अकसर ऐसा होता है कि कविता को भूल चुके या उसे लगभग अप्रासंगिक करार दे चुके लोगों को कुछ स्थितियों में कविता की याद आती है, उसकी ज़रूरत पड़ती है. देश में इस समय कविता पर फिर ध्यान जा रहा है क्योंकि वर्तमान सत्ता द्वारा नागरिकता को लेकर जो नया विभाजन पैदा करने की कोशिश है उसके विरुद्ध युवाओं, मुसलमानों, स्त्रियों आदि ने मिलकर एक व्यापक आंदोलन खड़ा कर दिया है. उसके अंतर्गत प्रायः हर जगह भारतीय संविधान की उद्देशिका का पाठ हुआ है जो, एक तरह से, गद्य में कविता की तरह सघन रचना है. हर जगह राष्ट्रीय ध्वज फहराया जा रहा है. हर जगह कविताओं का पाठ हो रहा है. इस सबका गहरा राजनैतिक अर्थ है कि लोग संविधान को अपनी पवित्र पुस्तक की तरह अपना रहे हैं और उसकी सत्ता का आग्रह कर रहे हैं. यह भी कि यह संविधान भारत के सभी धर्मों के मानने वालों का संविधान है. राष्ट्रीय ध्वज को लेकर जो आतंक सा संघ-परिवार पिछले कुछ वर्षों से फैलाता रहा है उसका यह सीधा-सच्चा प्रतिकार है. उसे लेकर भक्ति या वफ़ादारी किसी धर्म विशेष के लोगों का अधिकार या व्यवहार नहीं है, वह सबका ध्वज है.

फ़ैज़, नागार्जुन, मुक्तिबोध, दुष्यन्त कुमार आदि की कविताओं का पाठ भी खूब हो रहा है. ऐसे अवसर आते हैं जब कविता सामुदायिक अभिव्यक्ति बन जाती है. वह सबको पास लाती और जोड़ती है. वह प्रतिरोध और संगसाथ दोनों की एक साथ आवाज़ बन जाती है. आज ऐसा ही अवसर आया है. ज़ाहिर है कि यह काम कुछ ही क़िस्म की कविताएं कर सकती हैं. उनमें से कई ऐसी होती हैं जो ऐसे ही आंदोलनों के समय लिखी गयी हों या किसी ऐसी जो किसी समय संयोग से ऐसे आशय पा जायें जो उस समय के लिए उपयोगी हैं.

यह भी याद रखना चाहिये कि हर तरह की कविता एक तरह की सामुदायिकता विकसित करने की क्षमता रखती है और उसे संभव करने के लिए किसी आंदोलन में उसका इस्तेमाल करने की दरकार नहीं होती. यह भी याद रखना चाहिये कि कई बार आंदोलन आदि कुछ कविताओं पर ऐसे आशय थोप देते या उनमें खोज लेते हैं जो कविता के अभीष्ठ न भी रहे हों. कविता लिखी जाने के बाद एक तरह से सामुदायिक साझा सम्पत्ति हो जाती है और उसका तरह-तरह से उपयोग नागरिक कर सकते हैं. यह कविता की अपनी नागरिकता है.

कई कविताओं में ऐसी पंक्तियां होती हैं, कुछ सूक्तियों की तरह, जिनका इस्तेमाल नारे की तरह किया जा सकता है, किया जाता रहा है. फ़ैज़ की पंक्ति ‘हम देखेंगे’ ऐसी ही एक पंक्ति है. ऐसे बहुत से नारे गढ़े जाते हैं जो कविता की तरह होते हैं. उनमें छंद का इस्तेमाल होता है. कई बार कोई पंक्ति किसी आयोजन का आप्तवाक्य बन जाती है. याद आता है कि 1989 के भारत भवन के विश्व कविता समारोह में स्वीडिश कवि टोमस ट्रांस्ट्रोमर की एक पंक्ति ‘सच को किसी फरनीचर की दरकार नहीं’ ऐसी ही थी जो उस समारोह का आप्तवाक्य बन गयी थी, अनायास.

