केंद्र सरकार ने असम के खतरनाक उग्रवादी समूहों में से एक नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) के साथ एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. पीटीआई के मुताबिक लंबे समय से अलग बोडो राज्य की मांग करते हुए आंदोलन चलाने वाले ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (एबीएसयू) ने भी इस समझौते पर हस्ताक्षर किये. इस त्रिपक्षीय समझौते पर असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल, एनडीएफबी के चार गुटों के नेतृत्व, एबीएसयू, गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव सत्येंद्र गर्ग और असम के मुख्य सचिव कुमार संजय कृष्णा ने गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में हस्ताक्षर किये. केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक समझौता है. उन्होंने यह दावा भी किया कि इससे बोडो मुद्दे का व्यापक हल मिल सकेगा.

असम में बोडोलैंड का मुद्दा और इससे जुड़ा विवाद छह दशक पुराना है. बोडो ब्रह्मपुत्र घाटी के उत्तरी हिस्से में बसी असम की सबसे बड़ी जनजाति है. वह 1960 से अपने लिए अलग राज्य की मांग करती आई है. उसका कहना है कि उसकी जमीन पर दूसरे समुदायों की अनाधिकृत मौजूदगी बढ़ती जा रही है जिससे उसकी आजीविका और पहचान को खतरा है. 1980 के दशक के बाद बोडो आंदोलन हिंसक होने के साथ तीन धाराओं में बंट गया था. पहली धारा का नेतृत्व नेशनल डेमोक्रैटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) ने किया जो अपने लिए अलग राज्य चाहता था. दूसरा संगठन बोडोलैंड टाइगर्स फोर्स (बीटीएफ) है जिसने ज्यादा स्वायत्तता की मांग की. तीसरा ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन यानी एबीएसयू था जिसने समस्या के राजनीतिक समाधान की मांग की. इस दौरान हुई हिंसा में सैकड़ों लोगों की जान गई और लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ा.

उधर, गैर बोडो संगठनों ने इस समझौते का विरोध किया है. उन्होंने इसके खिलाफ आज 12 घंटे का बंद बुलाया है. इसके कारण असम में बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) के तहत आने वाले चार जिलों - कोकराझार, बक्सा, चिरांग और उदलगुड़ी - में जनजीवन प्रभावित हुआ है.
यहां सभी शैक्षिक संस्थान बंद रहे और सड़कों पर वाहनों की आवाजाही नजर नहीं आई. गैर बोडो संगठनों की मांग है कि बोडोलैंड क्षेत्रीय प्रशासनिक जिलों (बीटीएडी) में रह रहे सभी गैर बोडो लोगों को शांति समझौते में शामिल किया जाना चाहिए.