हाल ही में ब्रिटेन ने एक ऐसा प्रधानमंत्री चुना जिसने प्रजातांत्रिक कार्रवाई से बचने के लिए गैरकानूनी तरीके से संसद को बंद कर दिया और जो अपनी सुविधा से बेहिसाब झूठ बोलता है. टीवी कैमरे के सामने बोलते हुए बोरिस जॉनसन मीडिया को तवज्जो नहीं देते हें और अपने ब्रेक्जिट समझौते में शामिल मूलभूत बातों को ही मानने से इनकार कर देते हैं.

2016 के राष्ट्रपति चुनाव में अमेरिकी जनता के सामने दो विकल्प थे. इनमें से एक ऐसा था जिसने कैंपेन के दौरान 75 फीसदी सही बयान दिए. जबकि एक फैक्टचेक एजेंसी के मुताबिक दूसरे उम्मीदवार के 70 फीसदी दावे गलत थे. अमेरिका ने डोनाल्ड ट्रंप को चुना, जो राष्ट्रपति बनने के बाद अब तक 1300 से ज्यादा बार झूठ बोल चुके हैं.

लेकिन फिर भी पिछले दो सालों से डोनाल्ड ट्रंप अप्रूवल रेटिंग्स (लोकप्रियता) में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है और 77 फीसदी रिपब्लिकन उन्हें ईमानदार मानते हैं. उधर बोरिस जॉनसन प्रचंड बहुमत से जीतकर फिर से प्रधानमंत्री बने और ब्रिटेन की आधी जनता को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि उन्होंनें संसद को गैरकानूनी तरीके से बंद कर दिया था.

यह कैसे मुमकिन है? लोकतंत्र के गौरवशाली इतिहास वाले समाज में झूठ बोलने वाले नेता लोगों की पहली पसंद कैसे बन गए? क्या जनता अब झूठ को लेकर संवेदनहीन हो गई है? क्या उन्हें सच और झूठ की खबर नहीं होती? क्या लोगों को अब सच की कोई परवाह ही नहीं रही?

मेरी टीम की रिसर्च में पता चला है कि अमेरिकी वोटरों पर - जिसमें डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक भी शामिल हैं - ट्रंप के झूठ बोलने का असर तो पड़ता है. मतलब जब उन्हें यह मालूम पड़ता है कि ट्रंप का कोई दावा गलत है, तो वे उस बात पर विश्वास करना कम कर देते है. लेकिन इसके बावजूद ट्रंप के प्रति उनकी वफादारी में कोई कमी नहीं आती. यानी ट्रंप के बयान गलत साबित होने के बाद भी उन्हें मिलने वाला समर्थन बरकरार रहता है.

साफ है जब नेता झूठ बोलता है तो मतदाता उसे बखूबी समझ लेते हैं और जब उस झूठ की तरफ उनका ध्यान खींचा जाता है तो वे उसे स्वीकार भी करते हैं. लेकिन यही मतदाता न सिर्फ उस झूठ को बर्दाश्त करतें हैं बल्कि अपने पसंदीदा नेता को समर्थन देना भी जारी रखते हैं. हमारी टीम, और अलग-अलग तरीकों से किए गए दूसरे शोधों में भी, नेताओं को मिलने वाले समर्थन और उनकी बातों की कथित सच्चाई के बीच का यह विरोधाभास बार-बार सामने आया.

लेकिने इसका मतलब यह नहीं है कि लोगों ने राजनीति में सच्चाई और ईमानदारी की उम्मीद बिलकुल छोड़ दी है.

कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय के ओलिवर हाह्ल की रिसर्च में उन खास हालातों की पहचान की गई है जब जनता झूठ बोलने वाले नेताओं को भी स्वीकार कर लेती है. ऐसा तब होता है जब लोग किसी खास राजनीतिक व्यवस्था में अपने अधिकारों से वंचित हो जाते हैं और खुद को अलग-थलग पाते हैं. फिर जो नेता उन लोगों का चैंपियन बन जाता है, व्यवस्था या उसे चलाने वाले ‘इलीट’ वर्ग से लड़कर उन्हें उनका हक दिलाने का वादा करता है, लोग उसके झूठ को बर्दाश्त कर लेते हैं. ऐसी हालत में ईमानदारी और न्याय जैसे उन मूल्यों की खुली उपेक्षा से, जिन्हें इलीट वर्ग महत्वपूर्ण मानता है, लोगों को यह संकेत मिलता है कि उनका नेता उनके हक के लिए व्यवस्था से टकराने का माद्दा रखता है. जब लोगों को यह विश्वास दिला दिया जाता है कि उनका नेता बहुत बड़े उद्देश्यों के लिए लड़ रहा है तो वे झूठ को एक छोटी बात मानकर उसे नजंरअंदाज कर देते हैं.

