निर्देशक – अश्विनी अय्यर तिवारी

कलाकार – कंगना रनोट, जस्सी गिल, ऋचा चड्ढा, नीना गुप्ता, यज्ञ भसीन

रेटिंग – 3.5/5

‘पंगा’ के कुछ संवादों पर गौर कीजिए - ‘मैं एक मां हूं और मां के कोई सपने नहीं होते हैं.’ ‘मैं क्या हो सकती थी और मैं क्या रह गई हूं.’ ‘मुझे अपने आप को देखकर खुशी नहीं होती है.’ मांओं या कहें कि करियर छोड़कर गृहस्थी में फंस चुकी औरतों की जिंदगी बयान करने वाले ऐसे कई संवाद पंगा का हिस्सा हैं. ये अपने होने का एहसास करवाए बगैर चुपचाप फिल्म में आते हैं और चले जाते हैं. जैसे औरतें अपने परिवार की जिम्मेदारियों के बीच चुपचाप जीती चली जाती हैं. ये औरतें परिवारों को वैसा ही ज़रूरी ठहराव देती हैं जैसा इन संवादों वाले सीन ‘पंगा’ को देते हैं.

‘पंगा’ एक रेलवे कर्मचारी जया निगम का किस्सा दिखाती है. वह सात साल के बच्चे की मां है और सालों पहले कबड्डी की चैंपियन हुआ करती थी. अश्विनी अय्यर तिवारी निर्देशित यह फिल्म जया निगम के मैदान में वापसी करने के किस्से को परदे पर लाती है. ‘दूधो नहाओ-पूतो फलो’ जैसे आशीर्वादों को सार्थक करती जया जैसी औरतों की जिंदगी भारतीय मानकों पर तो आदर्श लगती है लेकिन इनमें भीतर ही भीतर जाने कितने मलाल पल रहे होते हैं. तिवारी इन मलालों को बहुत बारीकी से सामने लेकर आती हैं और देखने वालों को यह हिम्मत बंधाने की कोशिश करती हैं कि अपनी दुनिया बदलने वाले आपसे कुछ अलग नहीं है. अगर आप एक पंगा ले सकते हैं तो!

फिल्म में सबसे पहले जो चीज आपका ध्यान खींचती है वह यज्ञ भसीन नाम की एक आफत की पुड़िया है. महज सात-आठ बरस की उम्र में कमाल का अभिनय करने वाले यज्ञ ने फिल्म में जया निगम के बेटे की भूमिका निभाई है. कहना चाहिए कि बित्ते भर का यह छोकरा जितना जमीन के ऊपर है, उतना ही जमीन के अंदर भी. यज्ञ पूरी फिल्म के दौरान बमुश्किल ही कहीं पर सटीक टोन या एक्सप्रेशन पकड़ने में चूकते हैं और बहुत सारे ठहाकों की वजह भी बनते हैं. हालांकि इसमें लेखक और निर्देशक का भी बड़ा हाथ है. अश्विनी अय्यर ने तमाम कड़वी बातों को ह्यूमर की चीनी चढ़ाकर सामने रखा है और इसके लिए सबसे बढ़िया इस्तेमाल यज्ञ भसीन का किया गया है. इसके अलावा, जो बचता है उसे जस्सी गिल संभाल लेते हैं. ज्यादातर वक्त मुस्कुराते हुए दिखाई देने वाले गिल एक बेहद प्यार करने वाले पति के साथ-साथ एक परंपरागत, क्लूलेस भारतीय मर्द का खाका भी बखूबी सामने लाते हैं.

फिल्म में इस बात को खामी की तरह देखा जा सकता है कि जया निगम का परिवार कुछ ज्यादा ही सपोर्टिव है. लेकिन अगर फिल्में सच में समाज पर असर डालती हैं तो इस तरह के पुरुष किरदार परदे पर दिखाई देते रहने चाहिए जो हर कदम पर पत्नी का साथ देते हैं. साथ ही, ऐसे बच्चे भी जो अपनी मांओं को उनके बिसरे हुए सपने की तरफ हाथ बढ़ाने को प्रेरित करते हैं.

