बीती 11 जनवरी को जम्मू-कश्मीर पुलिस के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने अपने ही एक अफसर को हिजबुल मुजाहिदीन के दो वांटेड मिलिटेंट्स के साथ सफर करते हुए गिरफ्तार कर लिया. डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (डीएसपी) दविंदर सिंह के इस तरह पकड़े जाने से देश भर में सनसनी फैल गई. जम्मू-कश्मीर पुलिस पर सवाल उठने लगे और लोग कश्मीर में पुलिस-मिलिटेंट्स की सांठ-गांठ के बारे में भी बात करने लगे.

जिस बात ने इस प्रकरण को और ज़्यादा दिलचस्प बना दिया वह यह है कि दविंदर सिंह कोई मामूली पुलिसकर्मी नहीं था. वह श्रीनगर एयरपोर्ट पर विशेष एंटी हाइजैकिंग यूनिट में तैनात था, उसे अपने अच्छे काम के लिए कई तमगे मिल चुके थे और पुलिस फोर्स में उसकी काफी इज्ज़त थी. कहा जाता है कि जल्द ही उसे एसपी के पद पर प्रमोट किया जाने वाला था. वह उन लोगों में भी शामिल था जिसने 15 देशों के राजदूतों के उस प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया था कि जो हाल ही में जम्मू-कश्मीर के दौरे पर गया था.

लेकिन अगर कश्मीर में तीन दशक से चल रही मिलिटेंसी पर फिर से एक नज़र डाली जाये तो पता चलता है कि वहां के लिए यह मामला कोई नई चीज़ नहीं है. ऐसा 90 के दशक से ही चलता आ रहा है और शायद आगे भी ऐसे ही चलता रहेगा.

इससे पहले कि पुलिस और मिलिटेंट्स के इस रिश्ते पर विस्तार से बात की जाये, यह बताना ज़रूरी है कि 11 जनवरी को हुआ क्या था.

दविंदर सिंह उस दिन अपनी गाड़ी में राष्ट्रीय राजमार्ग पर जम्मू की तरफ सफर कर रहा था, जब उसे दक्षिण कश्मीर में काजीगुंड के पास गिरफ्तार किया गया. पुलिस की इस टीम का नेतृत्व दक्षिण कश्मीर के डीआईजी, अतुल गोयल, खुद कर रहे थे. गाड़ी में सिंह के साथ हिजबुल मुजाहिदीन के दो मिलिटेंट्स - नवीद बाबू और रफी राथर - के अलावा एक ओवर ग्राउंड वर्कर, मीर इरफान भी सफर कर रहा था. पुलिस के सूत्रों का कहना है कि वह इन मिलिटेंट्स को जम्मू और फिर उससे आगे ले जा रहा था.

इस घटना के बाद दविंदर सिंह के घर पर रेड की गई जिसमें कुछ हथियार भी बरामद हुए. सिंह का मामला फिलहाल एनआईए के पास है और उसने तफ्तीश के दौरान क्या कहा उसका अभी कुछ खास ब्यौरा उपलब्ध नहीं है. लेकिन जो बात सबको पता है वह यह है कि सिंह एक ऐसा पुलिस अधिकारी था जो मिलिटेंट्स के खिलाफ बेहद सख्त कार्यवाहियों के लिए जाना जाता था.

“दविंदर सिंह पहले ऐसे अफसरों में से थे जिन्होंने मिलिटेंसी के सफाये के लिए पुलिस विभाग में बनाए गए स्पेशल ओपरेशंस ग्रुप को जॉइन किया था. उनको पकड़े गए मिलिटेंट्स से चीज़ें उगलवाने का विशेषज्ञ माना जाता था” एक पुलिस सूत्र ने सत्याग्रह को बताया.

फिर क्या वजह रही होगी कि दविंदर सिंह मिलिटेंट्स के साथ जुड़ गया. इसका अभी कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल सकता है, लेकिन अगर हम अतीत में नज़र डालें तो शायद कुछ अंदाज़ा हो.

