बीते हफ्ते रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने देश में संवैधानिक सुधारों का ऐलान किया. राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि इन सुधारों के तहत सांसदों को प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के सदस्यों को नामित करने का अधिकार होगा. अभी इनकी नियुक्ति का अधिकार रूस के राष्ट्रपति के पास है. व्लादिमीर पुतिन ने शीर्ष अधिकारियों और सांसदों को संबोधित करते हुए कहा, ‘इससे संसद, प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के सदस्यों की शक्तियां व स्वतंत्रता बढ़ जाएंगी.’ लेकिन, इसके साथ उन्होंने यह दलील भी दी कि अगर रूस एक संसदीय प्रणाली के तहत शासित होगा तो वह स्थिर नहीं रहेगा, इसलिए राष्ट्रपति के पास प्रधानमंत्री और मंत्रियों को बर्खास्त करने का अधिकार होना चाहिए. व्लादिमीर पुतिन ने संवैधानिक बदलाव के लिये राष्ट्रव्यापी रायशुमारी की भी वकालत की.

इसके तुरंत बाद एक चौंकाने वाले घटनाक्रम के तहत रूस के प्रधानमंत्री दमित्री मेदवेदेव और उनकी पूरी कैबिनेट ने इस्तीफा दे दिया. मेदवेदेव के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने मिखाइल मिशुस्टिन को अगला प्रधानमंत्री घोषित कर दिया.

बहरहाल, इन संवैधानिक संशोधनों की घोषणा का मकसद यह माना जा रहा है कि व्लादिमीर पुतिन रूस की सत्ता में आगे भी अपनी भूमिका महत्वपूर्ण बनाये रखना चाहते हैं. जानकारों के मुताबिक पुतिन इन सुधारों के जरिये अपने लिए कुछ ऐसा करना चाहते हैं कि जिससे राष्ट्रपति का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी वे महत्वपूर्ण पद पर बनें रहें. मौजूदा कानून के तहत कार्यकाल पूरा होने के बाद उनको अपना पद छोड़ना पड़ता क्योंकि यह प्रावधान किसी भी राष्ट्रपति को लगातार दो कार्यकाल से ज्यादा अपने पद पर बने रहने से रोकता है. पुतिन का मौजूदा कार्यकाल 2024 में पूरा हो रहा है.

व्लादिमीर पुतिन के संवैधानिक सुधारों की घोषणा पर अगर जानकारों का नजरिया देखें तो समझ आता है कि रूसी राष्ट्रपति आखिर करना क्या चाहते हैं. रूसी पत्रकार एंटोन ट्रॉयनोव्स्की की मानें तो वे संवैधानिक सुधारों के जरिये राष्ट्रपति की शक्तियां घटाने और प्रधानमंत्री और संसद की शक्तियां बढ़ाने जा रहे हैं. काफी समय से उनकी पार्टी ‘यूनाइटेड रशिया’ का संसद के दोनों सदनों में बहुमत है. ऐसे में अगर 2024 में व्लादिमीर पुतिन प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनके हाथ में अच्छी खासी ताकत होगी.

व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री के हाथ में ज्यादा ताकत देने की घोषणा और दमित्री मेदवेदेव के इस्तीफे के तुरंत बाद अपने बेहद भरोसेमंद मिखाइल मिशुस्टिन को प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा कर दी. मिखाइल मिशुस्टिन रूस की संघीय टैक्स सर्विस के प्रमुख हैं, जिन्हें बड़े आर्थिक सुधारों का श्रेय भी दिया जाता है. उनके लिए यह भी कहा जाता है कि उन्हें राजनीति का कोई अनुभव नहीं है. इसीलिए मिखाइल मिशुस्टिन का प्रधानमंत्री बनना हैरान करने वाली बात है.

लेकिन जानकार कहते हैं कि व्लादिमीर पुतिन ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय काफी सोच-समझकर लिया है. इनके मुताबिक पुतिन जानते हैं कि अभी उन्हें चार साल और राष्ट्रपति बने रहना है इसलिए वे प्रधानमंत्री के पद पर किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं चाहते जो संविधान संशोधन के जरिये दी जा रही ताकतों का इस्तेमाल उनके मन-मुताबिक न करे और पूरी तरह से उनके दबाव में रहे.

