भारत में ऐसी कई घटनाएं हैं जो अहम कानूनों के निर्माण और बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हुई हैं. एक नाबालिग आदिवासी लड़की मथुरा से बलात्कार का प्रकरण भी एक ऐसा ही मामला है. महाराष्ट्र के चंद्रपुर की रहने वाली इस सोलह साल की आदिवासी लड़की के साथ पुलिस थाने में दो कांस्टेबलों ने बलात्कार किया था.

पुलिस में शिकायत दर्ज होने के बाद 1974 में यह मामला सत्र न्यायालय के सामने आया. लेकिन अदालत ने दोनों आरोपितों को बरी कर दिया. अपने फैसले के पक्ष में अदालत ने मथुरा के अतीत को आधार बनाते हुए कहा कि चूंकि वह अपने पुरुष मित्र के साथ पहले भाग चुकी है इसलिए उसे शारीरिक संबंधों की आदत है और इसलिए पुलिस थाने में जो हुआ, उसे बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.

इसके बाद मामला बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ में गया जहां अदालत ने पूर्व के फैसले को पलटते हुए आरोपितों को दोषी पाया. इस समय तक यह प्रकरण काफी चर्चा में आ चुका था. हालांकि 1979 में जब मामला उच्चतम न्यायालय में पहुंचा तो शीर्ष अदालत ने भी निचली अदालत के तर्क को आधार बनाते हुए आरोपितों को निर्दोष करार दिया.

उच्चतम न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ तुरंत ही मीडिया सहित तमाम जनसंगठनों से तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगीं. इस मसले पर कुछ संगठनों ने अभियान भी छेड़ दिया. देश में कुछ जगहों पर मथुरा को न्याय दिलाने और यौन अपराध से जुड़े कानूनों में बदलाव के लिए रैलियां भी निकाली गईं. इस जनदबाव का नतीजा यह हुआ कि 1983 में सरकार ने इनमें संशोधन किया. इनमें से पहला संशोधन यह था कि किसी भी पीड़िता के अतीत के आधार पर यौन उत्पीड़न के किसी भी मामले को खारिज नहीं किया जा सकता. दूसरा यह कि हिरासत में बलात्कार की सजा कम से कम सात साल होगी. तीसरा महत्वपूर्ण संशोधन यह हुआ कि ऐसे मामलों की सुनवाई बंद कमरे में ही होगी. इन संशोधनों के जरिए पीड़ित की पहचान को उजागर करने पर सजा का प्रावधान भी किया गया.

मथुरा प्रकरण इस मामले में मील का पत्थर साबित हुआ कि इसकी वजह से यौन उत्पीड़न के कानूनों में पहली बार व्यापक बदलाव हुए. इसके बाद साल 2012 में हुए निर्भया कांड के बाद यौन अपराध से जुड़े कानूनों में फिर सुधार किया गया. इन सुधारों में बलात्कार की परिभाषा बदलने और इसकी सजा में फांसी को शामिल करने के साथ-साथ इस तरह के जघन्य अपराध में लिप्त नाबालिगों को कड़ी सजा दिए जाने का प्रावधान भी किया गया.