दविंदर सिंह के साथ पकड़ा गया मिलिटेंट, नवीद बाबू, भी पहले पुलिस में एक कांस्टेबल के रूप में काम किया करता था. बाबू ने दो साल पहले पुलिस की नौकरी छोड़ दी और अपने हथियार के साथ फरार होकर हिजबुल मुजाहिदीन से जा मिला.

दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले में रहने वाले नवीद बाबू के एक करीबी रिश्तेदार से सत्याग्रह ने बात की तो पता चला कि वह काफी समय से कश्मीर में हो रही “ज़्यादतियों” से काफी प्रभावित हो गया था.

“वो अक्सर कश्मीर में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघनों के बारे में बात करते थे और कहते थे कि इसके खिलाफ आवाज़ उठानी ज़रूरी है. पुलिस फोर्स का हिस्सा होते हुए उनके मुंह से ऐसी बातें सुनने में बेतुकी लगती थीं, लेकिन किसको पता था वो अपनी नौकरी छोड़ के सच में मिलिटेंट्स से जा मिलेंगे” बाबू के एक रिश्तेदार अपना नाम न छापने की शर्त पर सत्याग्रह को बताते हैं.

बाबू और सिंह कोई अपवाद नहीं हैं

पिछले पांच सालों में, कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों में, कम से कम 12 पुलिसकर्मियों ने अपनी नौकरियां छोड़कर मिलिटेंट्स ग्रुप जॉइन किए हैं. इनमें से ज्यादातर लोग अपने हथियार लेकर फरार हुए और फिर मिलिटेंट्स के गुटों में शामिल होकर वहां नये लड़कों को लड़ने की ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया.

जैसे शोपियां जिले का ही, आदिल बशीर शेख, पिछले साल एक पीडीपी विधायक के घर से सात AK-47 राइफलें लेकर फरार हो गया था. कुछ दिन बाद ही उसकी मिलिटेंट्स के साथ ली गयी तस्वीर सोशल मीडिया पर वाइरल हो गयी थी.

बशीर शेख अभी कुछ दिन पहले सुरक्षा बलों के साथ एक मुठभेड़ में मारा गया. उसके घरवालों का भी यही कहना है जो बाबू के घरवालों का था.

“नौकरी तो उसने हमें गरीबी से निकालने के लिए की थी, लेकिन अपने आसपास हो रहे ज़ुल्म को भी देख रहा था. हमें बिलकुल अंदाज़ा नहीं था कि वो ऐसा कोई कदम उठाएगा” शेख के पिता, बशीर अहमद ने अपने बेटे के मारे जाने के बाद कहा.

ये सब लोग अपनी नौकरियां छोड़कर मिलिटेंट गुटों में शामिल हुए थे. लेकिन दविंदर सिंह की ही तरह 2012 में भी एक पुलिस कांस्टेबल, अब्दुल रशीद शिगन, पुलिस में रहकर ही मिलिटेंट्स का काम कर रहा था. शिगन ने पुलिस की नौकरी करते हुए 13 मिलिटेंट हमले अंजाम दिये थे जिनमें कम से कम पांच पुलिसकर्मियों की जानें गयी थीं.

“दो साल तक शिगन अपने आप को उमर मुख्तार बता कर मीडिया को अपने ‘कारनामों’ की खबर देता रहा था.” 2012 में शिगन के पकड़े जाने के बाद एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने मीडिया से बात करते हुए कहा था.

शिगन से पहले भी 90 के दशक में कई पुलिसकर्मी, जिनमें कुछ आला अधिकारी भी शामिल थे, मिलिटेंट्स के साथ काम करते पाये गए थे या फिर अपनी नौकरियां छोड़कर मिलिटेंट्स के गुटों में जा मिले थे.

इनके बारे में अब ज़्यादा जानकारी नहीं मिलती क्योंकि उनके परिजन अब उनके बारे में बात करने से कतराते हैं. लेकिन सत्याग्रह के पास कम से कम दो ऐसे पुलिस उपाधीक्षकों के नाम हैं जिन्होंने अपनी नौकरियां छोड़कर मिलिटेंट ग्रुप जॉइन कर लिए थे.