कुछ जानकार एक और बात भी कहते हैं. इनके मुताबिक ऐसा भी हो सकता है कि व्लादिमीर पुतिन राष्ट्रपति पद से हटने के बाद प्रधानमंत्री बनने के बजाय ‘स्टेट कॉउन्सिल’ के प्रमुख बने रहें. रूस में ‘स्टेट कॉउन्सिल’ का काम रक्षा, विदेश और अन्य प्रमुख मसलों पर राष्ट्रपति को सलाह देना है. सभी राज्यों के गवर्नर इसके सदस्य होते हैं. अभी इसके प्रमुख खुद राष्ट्रपति पुतिन हैं. जानकार उनके प्रधानमंत्री बनने के बजाय स्टेट कॉउन्सिल के प्रमुख बनने के कयास इसलिए भी लगा रहे हैं क्योंकि बीते हफ्ते उन्होंने संविधान संशोधन के जरिये स्टेट कॉउन्सिल की भी ताकत बढ़ाने की घोषणा की है.

रूसी राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो स्टेट कॉउन्सिल की शक्तियों में विस्तार करने के बाद व्लादिमीर पुतिन राष्ट्रपति न रहने के बाद भी सैन्य और विदेश नीति को अपने हिसाब से चला सकेंगे. साथ ही रूस की राजनीति पर भी उनकी पकड़ बनी रहेगी. क्योंकि वे रूस की सबसे बड़ी पार्टी के अध्य्क्ष भी होंगे.

ऐसा करने के बजाय व्लादिमीर पुतिन खुद को हमेशा के लिए राष्ट्रपति घोषित क्यों नहीं कर देते?

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जब सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए यह सब कर रहे हैं तो एक सवाल यह उठता है कि आखिर यह सब करने के बजाय वे खुद को हमेशा के लिए राष्ट्रपति क्यों नहीं घोषित कर देते. वे उस नियम को ही संसद में क्यों नहीं बदलवा देते जो किसी व्यक्ति को केवल लगातार दो बार ही राष्ट्रपति बनने का अधिकार देता है. यह सवाल इसीलिए भी उठ रहा है कि चीन में बीते साल राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने संविधान संशोधन कर खुद को हमेशा के लिए राष्ट्रपति नियुक्त करवा लिया है.

कुछ जानकार इस सवाल के जवाब में कहते हैं कि राष्ट्रपति व्लीदिमीर पुतिन ऐसा इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि वे जानते हैं कि इस बात को रूस की जनता नहीं मानेगी और देश भर में व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू हो जाएंगे. इन लोगों के मुताबिक व्लादिमीर पुतिन को 2012 में अपने एक फैसले के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन अभी तक याद होंगे. रूस में हुए ये प्रदर्शन 1990 के बाद हुए सबसे बड़े विरोध प्रदर्शन थे.

दरअसल, व्लादिमीर पुतिन साल 2000 से 2008 तक लगातार दो बार राष्ट्रपति रहे. नियम के तहत वे लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन सकते थे इसलिए उन्होंने इसके बाद प्रधानमंत्री बनने का निर्णय लिया. 2008 में उनके ख़ास दमित्री मेदवेदेव राष्ट्रपति बने. इसके चार साल बाद यानी 2012 में जब राष्ट्रपति का चुनाव हुआ तो व्लादिमीर पुतिन ने फिर राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की घोषणा की. तब उन्हें अपने इस निर्णय के लिए भारी विरोध का सामना करना पड़ा था. उस समय यह भी साफ़ हो गया था कि पुतिन के इशारे पर ही मेदवेदेव ने राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा था और 2012 में चार साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद पुतिन ने उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया और खुद फिर राष्ट्रपति बन गए.

जानकार कहते हैं कि इन विरोध प्रदर्शनों से सबक लेते हुए ही व्लादिमीर पुतिन हमेशा के लिए राष्ट्रपति बनने के बजाय दूसरे तरीकों से सत्ता पर पकड़ बनाये रखने के रास्ते खोज रहे हैं. उन्हें यह भी पता है कि इस समय विरोध प्रदर्शन पहले से भी बड़े हो सकते हैं क्योंकि अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते देश की अर्थव्यवस्था सालों से पटरी पर नहीं है और इसके चलते जनता में नाराजगी भी है. बीते साल रूस में हुए सर्वेक्षण से भी पुतिन के प्रति नाराजगी का पता चलता है. इसके मुताबिक राष्ट्रपति की अप्रूवल रेटिंग 68 फीसदी ही रह गयी है, जो पिछले कई सालों से 80 फीसदी से ऊपर बनी हुई थी.

