23 से 27 जनवरी तक चला जेएलएफ-2020 ख़त्म हो चुका है.और हर बार की तरह पीछे छोड़ गया है कुछ यादें, कुछ शिकायतें और इससे वापिस जुड़ने के लिए अगले साल तक का इंतजार. जयपुर साहित्य महोत्सव का यह 13वां संस्करण कई मायनों में अपने पुराने संस्करणों से काफी अलग रहा. मसलन इस बार जेएलएफ में प्रतिभागियों की तादाद काफी कम रही. रिपोर्ट लिखे जाने तक जेएलएफ के आयोजक इससे जुड़ा सही आंकड़ा उपलब्ध नहीं करवा पाए थे, लेकिन उनका अनुमान है कि इस बार यहां पिछले साल के मुकाबले आधे से भी कम लोग आए.

यदि जेएलएफ से जुड़ी शिकायतों की बात करें तो वे इसके पिछले संस्करणों जैसी ही हैं. यहां आने वाले अधिकतर साहित्यकारों, साहित्यप्रेमियों और पत्रकारों का मानना है कि जेएलएफ में बाज़ार और ग्लैमर पूरी तरह से साहित्य पर हावी हो चुका है. इनमें से कई जेएलएफ में हिंदी से जुड़े सत्रों की संख्या कम और अंग्रेजी के सेशन ज्यादा होने की बात पर भी अपनी नाराज़गी दर्ज़ करवाते हैं.

वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी के अनुसार इस बार जयपुर साहित्य महोत्सव में आमंत्रित किए गए वक्ताओं में उन्हें दक्षिणपंथ का पलड़ा ज्यादा भारी दिखा. हालांकि वे जोर देकर यह भी दोहराते हैं कि ‘जेएलएफ के आयोजक किसी दवाब में आ जाएं, ऐसा मुश्किल लगता है.’ वाजपेयी आगे जोड़ते हैं, ‘जेएलएफ में सचिन पायलट और राजदीप सरदेसाई का राजनैतिक सत्र तो होता है, जिसका साहित्य से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं. लेकिन यहां शास्त्रीय संगीत, नृत्य और थियेटर जैसे साहित्य के सहचर क्षेत्रों से जुड़े लोग बेहद कम या नदारद दिखते हैं… किंतु इस सब के बावजूद जेएलएफ एक अद्वितीय रसायन है… दुनियाभर में विविधता भरा ऐसा साहित्य महोत्सव और कहीं नहीं होता.’

जेएलएफ में कम रही भीड़

पिछले कई संस्करणों की तरह इस बार जेएलएफ में ऐसा कोई विवाद तो नहीं हुआ जो राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में आ सके, लेकिन प्रदेश स्तर पर इससे जुड़े कुछ विवाद ख़बरों में बने रहे. इनकी शुरुआत इस उत्सव के पहले दिन ही हो गई थी जब इसकी वजह से राजस्थान की कांग्रेस सरकार में चल रही अंदरूनी खींचतान एक बार फिर सामने आ गई. दरअसल जेएलएफ का उद्घाटन राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने किया था. इस मौके पर गहलोत ने इस समारोह को राजस्थान का गौरव बताया.

लेकिन इसके थोड़ी देर बाद ही प्रदेश के पर्यटन मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने अपने विभाग की तरफ़ से इसे दिए जाने वाले तीस लाख रुपए के अनुदान को रोक देने की घोषणा कर दी. सूत्रों का कहना है कि सिंह साहित्य महोत्सव के उद्घाटन समारोह में आमंत्रित न किए जाने से नाराज़ थे. यह बात और है कि जेएलएफ के आख़िरी दिन एक सेशन में विश्वेंद्र सिंह ने बतौर वक्ता भाग लिया जो कि पहले से तय था.

बहरहाल, जयपुर साहित्य महोत्सव से जुड़ी सबसे अहम बात यह है कि अगली बार से इसे, इसके पारंपरिक आयोजन स्थल यानी हेरिटेज होटल डिग्गी पैलेस की बजाय कहीं और आयोजित करवाया जाएगा. इस फैसले के पीछे राजस्थान सरकार और जयपुर प्रशासन ने सुरक्षा कारणों का हवाला दिया है.

इन सभी मुद्दों को लेकर हमने जयपुर साहित्य महोत्सव के मुख्य आयोजक संजोय के रॉय से बात की.

इस बार जेएलएफ में बहुत कम लोग आए, यह जेएलएफ की घटती लोकप्रियता का इशारा है या लोगों की साहित्य में कम होती दिलचस्पी का या फ़िर कुछ और?

बीते कुछ सालों से जेएलएफ में ऐसे लोगों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी जो यहां सिर्फ़ घूमने-फिरने के लिए चले आते थे, उनका साहित्य से कोई खास जुड़ाव नहीं था. इससे हमारी व्यवस्थाएं भी गड़बड़ाती थीं… पिछले दो साल से हम जेएलएफ में भाग लेने वाले लोगों की संख्या घटाने की दिशा में कोशिश कर रहे हैं. इसके लिए हमने तय संख्या के बाद अपने रजिस्ट्रेशन बंद करना शुरु कर दिया. उसके बाद कुछ शुल्क (500 और 800) देकर ही जेएलएफ में हिस्सा लिया जा सकता था. यह एक छोटा सा फिल्टर था… इस बार हमने कोशिश की थी कि जेएलएफ में प्रतिभागियों की संख्या कम से कम पचास हजार कम की जा सके.