तो ऐसे में सवाल यह है कि पुलिस की नौकरी छोड़कर मिलिटेंट्स का साथ देने वालों को ऐसा करने की प्रेरणा कहां से मिलती है?

नवीद बाबू और आदिल बशीर शेख के घरवालों की मानें तो इनमें से कई लोग अपने आसपास के हालात देखकर मिलिटेंट्स से जा मिलते हैं.

जानकार लोगों की मानें, तो ऐसा करने के और भी कई कारण हैं. “तरक़्क़ी, पैसा, शोहरत जैसी चीज़ें भी हैं जिनको अनदेखा नहीं किया जा सकता है,” कश्मीर के एक राजनीतिक जानकार सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं.

वे कहते हैं कि इसका एक और पहलू यह है कि मिलिटेंट्स के खिलाफ काम करते-करते पुलिसकर्मी ऐसी स्थितियों में फंस सकते हैं जहां उन्हें खुद भी अंदाज़ा नहीं होता कि वे किसी को इस्तेमाल कर रहे हैं या खुद इस्तेमाल हो रहे हैं.

“यहां कश्मीर में कुछ भी “ब्लैक एंड व्हाइट” नहीं है. बहुत छोटी सी जगह है, हर कोई हर किसी को जानता है और जब आप स्थानीय मिलिटेंट्स के खिलाफ स्थानीय लोगों को इस्तेमाल कर रहे होते हो तो आप यह नहीं भूल सकते कि आप भी यहीं के रहने वाले हो. इस्तेमाल आप भी हो सकते हैं और होते हैं” इस विशेषज्ञ ने, अपना नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर, सत्याग्रह को बताया.

जहां इन घटनाओं को झुठलाया नहीं जा सकता है, वहीं एक सच यह भी है कि जम्मू-कश्मीर पुलिस की मिलिटेंसी के खिलाफ जंग और उसमें दी गयी कुर्बानियों को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है.

पिछले तीन दशक में जम्मू-कश्मीर पुलिस के 1500 से ज़्यादा जवान मिलिटेंसी के खिलाफ लड़ते हुए मारे गए हैं. पिछले पांच-छह साल खास तौर पर कश्मीर में पुलिस वालों के लिए मुश्किल साबित हुए हैं. दर्जनों पुलिसकर्मियों को उनके घर में घुसकर मारा गया है, उनके परिजनों को मिलिटेंट्स ने अगवा किया है और सैंकड़ों पुलिस वालों को मिलिटेंटों की धमकियों के चलते अपनी नौकरी छोड़कर घरों में बैठना पड़ा है.

कश्मीर के डाइरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (डीजीपी), दिलबाग सिंह, भी इसी बात की तरफ इशारा करते हैं जब वे दविंदर सिंह प्रकरण पर कहते हैं, “मैं कहूंगा कि इतने दबाव वाला माहौल लोगों पर अपना प्रभाव डालता है. लेकिन मुझे गर्व है कि हमारी पुलिस फोर्स धैर्य और दृढ़ता के साथ लड़ रही है... एक ऐसी घटना बाकी सब चीजों को झुठला नहीं सकती.”

दिलबाग सिंह जो कह रहे हैं वह सच है. सत्याग्रह ने पिछले एक हफ्ते में पुलिस के कई आला अधिकारियों के साथ बात की और उनमें से लगभग सभी ने यह कहा कि इन घटनाओं का मतलब यह नहीं है कि पूरी पुलिस फोर्स ही मिलिटेंट्स के साथ मिली हुई है. लेकिन साथ ही ये सभी एक और बात कहते हैं - “कश्मीर में तीस साल से मिलिटेंसी के खिलाफ लड़ाई चल रही है और इससे निपटने के लिए हम नयी-नयी तरकीबें निकालते रहते हैं तो वे भी हाथ पर हाथ धरे तो बैठे नहीं रहेंगे न. जंग चल रही है और जंग में इन सब चीजों का होना लाज़मी है.” यानी इस तरह की घटनाएं होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी.