केंद्र सरकार ने भीमा कोरेगांव मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दी है. इससे एक दिन पहले ही महाराष्ट्र सरकार ने 2018 के इस मामले की समीक्षा का फैसला लिया था. केंद्र सरकार के इस फैसले पर उसने नाराजगी जाहिर की है. महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने कहा कि इस बारे में राज्य सरकार से पूछा तक नहीं गया. उनका यह भी कहना था कि भीमा कोरेगांव मामले की जांच एनआईए को सौंपना संविधान के खिलाफ है और वे इसकी निंदा करते हैं.

एक जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव युद्ध की 200वीं वर्षगांठ पर पुणे के भीमा कोरेगांव में इकट्ठा लोगों पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया था. इस टकराव में एक युवक की मौत हो गई थी. इसके विरोध में पूरे महाराष्ट्र में प्रदर्शन हुए थे. इसके बाद महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने युवक की मौत की जांच अपराध जांच विभाग (सीआईडी) सौंप दी थी. बाद में पुलिस ने इस सिलसिले में कई सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था. इन पर हिंसा भड़काने के आरोप लगे थे. इन्हें माओवादियों के शहरी नेटवर्क के शीर्ष लोग बताया गया था. इनमें यलगार परिषद के आयोजक सुधीर धावले, कमिटी फॉर रिलीज ऑफ पॉलिटिकल प्रिजनर्स के सचिव राणा विलसन और नागपुर के वकील सुरेंद्र गडलिंग शामिल हैं.

एक जनवरी को हुई हिंसा से एक दिन पहले इस संगठन ने ही यलगार परिषद का आयोजन किया था. सरकार का कहना था कि भीमा कोरेगांव की हिंसा एक प्रायोजित साजिश के तहत की गई थी जिसका मकसद महाराष्ट्र और केंद्र सरकार को बदनाम करना था.

भीमा कोरेगांव युद्ध एक जनवरी 1818 को हुआ था. इसमें 500 सैनिकों की अंग्रेजी सेना ने बाजीराव द्वितीय के 28 हजार पेशवा सैनिकों को परास्त कर दिया था. अंग्रेजी सेना में ज्यादातर सैनिक महार समुदाय से थे, जिन्हें तब अछूत माना जाता था. दलित समुदाय इसे महार सैनिकों की जीत के रूप में मनाता है और हर साल यहां समारोह आयोजित करता है. 2018 में इसकी 200वीं वर्षगांठ थी.