1- दिल्ली का शाहीन बाग महज एक जगह का नाम नहीं रह गया. शाहीन बाग नागरिकता कानून (सीएए) के विरोध का एक प्रतीक बन चुका है. ऐसे ही आंदोलन अब देश भर के कई शहरों में शुरू हो गए हैं. एनडीवी खबर पर अपनी इस टिप्पणी में संकेत उपाध्याय का मानना है कि नौ साल पहले की तुलना में देखें तो सरकार बदली, मुद्दे बदले लेकिन लोकतंत्र और उसके तौर तरीके 2011 में भी वैसे थे और 2020 में भी बिल्कुल वैसे ही हैं.

दशक में कुछ नहीं बदला, शाहीन बाग और अन्ना आंदोलन एक ही जैसे

2-मोदी सरकार की तमाम कवायदों के बावजूद अर्थव्यवस्था की सुस्ती जारी है. आर्थिक जानकार लगातार इस बारे में चेता रहे हैं. मोदी सरकार के आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने तो बीते दिनों यह तक कह दिया कि भारतीयय अर्थव्यवस्था आईसीयू की तरफ बढ़ रही है. द प्रिंट हिंदी पर अपने इस लेख में टीएन नायनन का मानना है कि आर्थिक मसलों को हल करने के मामले में सरकार ने पिछली सीखों से कोई सबक नहीं लिया है.

आर्थिक मसलों को हल करने के मामले में सरकार ने पिछली सीखों से कोई सबक नहीं लिया है

3-संजय लीला भंसाली अब गंगूबाई काठेवाली की ज़िंदगी पर फ़िल्म बना रहे हैं. फिल्म का नाम है गंगूबाई काठियावाड़ी. इसमें मुख्य किरदार आलिया भट्ट हैं. फिल्म उस गंगूबाई की जिंदगी से प्रेरित है जिसने एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भी निरुत्तर कर दिया था. बीबीसी हिंदी पर अम्रुता दुर्वे का लेख.

सेक्स वर्करों को मैनेज करने वाली गंगूबाई कैसे हुई थीं चर्चित

4-बंधुआ मजदूरी प्रथा को 44 साल पहले यानी 1976 में गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया था. लेकिन अब देश के कई हिस्सों में यह जारी है. द वायर हिंदी पर संतोषी मरकाम की यह रिपोर्ट हाल ही में जम्मू के राजौरी में दो ईंट-भट्ठों से छुड़ाए गए 91 मजदूरों की व्यथा-कथा बताती है. इससे यह भी पता चलता है कि सरकारें इस मामले में किस कदर उदासीन हैं.

‘हम दर-दर भटकना नहीं चाहते, हमें बंधुआ मज़दूरी से मुक्ति मिले और हमारा पुनर्वास हो’

5- बीते दिनों नए नागरिकता कानून को लेकर दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि देश इस समय मुश्किल हालात से गुजर रहा है. मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे का कहना था कि ऐसे हालात में सबसे पहले शांति स्थापित करने की कोशिश होनी चाहिए. न्यूजलॉन्ड्री हिंदी पर अपने इस लेख में कुमार प्रशांत सवाल का सवाल है कि अदालत यह कह ही कैसे सकती है कि जब तक शांति नहीं होगी तब तक वह संविधान की कसौटी पर किसी सरकारी कदम को जांचने का काम स्थगित करती है.

हिंसा के जनक