भारतीय लोकतंत्र सात दशक पूरे कर रहा है और इस समय संकट में है. यह कोई राहत की बात नहीं है कि सारे संसार में लोकतंत्र ख़तरे में हैं, बिखर रहे हैं और तानाशाही वृत्तियां उभार पर हैं. विडंबना यह है कि अकसर लोकतंत्र को ख़तरे लोकतंत्र के अंदर से ही पैदा होते हैं. हमारे यहां, जैसे कि लोकतंत्र के विश्व-इतिहास में और देशों में ही, लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन कर नागरिकता, विचार, अभिव्यक्ति, निजी स्वतंत्रता, सामुदायिकता सद्भाव और परस्परता, जवाबदेही, नैतिक बोध और ज़िम्मेदारी, अल्पसंख्यकों के अधिकारों आदि सभी में, क़ानून-मीडिया प्रचार और प्रसार के माध्यमों के दुरुपयोग, हिंसा और क्रूरता का सहारा लेकर, कटौती की जा रही है. विचित्र यह है कि लोकतंत्र के तराजू पर सत्ता, राजनीति, धर्म, मीडिया, आदि सभी हलके उतर रहे हैं.

लोकतंत्र को जिस तरह से बहुसंख्यकवाद का उपकरण बनाया जा रहा है, वह न तो संविधान की आत्मा के अनुरूप है, न भारतीय परंपरा और संस्कृति के. स्वयं न्यायिक प्रक्रिया और उसका सुनिश्चय करनेवाली संस्थाएं इतनी साहसहीन पहले कभी नहीं थी जितनी आज. जो औरतें, जवान और दूसरे लोग इस समय संविधान की उद्देशिका का सार्वजनिक पाठ कर रहे हैं, वे समूचे लोकतंत्र, राजनीति और न्यायालयों को याद दिला रहे हैं कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांत क्या रहे हैं और क्या होने चाहिये. जब व्यापक रूप से लोकतंत्र की स्थिरता में विश्वास डगमगाने सा लगा है, तब साधारण, लगभग नामहीन, अज्ञातकुलशील नागरिक, जिनमें से अधिकांश स्त्रियां हैं, उसे सत्यापित कर रहे हैं. यह बात नोट करने की है कि संविधान तो बड़े-सयानों की एक सभा ने बनाया था पर अब साधारण नागरिक उस पर इसरार कर उसे अपने मूल ग्रंथ की तरह अपना रहे हैं. यह हमारे संविधान का अप्रत्याशित पर बेहद उत्साहजनक सत्यापन है. यह सत्ता, न्यायालय, मीडिया आदि सभी को यह याद दिलाना है कि अब हमारा एक लोकप्रिय संविधान है और उससे विचलन आसानी से नागरिक नहीं होने देंगे!

उम्मीद यह करना चाहिये कि यह नागरिक उभार, जो सौभाग्य से देशव्यापी है, भारत को एक नये मानवीय भारतीय और ज़िम्मेदार लोकतंत्र में बदलने की शुरुआत है. आगे की राह कठिन होगी. सभी शक्तियां उसमें रोड़े अटकायेंगी. पहल को भटकाने की कोशिश कंबल-छीन पुलिस, सत्ता की क्रूर तांत्रिक शक्तियां, गोदी मीडिया आदि करेंगे. इसका प्रतिरोध करना आसान नहीं पर ज़रूरी होगा. यह गांधी के असहयोग आन्दालेन और सविनय अवज्ञा की वापसी है. अभी भी सारे लगभग अभद्र लांछनों के बावजूद, यह पहल नैतिक आभा से अहिंसक दमक रही है. उसे घुसपैठ कर बरगलाने, गुमराह करने, उसमें फूट पैदा करने आदि नीच कोशिशें होंगी. पर जो नागरिक आत्मविश्वास और धीरज दिखायी दे रहा है उससे यह उम्मीद की जा सकती है कि अन्ततः हमारे लोकतंत्र का कायाकल्प होकर रहेगा क्योंकि अब नागरिक ही ऐसा रूपान्तरण चाहते हैं. सातवां दशक उम्मीद के साथ समाप्त हो रहा है यह बहुत रोमांचक घटना है, स्वयं लोकतंत्र और भारतीय नागरिकों के लिए.

