साहित्य-संस्कृति के इतिहास ने कृष्णा सोबती के नाम बहुत कुछ दर्ज किया है. उनके लिखे अल्फाज जिंदगी के हर अंधेरे कोने में दिया बनके कंदीलें जलाने को तत्पर मिलते हैं. फूलों को अतत: सूखना ही होता है, बेशक जीवन के फूलों को भी! लेकिन एक समर्थ और सार्थक कलम उन्हें सदैव महकाए रखती है. ऐसी एक कलम का नाम कृष्णा सोबती था.

कृष्णा सोबती का जिस्मानी अंत 25 जनवरी 2019 को तब हुआ था जब देश औपचारिक रूप से गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारियों में मसरूफ था. तब भी तंत्र हावी था और गण गौण. इन्हीं चिंताओं के साथ गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कृष्णा जी ने आखिरी सांस ली थी. अंधकार में खड़े उनके साथी, समकालीन (लेखक) और पाठक-प्रशंसक, एक साल बाद उनका गहरी शिद्दत के साथ पुण्य स्मरण कर रहे हैं. कृष्णा सोबती आज जिस्मानी तौर पर होतीं तो आज के मुश्किल समय में उनका कहा, लिखा और बोला यकीनन मशाल का काम करता.

कृष्णा सोबती ने अंतिम दौर में अपनी चिंतनधारा और यथार्थवादी अनुभवों से फासीवादी प्रवृत्तियों पर खूब और जमकर प्रहार किए. इस दौरान उन्होंने रचनात्मक लेखन लगभग स्थगित कर दिया था और वैचारिक लेखन को तरजीह दी. भीतर की रोशनी बेशक तेज हो गई थी लेकिन आंखों ने देह का साथ लगभग छोड़-सा दिया था. बहुत मोटे लेंस के साथ बामुश्किल वे पढ़ती- लिखतीं और बुद्धिजीवी होने का सच्चा धर्म निभातीं.

तब का ‘जनसत्ता’ आज से थोड़ा अलग था. तब वह कहीं न कहीं प्रतिरोध की आवाज का एक मंच भी था. उस वक्त उनके लेख, जिन्हें वे अपने मोटे लेंस वाले चश्मे के सहारे हाथ से लिखा करती थीं, अखबार के पहले पन्ने पर ‘बैनर न्यूज़’ की जगह छपते थे. जुल्मत की मुखालफत में एक-एक लफ्ज को उन्होंने कैसी वैज्ञानिक संवेदना और तार्किक क्रोध के साथ लिखा, इसे उनके वे लेख पढ़कर ही जाना जा सकता है. या तब जाना जाएगा जब अंतिम दिनों का उनका वैचारिक लेखन किताब की शक्ल में सामने आएगा.

अपने समकालीन तथा अपने समकक्ष कद वाले हिंदी लेखकों में वे पहली थीं जिन्होंने अराजकता-असहिष्णुता के विरुद्ध इस तरह कलम चलाई कि असाहित्यिक पाठकों को भी सही ‘परख’ के लिए नई दशा-दिशा मिली. कृष्णा सोबती जब यह सब कर रही थीं तब उनके ज्यादातर समकालीन लेखक आराम कुर्सियों पर बैठे विपरीत समय को बगल से गुजरते देख रहे थे. या कहानियां-कविताएं लिखते-पढ़ते ऊब-ऊंघ रहे थे. कृष्णाजी कभी भी उन संस्कृतिकर्मियों की कतार का हिस्सा नहीं रहीं जो ये मानते हैं कि एक (रचनात्मक) ‘लेखक’ का काम सिर्फ लिखना होता है, सामाजिक सरोकारों में जमीनी स्तर पर आकर हिस्सेदारी करना नहीं. अपनी जीवन संध्या में उन्होंने खुलकर उन वर्गों के हक में लिखा- बोला, जो या तो सत्ता के निशाने पर रहते हैं या समाज के हाशिये पर.

सरकारी साहित्यिक पुरस्कारों की बेशर्म लूटपाट और जोड़-तोड़ के बीच प्रतिरोध की प्रतिनिधि आवाज बनते हुए कृष्णा सोबती ने भारतीय साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता एक पल में छोड़ दी. इस सदस्यता को लेखन का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है. लोकतांत्रिक मूल्यों की पक्षधरता के लिए इसे वापस लौटाना उन्होंने अनिवार्य माना. वे इस सोच पर अडिग थीं कि लोकतंत्र के क्षरण के साथ मनुष्यता के खत्म होने का संक्रमण भी शुरू हो जाएगा. उनकी किताब ‘शब्दों के आलोक में’ इसी चिंतनधारा के साथ प्रारंभ और समाप्त होती है. यह उनके ‘जिंदगीनामा’ के फलसफे का भी सच था.