इसके बाद डोनाल्ड ट्रंप और बोरिस जॉनसन जैसे लोकलुभावनवादी नेता, जो काल्पनिक आम जनता को उतने ही काल्पनिक सभ्रांत वर्ग के खिलाफ खड़ा करने में माहिर हैं, जब तथ्यों को अपने हिसाब से तोड़ते-मरोड़ते हैं तो उनके समर्थकों की नजरों में उनका कद घटने के बजाय और बढ़ जाता है. फिर आप लाख फैक्ट-चेक कर लें लेकिन ट्रंप, जॉनसन, दुतेर्ते, बोलसोनारो या उनके जैसे दुनिया के दूसरे नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता है.

ऐसे नेताओं को निष्क्रिय करने या उनके झूठ को फिर से अस्वीकार्य बनाने के लिए लोगों का राजनीतिक व्यवस्था में यकीन होना बेहद जरूरी है. हाह्ल और उनके साथियों की रिसर्च से पता चलता है कि जब जनता किसी राजनीतिक व्यवस्था को न्यायसंगत और निष्पक्ष मानती है तो वह झूठ बोलने वाले नेताओं को नकार देती है, झूठ फैलाने वालों को नापसंद करने लगती है. इसलिए आगे अब एक ही रास्ता नजर आता है - ऐसी राजनीतिक व्यवस्था तैयार की जाए जिसमें पॉप्युलिस्ट नेताओं का आकर्षण खत्म हो और ईमानदार नेताओं की अहमियत बढ़े.

इसके लिए कोई आसान फॉर्मूला मौजूद नहीं है. लेकिन इतना तो साफ है कि आय की असमानता पर राजनीतिक बहस होनी चाहिए. 2015 में दो दर्जन हेज फंड मैनेजरों ने पूरे अमेरिका के किंडरगार्टन टीचरों से ज्यादा कमाई की. और इतना पैसा होने के बावजूद अरबपति अब बाकी लोगों से कम टैक्स देते हैं. यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि आर्थिक असमानता उन वजहों में से एक है जिनसे कई लोगों का लोकतंत्र में विश्वास कम हो रहा है.

बोरिस जॉनसन ने बार-बार कहने के बाद भी अस्पताल के फर्श पर सोने को मजबूर न्यूमोनिया से पीड़ित एक बच्चे की तस्वीर को नहीं देखा. अगर बच्चों को अस्पतालों में बेड मिलने लगें तो जॉनसन के झूठ को जगह भी मिलनी बंद हो जाएगी.

एक और रास्ता मुमिकन है

अच्छी बात यह है कि कुछ दूसरे देशों में जिनकी राजनीतिक संरचना और नीतियां अमेरिका और ब्रिटेन से अलग है, मतदाता राजनेताओं के झूठ बर्दाश्त नहीं करते हैं. ऑस्ट्रेलिया में मेरी रिसर्च टीम ने पाया कि झूठ बोलने वाले नेताओं की हकीकत सामने आते ही मतदाताओं में उनका समर्थन कम हो गया.

बिलकुल अमेरिका वाली पद्धति से किये गए हमारे शोध में वहां हमने देखा कि आस्ट्रेलियाई लोग उन नेताओं का समर्थन करने में काफी कम रुचि दिखाते हैं जिनका झूठ पकड़ा जाता है. इसका किसी पार्टी से कोई लेना-देना नहीं होता. यानी कि मतदाता उन नेताओं के झूठ को भी बर्दाश्त नहीं कर रहे थे जो उनकी विचारधारा वाली राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं.

ऑस्ट्रेलिया में वोट डालना अनिवार्य है. ऐसा न करने वाले लोगों को जुर्माना भरना पड़ता है और मतदाता सभी पार्टी के उम्मीदवारों को अपनी पसंद के आधार पर रैंकिंग देते हैं. इन तरीकों से राजनीतिक ध्रुवीकरण को रोकने में मदद मिलती है और पता चलता है कैसे एक राजनीतिक प्रणाली में बदलाव लाकर किसी देश में भी बड़े बदलाव लाये जा सकते हैं.


ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के कॉग्निटिव साइकोलॉजी विभाग के अध्यक्ष स्टीफन लेवंडोस्की का यह लेख मूल रूप से द कन्वर्सेशन पर प्रकाशित हुआ है.