षेत्रों में स्कूल भी नहीं हैं. दिल्ली प्रदेश की सीमा के अंदर कई ऐसा ग्रामीण और अनाधिकृत इलाके हैं, जहां अब भी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं.

प्रदेश भाजपा के नेताओं से बातचीत करने पर पता चलता है कि इन क्षेत्रों में भाजपा ने बुनियादी सुविधाओं के अभाव को चुनावी मुद्दा बनाने का निर्णय लिया है. भाजपा ऐसा करके केजरीवाल सरकार के उस दावे को कमजोर करने की कोशिश कर रही है जिसमें वह दावा करती है कि इन सुविधाओं को ठीक करने के लिए उसने सबसे अधिक काम किए हैं.