व्याख्या की उत्तेजना

जब किसी कलाकृति की कोई व्याख्या करने की कोशिश करता है तो यह संभावना सहज ही बनी रहती है कि ऐसी व्याख्या हमें उस कलाकृति का ऐसा अर्थ दे जो अप्रत्याशित हो या कि ऐसे अर्थ की पुष्टि करे जिसे हम पहले से, भले थोड़ा धुंधला, जानते-समझते थे. ऐसी व्याख्या भी हो सकती है जो किसी कृति को ऐसे किसी व्यापक सन्दर्भ में रख दे जिसमें रखकर उसे पहले न देखा-समझ गया हो और जो इस कारण उसे नयी अप्रत्याशित अर्थाभाओं से दीप्त कर दे.

विश्वविख्यात बुद्धिजीवी और विद्वान् होमी भाभा ने सैयद हैदर रज़ा की एक क्लासिक मानी जानेवाली कृति ‘मां’ की ऐसी ही व्याख्या से रज़ा व्याख्यान की शुरूआत की जिसने कई तरह से कई कला विशेषज्ञों को चौंका दिया. भाभा ने उस हिंदी कविता के सहारे, जिसकी एक पंक्ति रज़ा ने इस कृति मे उद्धृत की है, इस कलाकृति को आत्मनिर्वासन और वापसी की आकांक्षा और उसकी असम्भावना से जोड़कर समझने की कोशिश की. इस कोशिश ने चित्र और कविता के बीच जो अप्रगट संवाद है उसे ज़ाहिर करने की कोशिश की. इस कोशिश ने चित्र और कविता के बीच जो अप्रगट संवाद है उसे ज़ाहिर किया और इस समय जो शरणार्थियों को लेकर विश्वव्यापी संकट है और स्वयं भारत में करोड़ों नागरिकों को अपने ही देश में शरणार्थी बनाने की कुटिल चाल है उससे जोड़कर बिलकुल नये क़िस्म की प्रासंगिकता दे दी. रज़ा में आध्यात्मिक तत्व की खोज और उस पर इसरार उनके अनेक अध्येताओं ने किया है. भाभा ने, एक तरह से, रज़ा को आकाशचारी कलाकार होने के बजाय एक भूमिस्थ कलाकार के रूप में देखा। यह ऐसी व्याख्या थी जिसने चित्र अैर कविता के नये अर्थ खोले.

भाभा ने अपने व्याख्यान का दूसरा खंड वाल्टर बेन्यामिन के इस कथन से शुरू किया कि किसी भी दिये हुए समय में जीवित लोग अपने को इतिहास की दोपहर में हुआ मानते हैं जिन्हें अतीत के लिए एक भोज तैयार करना होता है. इतिहासकार वह संदेशवाहक होता है जो मृतकों को खाने की मेज़ पर आमंत्रित करता है. हन्ना एरेंट और बेन्यामिन के हवाले से भाभा ने बताया कि तथाकथित प्रगति हवा है जो भविष्य की ओर ले जाती है जबकि बरबादी का ढेर सामने ऊंचा होता जाता है. प्रगति और बरबादी का ढेर. मृत्यु और स्वतंत्रता की खोज।मानवीय जोखिम और मानव अधिकार.

भाभा ने संसार भर में उभरती नयी बर्बरता का ज़िक्र किया. बर्बर अब दरवाज़ों पर नहीं हैं, वे उन दरवाज़ों के चौकीदार हो गये हैं! उनके शिकार हैं प्रवासी और शरणार्थी जो इतिहास-पीड़ित समूह हैं, दलित और शोषित. अमरीकी राष्ट्रपति के पिछले चुनाव के दौरान यह सार्वजनिक दावा किया गया था कि हम बर्बर होने जा रहे हैं और हम जीतेंगे. बर्बरता, शायद इधर पहली बार, एक विचारधारात्मक तत्व है.