मुख्य भूमिका निभा रहीं कंगना रनोट पर आएं तो उनकी तारीफों के पुल नहीं, बांध बांधने का मन करने लगता है. असल जिंदगी में भी पंगेबाज कंगना अपने बयानों और हरकतों से भले ही कइयों को नाराज करती रही हों लेकिन परदे पर उनसे नाराज होना डॉन को पकड़ने से भी ज्यादा मुश्किल है. इस फिल्म में भी उन्होंने हमेशा की तरह खुशी से जुबान बंद कर देने वाला अभिनय किया है. जरा घुमाकर कहें तो इस बार कंगना रनोट ने ऐसा ‘पंगा’ लिया है जिसके लिए उनकी खूब-खूब तारीफ करने का मन होता है.

पंगा में कंगना रनोट को देखकर लगता है जैसे उनके पास एक्प्रेशन्स का कोई, कभी न खत्म होने वाला खजाना हो. हर दृश्य की ज़रूरत के हिसाब से सटीक और लाजवाब एक्सप्रेशन्स. फिल्म में एक दृश्य है जिसमें कंगना अपने नवजात बच्चे से उसकी देखभाल करने का वादा करती है, इसमें कंगना के चेहरे के भाव कुछ ऐसे है कि उन्हें देखकर आपको कलेजा निकालकर रख देने वाली कहावत का मतलब समझ आ जाता है. कुछ इसी तरह के कमाल एक्सप्रेशन्स वे तब भी देती हैं जब नेशनल खिलाड़ी होने के बावजूद कोई उन्हें नहीं पहचानता है. और तब भी जब नई शुरूआत के लिए घर छोड़ने से पहले, वे उसकी तरफ एक नज़र देखती हैं. कभी-कभी कंगना रनोट इस तरह के फेमिनिस्ट किरदारों को जीते हुए खुद को भी उनमें शामिल कर देतीं हैं जो देखने वालों को खटक जाता है. जैसा कि उनकी पिछली फिल्म ‘जजमेंटल है क्या’ में बहुत ज्यादा हुआ था. लेकिन पंगा के किसी भी दृश्य में, चुटकी भर भी कंगना रनोट नहीं दिखाई देती हैं और यह उनकी बहुत बड़ी जीत है.

अश्विनी अय्यर तिवारी ने अपनी नायिका के अलग-अलग पक्ष दिखाने वाले तमाम किरदारों को भी पूरी तवज्जो के साथ रचा है. जया निगम के पति और बच्चों के अलावा उसकी मां और दोस्त भी अय्यर की कहानी का एक अटूट हिस्सा हैं. ये भूमिकाएं नीना गुप्ता और ऋचा चड्ढा ने निभाई हैं. नीना गुप्ता अपनी चाल, आवाज और अभिनय से एक ऐसी कॉमन मां को परदे पर लाती हैं जो बेटी के नखरों पर उसे झिड़कती रहती है लेकिन उसकी कामयाबियों पर खुशी और गर्व से बौराती भी है. ऋचा चड्ढा भी कुछ बनारसिया और कुछ बिहारी अंदाज लिए परदे पर दिखाई देती है और अपने किरदार के अनोखे दबंगपन से प्रभावित करती हैं.

अगर फिल्म का खामियों पर बात करनी हो तो कहा जा सकता है कि इस स्पोर्ट्स ड्रामा में वही हिस्सा थोड़ा बोरियत भरा है जहां पर स्पोर्ट को शामिल किया गया है. कंगना रनोट की वापसी की तैयारी वाला सीक्वेंस लंबा तो है लेकिन वजनदार नहीं लगता है. क्लाइमैक्स का पूरा-पूरा अंदाजा लग जाना भी पंगा की एक बड़ी कमी है. इसके अलावा, फिल्म में विलेन के करीब लगने वाले महिला किरदार के जया निगम से नफरत करने की वजह कुछ खास समझ नहीं आती है. लेकिन इन सबके बाद भी फेमिनिज्म से लबरेज यह स्पोर्ट्स ड्रामा देखकर मनोरंजन की पूरी तुष्टि होती है.