दिल्ली विधानसभा चुनाव में अब तकरीबन एक सप्ताह का वक्त ही बचा है. दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी और केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का चुनाव प्रचार अभियान जोरों पर है. दोनों दलों की ओर से प्रमुख नेता चुनाव प्रचार के काम में पूरी ताकत से जुटे हुए हैं. दोनों पार्टियों की ओर से सभाओं के साथ-साथ रोड शो भी चल रहे हैं. एक-दूसरे के खिलाफ जुबानी तीर चलाने में भी दोनों पार्टियां जुटी हुई हैं.

लेकिन 1998 से लेकर 2013 तक लगातार 15 साल तक दिल्ली प्रदेश की सत्ता पर काबिज कांग्रेस की ओर से इस बार के चुनावों के लिए कोई खास सक्रियता नहीं दिख रही है. न तो कांग्रेस की ओर से चुनाव प्रचार अभियान उस स्तर पर चल रहा है जिस पर आप और भाजपा का चल रहा है और न ही जो जुबानी तीर चल रहे हैं, उनमें से कोई अचूक बाण कांग्रेस की ओर से आता दिख रहा है.

विधानसभा चुनावों को लेकर जमीनी स्तर पर जिस तरह का प्रचार दिख रहा है, उससे यह साफ पता चल रहा है कि कांग्रेस की ओर से बड़े नेता अभी तक भी प्रचार करने के लिए मैदान में नहीं उतरे हैं. जबकि भाजपा की ओर से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता अपना सारा जोर लगाए हुए हैं. ऐसा ही कुछ आप भी कर कही है. उसकी ओर से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के अलावा उनकी पत्नी और बच्चे तक चुनाव प्रचार में उनका हाथ बटा रहे हैं. लेकिन कांग्रेस का प्रचार अभियान उसके उम्मीदवारों के प्रयासों तक ही सीमित दिख रहा है. पार्टी के उम्मीदवार अपनी-अपनी विधानसभा सीटों पर प्रचार करते दिख रहे हैं. इसमें उनका साथ दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा और दिल्ली के लिए कांग्रेस चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष बनाए गए कीर्ति आजाद ही दे रहे हैं. कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता इस मामले में ठीक से इसकी रस्म अदायगी तक नहीं कर रहे हैं.

2015 में हुए पिछले विधानसभा चुनावों में दिल्ली में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल पाया था. इस बार के चुनावों के बारे में यह माना जा रहा है कि शायद कांग्रेस पहले जितनी बुरी स्थिति में नहीं रहेगी. लेकिन जिन लोगों ने 2015 के विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस के प्रचार अभियान को करीब से देखा था, वे लोग यह कह रहे हैं कि इस बार के चुनाव प्रचार अभियान में तो पार्टी 2015 से भी अधिक सुस्ती दिखा रही है.

इस बारे में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस समिति के एक पदाधिकारी बताते हैं, ‘पार्टी के राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर के नेताओं का रुख देखकर तो यही लगता है कि वे यह मान गए हैं कि इस बार के चुनावों में भी कांग्रेस कुछ खास नहीं कर पाएगी. प्रदेश स्तर के नेताओं ने जब दिल्ली कांग्रेस के प्रभारी पीसी चाको से प्रचार अभियान में सुस्ती की बात की तो उनका जवाब था कि पार्टी के पास संसाधनों की कमी है. लेकिन सच तो यह है कि कांग्रेस ने अपने सीमित संसाधनों के साथ ही मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान का चुनाव जीता था. इसलिए दिल्ली में पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं की ओर से इन चुनावों को लेकर दिखाई जा रही सुस्ती संसाधनों से अधिक आत्मविश्वास से जुड़ी हुई है.’

इससे पार्टी को होने वाले दीर्घकालिक नुकसानों की ओर इशारा करते हुए वे आगे कहते हैं, ‘कांग्रेस के इस रवैये की वजह से पार्टी को दीर्घकालिक नुकसान हो रहा है. पारंपरिक तौर पर दिल्ली में जो वर्ग कांग्रेस के साथ रहा है, वह अब पार्टी को एक विकल्प के तौर पर देख ही नहीं पा रहा है. अल्पसंख्यक और दलित वर्ग पारंपरिक तौर पर कांग्रेस के साथ रहे हैं. लेकिन कांग्रेस इन लोगों में ये आत्मविश्वास नहीं जगा पा रही है कि अगर ये आम आदमी पार्टी का साथ छोड़ दें तो कांग्रेस एक मजबूत विकल्प के तौर पर उभर सकती है.’