भाभा ने हमारी आज की मानवीय स्थिति की जो विशद और जटिल व्याख्या की वह नयी बौद्धिक उत्तेजना का कारक बन गयी. चित्र, कविता, विचार, मोन्ताज़, फ़ोटोग्राफ़, सोशल मीडिया आदि सभी को जोड़ना और इस जोड़ से आज की स्थिति की भयावहता को समझने की कोशिश करना कठिन है पर ज़रूरी भी. हमारा देसी संकट भयावह है पर हमारा विश्वसंकट उससे भी अधिक भयावह है. ये भयावहताएं अलग नहीं हैं पर उनका जटिल जोड़ हम महसूस नहीं करते जब तक कि होमी भाभा जैसा चिन्तक हमारे सामने उस जोड़ को उजागर नहीं करता. निर्भीक और खुला विचार भी ईमानदार कर्म है जो तथाकथित सीधी कार्रवाई जैसा ही मूल्यवान है.

नवें दशक में

इस बार मैंने अपना जन्मदिन दूसरों को याद करते हुए बिताया. बिना किसी संकोच के अपने इस भाग्य को सराहते हुए कि मुझे अपने जीवन और कार्य में इतने सारे मूर्धन्यों का संगसाथ उनका और उनसे आलोक मिला जबकि शायद मैं उनकी उदारता का इतना सुपात्र न भी रहा होऊं. संयोग यह भी हुआ कि सेतु प्रकाशन ने इस अवसर पर मेरे संस्मरणों की पुस्तक ‘अगले वक़्तों के है ये लोग’ प्रकाशित कर दी. उसमें 11 लेखकों संपादक, 2 संगीतकारों, 2 चित्रकारों, 2 रंगकर्मियों और 1 राजनेता के संस्मरण शामिल हैं. ये पिछले बीस बरसों के दौरान जब-तब लिखे गये हैं और इसलिए उनमें शैली या रूपाकार की एकता नहीं हैं, कई बार तथ्यों का दुहराव है. संस्मरण आत्मवृत्तान्त भी होते हैं सो ये संस्मरण भी हैं ही. इनमें अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर, त्रिलोचन, कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, हरिशंकर परसाई, श्रीकान्त वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद, नेमिचन्द्र जैन, मल्लिकार्जुन मंसूर, कुमार गन्धर्व, रज़ा, जगदीश स्वामीनाथन, हबीब तनवीर, बव कारन्त, अर्जुन सिंह आदि शामिल हैं.

छोटी सी भूमिका में मैंने यह दर्ज़ किया है कि मुझे यह जल्दी ही समझ में आ गया था कि आत्म अपनी अद्वितीयता भी, अगर वह अभीष्ठ हो तो, दूसरों से प्रतिकृत होकर, ‘द्वितीयता’ से मिलकर ही गढ़ सकता है. किसी गहरी और टिकाऊ सार्थकता में आत्म पर के बिना सम्भव ही नहीं है. एक अर्थ में यह एक अधूरी पुस्तक है. मुझे कुंवर नारायण, रघुवीर सहाय, नामवर सिंह आदि के संस्मरण भी लिखना चाहिये. मुझे उम्मीद है कि आगे ऐसा कर पाऊंगा.

हालांकि कई व्यक्तियों के अपेक्षाकृत अनजाने पक्ष इन संस्मरणों में ज़ाहिर हुए हैं पर इनके माध्यम से मैंने उनके नकारात्मक पक्ष सामने लाने का कोई यत्न नहीं किया है. यह कुछ छुपाने की चतुराई नहीं है. मुझे ऐसे नकारात्मक पक्ष जानने का दुर्योग नहीं मिला. ये संस्मरण एक तरह का कृतज्ञता ज्ञापन है जिसे करने में मुझे कोई संकोच नहीं हुआ है. इन सभी ने मुझ पर भरोसा किया; मुझे बढ़ावा और सहारा दिया; मुझे साहस और अन्तःकरण की रोशनी को बचाये रखने की प्रेरणा दी और मनुष्यता, सृजन और विचार में विश्वास करने को पुष्टसशक्त किया. मुझे अपने इस दुर्लभ सौभाग्य को सराहने में कोई संकोच नहीं है कि ऐसे दिग्गज मिले जो न होते तो मैं वह न हो पाता जो, सारी कमियों के रहते, बन पाया.