इस समय दुनिया भर के जानकार व्लादिमीर पुतिन द्वारा की गयी संवैधानिक सुधारों की घोषणा को लोकतान्त्रिक मूल्यों की हत्या करने जैसा बता रहे हैं. लेकिन बीते एक दशक में रूस में जो कुछ भी हुआ है, उससे पता चलता है कि वहां लोकतंत्र बहुत पहले ही खत्म हो चुका है.

व्लादिमीर पुतिन ने विपक्ष को पूरी तरह खत्म कर दिया

रूस में जब राष्ट्रपति चुनाव होता है तो उस दौरान कई लोग यह कहते दिखाई देते हैं कि वे व्लादिमीर पुतिन को मजबूरी में वोट दे रहे हैं क्योंकि विपक्ष के पास कोई मजबूत प्रत्याशी नहीं है. जानकार इस स्थिति के लिए पुतिन को ही जिम्मेदार ठहराते हैं. कहा जाता है कि वे हर बार चुनौती दे पाने में सक्षम विपक्षी नेता को किसी न किसी तरह से चुनावी प्रक्रिया से बाहर करवा देते हैं. बीते साल हुए चुनाव में उनके कटु आलोचक और मजबूत विपक्षी नेता एलेक्सेई नावालनी के साथ भी ऐसा ही हुआ. नावालनी ने उनके करीबी दिमित्री मेदिवेदेव की अपार संपत्ति का खुलासा किया था जिसके बाद से वे रूसी युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हो गये थे. लेकिन, चुनाव से कुछ रोज पहले ही एक पुराने मामले में नावालनी को दोषी ठहरा दिए जाने के बाद चुनाव आयोग ने उनकी उम्मीदवारी पर बैन लगा दिया.

रूस में न केवल विपक्षी नेताओं बल्कि सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को भी किसी न किसी तरह चुप करा दिया जाता है. 2015 में व्लादिमीर पुतिन के प्रबल विरोधी बोरिस नेमत्सोव की मॉस्को में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री नेमत्सोव ने अपनी जांच-पड़ताल में पाया था कि क्रीमिया युद्ध पुतिन का एकतरफा फैसला था जिसे उन्होंने केवल इसलिए अंजाम दिया ताकि देश में उनकी छवि मजबूत हो जाए. वे जल्द ही पुतिन के खिलाफ इसे लेकर बड़ा खुलासा करने वाले थे और देशव्यापी आन्दोलन छेड़ने पर भी विचार कर रहे थे. नेमत्सोव इससे पहले 2013 में पुतिन सरकार पर सोची ओलंपिक में 30 अरब डॉलर का घोटाला करने का आरोप भी लगा चुके थे. अपनी मौत से हफ्ते भर पहले ही उन्होंने अपने कई करीबियों से पुतिन द्वारा हत्या करवाए जाने की आशंका जताई थी.

मीडिया वही दिखाए जो सरकार चाहे

रूसी मीडिया व्लादिमीर पुतिन की एक बड़ी ताकत माना जाता है. इस पर सरकार का नियंत्रण है. राष्ट्रपति पुतिन पर मीडिया के जरिये देश के माहौल को अपने पक्ष में करने के आरोप लगते रहे हैं. कहा जाता है कि रूस में क्रीमिया के विलय से पहले मीडिया ने पुतिन के इस फैसले के पक्ष में जबर्दस्त माहौल बनाने का काम किया था. इसके बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबन्ध लगाए तो मीडिया ने इसे रूस के खिलाफ षड्यंत्र की तरह पेश किया. पिछले दिनों चुनाव से पहले भी मीडिया के जरिये ऐसा माहौल बनाने की कोशिश हुई थी कि पश्चिमी देश रूस पर हमला करने वाले हैं और व्लादिमीर पुतिन ही एक मात्र ऐसे नेता हैं जो देश को इससे बचा सकते हैं.

जानकारों की मानें तो रूसी मीडिया पुतिन का गुणगान करने, यूरोपीय देशों के खिलाफ प्रोपगेंडा फैलाने और राष्ट्रवाद की भावना का विस्तार करने में ही लगा रहता है. देश के मीडिया पर अपनी पकड़ मजबूत करने के उद्देश्य से ही व्लादिमीर पुतिन ने 2014 में रूसी मीडिया संस्थानों में विदेशी निवेश 50 फीसदी से घटाकर 20 फीसदी कर दिया था.