सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड्स योजना पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है. शीर्ष अदालत ने इस रोक की मांग करने वाली याचिका पर केंद्र और चुनाव आयोग से दो हफ्ते में जवाब भी मांगा है. यह याचिका चुनाव सुधार के लिए काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर), सीपीएम और अन्‍य की ओर से दाखिल की गई है. पिछली सुनवाई में शीर्ष अदालत ने सभी राजनैतिक दलों को आदेश दिया था कि वे चुनावी बॉन्ड्स के जरिये मिले चंदे और दानकर्ताओं का पूरा ब्योरा सीलबंद लिफाफे में चुनाव आयोग को सौंप दें.

चुनावी बॉन्ड क्या है?

सरकार ने चुनावी बॉन्ड बेचने की जिम्मेदारी भारतीय स्टेट बैंक को दी है. ये बॉन्ड एक तय अवधि तक स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं में उपलब्ध होते हैं. इन्हें चेक या अन्य गैर नगदी माध्यम से खरीदा जा सकता है. इसके बाद इन्हें किसी राजनीतिक दल को दान किया जा सकता है. इस पर खरीदने वाले का न तो कोई नाम होता है और न ही उसकी पहचान से संबंधित कोई और जानकारी. दान में ये बॉन्ड्स पाने वाली राजनीतिक पार्टी को इन्हें जारी होने की तारीख के 15 दिनों के अंदर इनके लिए खोले गए विशेष बैंक खाते में जमा करना होता है. ये बॉन्ड्स 1,000 रुपये, 10,000 रुपये, एक लाख रुपये, दस लाख रुपये और एक करोड़ रुपये मूल्य के होते हैं.

केंद्र सरकार का दावा है कि इनसे चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता आएगी. लेकिन सब इससे सहमत नहीं दिखते. विपक्षी पार्टियों का मानना है कि राजनीतिक दलों के चंदे को पारदर्शी बनाने के नाम पर चुनावी बॉन्ड जारी करने की सरकार की पहल राजनीतिक भ्रष्टाचार को वैध बनाने का तरीका साबित होगी. कांग्रेस का आरोप है कि सरकार आरबीआई और चुनाव आयोग की असहमति के बावजूद यह योजना लाई है.

एडीआर के अनुसार 2018-19 में भाजपा को चंदे में 2,410 करोड़ रुपये मिले. इसमें 1,450 करोड़ रुपये चुनावी बॉन्ड्स के जरिए आए. वहीं, कांग्रेस को चंदे में 918.03 करोड़ रुपये मिले जिनमें 383.26 चुनावी बॉन्ड्स के जरिए आए.