असहिष्णुता के खिलाफ हिंदी समाज से पहली बड़ी आवाज कृष्णा सोबती की उठी थी. उठी क्या-गूंजी थी! प्रतिरोध की उस गूंज में इतनी तीव्रता थी कि कई बड़े वामपंथी लेखक भी उनसे किनारा कर गए कि कहीं सत्ता के कहर का शिकार न होना पड़ जाए. हालांकि भारतीय भाषाओं के बेशुमार बड़े लेखक-संस्कृतिकर्मी कृष्णा जी के साथ आते गए. तभी पुरस्कार वापसी का अभियान चला जिसे सत्ता पक्ष ने अवार्ड वापसी गिरोह कहकर लांछित किया.

इसी दौरान दिल्ली में ‘प्रतिरोध’ के नाम से एक विशाल सेमिनार आयोजित किया गया था. इसमें देश के अलग-अलग भाषाओं के बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों ने शिरकत की. रोमिला थापर, डॉ कृष्ण कुमार, अशोक बाजपेयी और गणेश देवी आदि भी इसमें शामिल थे. कृष्णा सोबती बीमारी की हालत में इस सेमिनार की अध्यक्षता करने वहील चेयर पर आई थीं. उनका शरीर कमजोर था लेकिन प्रतिरोध की आवाज बेहद-बेहद बुलंद! इस कदर कि वे एक घंटा से ज्यादा समय तक इतना प्रभावशाली और इतनी ऊर्जस्विता के साथ बोलीं कि मौजूद तमाम लोग कुर्सियों से खड़े होकर देर तक तालियां बजाते रहे. वैसा निर्भीक और साहस भरा जोशीला भाषण शायद ही कभी किसी हिंदी लेखक ने शासन-व्यवस्था के खिलाफ दिया हो. उनका दो टूक मानना था कि सच्चे लेखक की अपनी स्वतंत्र सत्ता होती है जो दरबारी-सरकारी सत्ता से कहीं ज्यादा सशक्त और पाक-पावन होती है.

लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था और उसकी हिफाजत का जज्बा उनके खून में था. उनका पहला उपन्यास ‘चन्ना’ था जो छपकर तब आ पाया जब वे मृत्युशैया पर थीं. आधी सदी पहले लिखे अपने इस उपन्यास को उन्होंने अपनी जेब से पैसे देकर अधछपा वापिस उठा लिया था. प्रकाशक उसमें से पंजाबी-उर्दू के कुछ शब्द हटाना चाहता था जो कृष्णा सोबती को मंजूर नहीं हुआ और छपाई का हर्जाना देकर उन्होंने इसे ‘विड्रा’ कर लिया. 2019 में इसे राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया. यह उनकी जिंदगी रहते छपी आखिरी किताब थी जो सबसे पहले लिखी गई थी. लेकिन उन्होंने अपनी लेखकीय आजादी की हिफाजत करते हुए इसे नहीं छपवाया. यह प्रकरण मिसाल है कि जिन लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति वे अपने आखिरी वक्त में संघर्षरत थीं, उन्हीं के लिए अपने लेखकीय जन्म के वक्त भी थीं.

कृष्णा सोबती हिंदी शब्द संसार में अकेली हैं जिन्होंने अपने समकालीनों पर सबसे ज्यादा और विस्तार से लिखा है. यहां भी उनकी ‘लोकतांत्रिक लेखनी’ की दृढ़ता स्पष्ट दिखती है. उन्होंने अपनी उम्र से छोटे और उपलब्धियों के लिहाज से कमतर माने जाने वाले लेखकों पर लिखने में अपनी हेठी नहीं समझी. ईमानदार प्रतिभा की वे कायल थीं और इस धारणा की पक्की कि उनकी वजह से कोई फूल सूख ना जाए! बलवंत सिंह, रमेश पटेरिया, अमजद भट्टी, महेंद्र भल्ला, रतिकांत झा, खान गुलाम अहमद, उमाशंकर जोशी, देवेंद्र इस्सर, गिरधर राठी, सौमित्र मोहन, स्वदेश दीपक और सत्येन कुमार सरीखी विलक्षण प्रतिभाओं पर समग्रता से इतना डूबकर किसने लिखा है? कृष्णाजी लिख सकती थीं और उन्होंने ही लिखा.

यह भी कृष्णा सोबती कर सकती थीं कि ज्ञानपीठ पुरस्कार से मिली 11 लाख रुपए की राशि साहित्यसेवियों के सहयोगार्थ रज़ा फाउंडेशन को सौंप दें. वह भी तब, जब खुद उन्हें आर्थिक दिक्कतें घेरे हुए थीं. वसीयत में उन्होंने करीब एक करोड़ रुपए का एक फ्लैट भी रज़ा फाउंडेशन के नाम कर दिया.

तो ये हैं जिंदगीनामा, दिलो-दानिश, ऐ लड़की, डार से बिछुड़ी, मित्रो मरजानी, यारों के यार, तिन पहाड़, सूरजमुखी अंधेरे के, समय सरगम, जैनी मेहरबान सिंह, गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान, चन्ना, बादलों के घेरे, हम हशमत, शब्दों के आलोक में, बुद्ध का कमंडल: लद्दाख, मार्फत दिल्ली, मुक्तिबोध: एक व्यक्तित्व सही की तलाश में की लेखिका के जिंदगीनामे के सदा जिंदा रहने वाले चंद पहलू!