दिल्ली विधानसभा चुनावों में उतरे दो कांग्रेस उम्मीदवारों से हुई बातचीत में यह स्पष्ट तौर पर सामने आया कि न सिर्फ इन दोनों बल्कि कई अन्य कांग्रेसी उम्मीदवारों की ओर से भी पीसी चाको समेत पार्टी के अन्य राष्ट्रीय नेताओं से यह आग्रह लगातार किया जा रहा है कि दिल्ली में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की सभाएं कराई जाएं और उनके रोड शो भी आयोजित किये जाएं. कांग्रेसी उम्मीदवारों को लग रहा है कि प्रियंका गांधी के चुनाव प्रचार अभियान में उतरने से पार्टी को कुछ फायदा तो जरूर हो सकता है. इन्हें यह लगता है कि प्रियंका गांधी के प्रचार करने से युवाओं और महिलाओं को कांग्रेस के साथ जोड़ने में सहूलियत होगी.

उम्मीदवारों की ओर से प्रियंका गांधी के अलावा राहुल गांधी की सभाओं की भी मांग की जा रही है. साथ ही कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी की सभाओं की मांग भी कांग्रेस उम्मीदवारों की ओर से लगातार की जा रही है. इन मांगों के बीच अब कांग्रेस ने किया यह है कि दिल्ली विधानसभा चुनावों के लिए स्टार प्रचारकों की सूची तैयार कर ली है. इनमें प्रियंका गांधी और राहुल गांधी के अलावा नवजोत सिंह सिद्धू और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे लोगों का नाम शामिल है. इस सूची में कांग्रेस के कुल 40 नेताओं के नाम हैं.

इस बारे में कांग्रेस के एक पदाधिकारी से बात करने पर यह पता चला कि दूसरे राज्यों के सांसदों और विधायकों को कांग्रेस पार्टी से दिल्ली बुलाया जा रहा है और उनके लिए चुनावों में जिम्मेदारियां तय की जा रही हैं. लेकिन ये पदाधिकारी भी ऐसा मानते हैं कि यह सब काम काफी पहले हो जाना चाहिए था. क्योंकि अब समय बहुत कम है इसलिए दूसरे राज्यों से आने वाले कांग्रेसी सांसदों और विधायकों के लिए इतने कम समय से दिल्ली को समझना बेहद मुश्किल कार्य होगा.

इन सब बातों से कुल मिला-जुला कर कांग्रेस पार्टी के अंदर और दूसरी पार्टियों के साथ-साथ आम लोगों में भी यही राय बन रही है कि कांग्रेस ने इन विधानसभा चुनावों में अपनी दावेदारी को खुद ही कम करके आंका है और यही वजह है कि कांग्रेस का चुनाव प्रचार अभियान अब तक जोर नहीं पकड़ पाया है.

हालांकि इस मामले में एक दिलचस्प आकलन यह भी है कि कांग्रेस जान-बूझकर इन चुनावों में उतनी सक्रियता नहीं दिखा रही है. उसे लगता है कि ऐसा करने से भाजपा के मुकाबले आप के जीतने की संभावना बढ़ जाएगी. ‘इससे होगा ये कि मोदी के खिलाफ धीरे-धीरे बन रहे माहौल को थोड़ा और समर्थन मिल जाएगा. पिछले दिनों महाराष्ट्र और झारखंड की सत्ता गंवाने और हरियाणा में जैसे-तैसे सरकार बनाने कs बाद भाजपा अगर दिल्ली भी हार गई तो यह उसके लिए एक बड़े खतरे की घंटी और विपक्ष के लिए काफी उत्साह बढ़ाने वाला होगा. कांग्रेस को लगता है कि दिल्ली जैसी जगह का विधानसभा चुनाव हारने से उसे कोई खास नुकसान नहीं होगा लेकिन अगर मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बना तो इसका उसे न सिर्फ दिल्ली में बल्कि देश भर में राष्ट्रीय चुनावों के वक्त फायदा होगा’ पार्टी के एक पदाधिकारी कहते हैं.