इस नगरी में रात हुई

दशकों पहले कवि-आलोचक और समाजकर्मी, इलाहाबाद के विजय देव नारायण साही ने एक रुबाई का अंत यों किया था- ‘आओ खुसरो लौट चलें अब, इस नगरी में रात हुई.’ नितांत समसामयिकता के दायित्व से लेकर मध्यकालीन कवि जायसी तक, छायावाद-उत्तर छायावाद- नयी कविता पर, ‘साहित्य क्यों’ और ‘हमारा समय’ जैसे प्रश्नों तक साही की वैचारिकता बड़ी सघनता और तीक्ष्णता के साथ, छठे-सातवीं दशक में सक्रिय थी. उनकी कविता अपने समय और शाश्वत मानवीय विडंबना दोनों की एक साथ साखी थी. यह सोचकर थोड़ा कष्ट होता है कि इस कवि-आलोचक पर हिंदी में कोई क़ायदे की पुस्तक नहीं है. आजकल तो नये राजनैतिक माहौल में विस्मृति फैलाने का एक सुनियोजित अभियान ही चल रहा है. पर यह भी दर्ज़ करना चाहिये कि स्वयं हमारे साहित्य-समाज में विस्मृति बहुत व्यापक पहले से रही है.

रज़ा फ़ाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘साही की साखी’ में चार सत्रों में ‘कविता का साक्ष्य’, ‘साही के बहाने इलाहाबाद पर एक बहस’, ‘जायसी क्षण’ और ‘संवाद का रूपक’ पर विचार हुआ जिसमें वरिष्ठों के अलावा कुछ युवा लेखकों ने भी भाग लिया. विचार स्तुतिपरक, सौभाग्य से, नहीं था बल्कि आलोचनात्मक था. साही एक बहसप्रिय लेखक थे जैसे श्रीकान्त वर्मा जिरह प्रेमी. इसलिए सभी ने किसी न किसी तरह से साही से बहस की. इस अवसर पर गोपेश्वर सिंह द्वारा संपादित और रज़ा पुस्तकमाला के अन्तर्गत वाणी प्रकाशन से आयी पुस्तक ‘विजयदेव नारायण साही: रचना-संचयन’ का लोकार्पण भी कवि अरुण कमल ने किया. 700 से अधिक पृष्ठों में सामग्री एकत्र की गयी है. देखें कुछ कवितांश-

‘बीरबल झूठा है, मसखरा है/बादशाह तुम तो जानते ही हो/इन दरबारियों का कोई भरोसा नहीं/चाहे वे नौरतन हों चाहे बेरतन हों,/ये सब तो तुम्हारे ही प्रताप से चमकते हैं/जब तुम मुक़र्रर करते हो नौरतन हो जाते हैं/जब तुम बरख़ास्त करते हो तो बेरतन हो जाते हैं। इन दरबारियों की ज़बान का क्या महत्व?/तुम सीधे हमारे मन की गर्मी पहचानते हो/हम बराबर ठिठुरते पानी में खड़े-खड़े/तुम्हारे महल का चिराग़ देखते रहेंगे/हो सकता है ठण्ड से मर जाऊँ तो मेरा बेटा/वह मर जाय तो उसका बेटा,/उसका बेटा, उसका बेटा.... बादशाह सत्य तुम्हीं हो/बीरबल झूठा है मसखरी करता है’

‘दो तो ऐसी निरीहता दो

कि इस दहाड़ते आतंक के बीच

फटकार कर सच बोल सकूं

और इसकी चिन्ता न हो

कि इस बहुमुखी युद्ध में

मेरे सच का इस्तेमाल

कौन अपने पक्ष में करेगा।

यह भी न दो

तो इतना ही दो

कि बिना मरे चुप रह सकू।

पुणे में दो दिन

इस बार पुणे में दो दिन बिताये. मेरा कोई कार्यक्रम नहीं था जबकि पिछले लगभग चार दशकों से पुणे आना हर बार कुछ बोलने के लिए ही होता रहा है. इस बार मेरे बेटे कबीर और बहू प्रीति को कलाछाया ने वास्तुकला में उसकी उपलब्धि और नवाचार के लिए सम्मानित किया क्योंकि उन्होंने बड़ी और भव्य इमारतें आकल्पित करने के बजाय देहाती स्कूलों और आंगनवाड़ियां बनाने पर अपना प्रयत्न एकाग्र किया है. कभी-कभार कुछ और भी अपवादस्वरूप किया है जैसे पटना में ‘किलकारी’ भवन और दिल्ली में बिरजू महाराज के लिए ‘कलाश्रम’ का वास्तु डिज़ाइन.

पुणे में हम एक सामान्य होटल ‘स्वरूप’ में ठहरे. साफ़-सुथरा, मराठी शाकाहारी, सादी सुविधाएं. पर वहां पुणे आनेवाले और वहां रहनेवाले लेखकों, कलाकारों आदि का लगातार जमावड़ा रहता है. हमें ही दो दिनों में कर्मठ विद्वान गणेश देवी, नाटककार और अब फ़िल्म अभिनेता बनने जा रहे सतीश आलेकर, कई मराठी लेखक मिले. पता चला कि पुणे के सवाई गन्धर्व समारोह में बाहर से आनेवाले अनेक दिग्गज संगीतकार और नर्तक इसी होटल में ठहरते रहे हैं. पास ही में एक चौक है जिसे पुणें महानगरपालिका ने रोहिणी भाटे चौक नाम दिया है.

यह भी पता चला इसी गली में एक मकान में उस्ताद अमीर खां कभी रहते थे. ठीक सामने के मकान में संगीतकार सुरेश भाई माने कई बरस रहे. स्वयं रोहिणी माटे के बेटे-बहू का घर दो मिनिट की दूरी पर है जहां कथक-गुरु शमा भाटे रहती हैं. उनके यहां एक मराठी लेखिका से लंबी बातचीत रोहिणी जी के बारे में हुई- वे उनकी जीवनी लिख रही हैं जिसे मराठी में चरित्र कहते हैं. वहीं यह भी पता चला कि कोने पर एक मकान में हीराबाई बड़ोदेकर बरसों रहती थीं. ऐसा अनुगुंजित पड़ोस किसी और शहर में दुर्लभ ही है.

पुणे कई अर्थों में और कई दशकों से, एक तरह से, हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की राजधानी ही है। यही वह शहर है जहां मैं ही भीमसेन जोशी, रामनारायण, जिया फरीदुद्दीन डागर, वसुंधरा कोमकली आदि अनेक शास्त्रीय मूर्धन्यों के पचहत्तर वर्ष पूरे होने पर आयोजित समारोहों में भाग लेने आता रहा हूं. संगीत के अलावा रंगमंच की भी, कम से कम मराठी रंगमंच की, राजधानी है. हर दिन बड़ी संख्या में नाटक खेले जाते हैं और टिकट ख़रीदकर लोग नाटक देखने जाते हैं. कुछ युवा मराठी नाटककारों की कोई कर्मशाला भी वहां इन दिनों चल रही थी और उसके कुछ प्रतिभागी ‘स्वरूप’ में ठहरे और जमा थे. ‘स्वरझंकार’ नामक एक संगीतसमारोह में हम गये तो वहां पांचेक हज़ार श्रोता रहे होंगे जो उस्ताद राशिद खां का गायन ध्यान से, टिकट लेकर, बहुत सारे कुर्सियां न मिल पाने से फ़र्श पर बैठकर, सुन रहे थे. कैसी विडम्बना है कि हालांकि ज़्यादातर घराने उत्तर भारत में थे वहां अब वे नहीं हैं और उन्हें महाराष्ट्र ने बचाया और पोसा है. 12 जनवरी की शाम इस समारोह के उद्घोषक ने विनम्रतापूर्वक याद किया कि यही दिन कुमार गन्धर्व की पुण्यतिथि है. शहर बहुत फैल गया है और नई इमारतें लगातार बन रही हैं, पुराने मकान गिराये जा रहे हैं पर वह रसिकता की अपनी परम्परा बचाये हुए है.