कहा जाता है कि जेएलएफ में ग्लैमर साहित्य पर हावी रहता है, लेकिन इस बार यहां सलेब्रिटीज़ भी कम दिखाई दीं, ऐसा क्यों?

सलेब्रिटीज़ के आने पर यहां भीड़ बहुत बढ़ जाती है. जिसे हम लगातार घटाना चाह रहे हैं. इस बार हमने सोनाली बेंद्रे, प्रसून जोशी, नंदिता दास और लीज़ा रे जैसी फिल्मी हस्तियों के सेशन फेस्टिवल के पहले दिन ही आयोजित करवा दिए ताकि वीकेंड पर ज्यादा भीड़ न हो.

कुछ लोगों को इस बात से निराशा भी है और नाराज़गी भी कि जेएलएफ में हिंदी की भागीदारी लगातार कम हो रही है?

हम यहां सिर्फ़ हिंदी के लिए नहीं हैं. यहां हिंदी का ही प्रभुत्व तो स्थापित नहीं करना है. यहां उत्तर भारत ही नहीं बल्कि देश-विदेश के लोग भी आते हैं. यह बात तो कोई नहीं उठाता कि देश की अन्य भाषाओं से जुड़े सत्र भी यहां आयोजित होने चाहिए. कोई यह भी नहीं कहता कि दूसरे राज्यों से यहां कम साहित्यकारों को क्यों बुलाया जाता है. चूंकि यह कार्यक्रम राजस्थान में होता है इसलिए हम कार्यक्रम में राजस्थानी के सत्रों को भी उचित जगह देने की कोशिश करते हैं… फ़िर हिंदी वाली बात वे लोग उठाते हैं जो पूरे कार्यक्रम के बारे में जानते ही नहीं हैं. हमारे प्रोग्राम का बड़ा हिस्सा इस भाषा से जुड़ा होता है.

लेकिन प्रेमचंद जैसे दिलचस्प हिंदी सत्र का वेन्यू इतना छोटा था कि अधिकतर लोग अंदर जा ही नहीं पाए, इसकी वजह?

यह हिंदी के बारे में नहीं है. यह साहित्य के बारे में है. हमारे पास छह वेन्यू हैं जिन्हें बहुत ध्यान से बांटना पड़ता है. हम ये नहीं देखते हैं कि हिंदी का सेशन है तो उसे ‘दरबार-हॉल’ (अपेक्षाकृत छोटा वेन्यू) में रख दें. हम ये देखते हैं कि किस सेशन का आयोजन कहां सही रहेगा. कुछ सत्र रुमानियत से भरे होते हैं. प्रेमचंद के सेशन को जिस माहौल की ज़रूरत थी वह किसी खुले वेन्यू पर नहीं मिल रहा था.

मुंशी प्रेमचंद पर आधारित सत्र में बाहर खड़े श्रोता

जेएलएफ पर आरोप लगता है कि यहां साहित्य का बाज़ारीकरण कर दिया गया है, आप इसे कैसे देखते हैं?

इसे कोई नहीं नकार सकता कि हर चीज के लिए पैसा ख़र्च होता है. इस बार अर्थव्यवस्था में मंदी की वजह से हमारी स्पॉन्सरशिप 40 फीसदी तक कम हुई है. इसके चलते एक आयोजक के तौर पर हमें बड़ा घाटा हुआ है. लेकिन लोग ये बात नहीं समझते. उन्हें लगता है कि सब कुछ मुफ़्त में रजिस्ट्रेशन करवाने जितना आसान है. जितने भी लोग यहां आते हैं उन्हें एंट्री पास से लेकर सुरक्षा तक न जाने कितनी व्यवस्थाएं बिना किसी ढिलाई के मुहैया करवाई जाती है. इसमें करोड़ों खर्च करने पड़ते हैं. बिना मदद के कोई ये कैसे कर सकता है.

जेएलएफ स्थित बाज़ारों में से एक

हम चाहते हैं कि जेएलएफ के बहाने हम हमारे मेहमानों का परिचय भारत की संस्कृति और मेहमाननवाज़ी से करवाएं. यह हमारी जिम्मेदारी है. लेकिन यह जिम्मेदारी भी हम पर ही छोड़ देनी चाहिए कि यह सब हम कैसे करेंगे. अगर किसी को आपत्ति है कि हम साहित्य का बाज़ारीकरण कर रहे हैं तो वे यहां न आएं, हम किसी को जबरदस्ती तो खींच नहीं रहे. हम सिर्फ़ यह आश्वस्त कर सकते हैं कि हम अपने वक्ताओं पर दवाब नहीं बनाते हैं.

आपने दवाब की बात की लेकिन यहां फैज़ से जुड़े एक सत्र मेंहम देखेंगे के उस मिसरे को गाया ही नहीं गया जिनकी वजह से हाल ही में आईआईटी कानपुर में विवाद हो गया था. क्या ये आयोजकों की तरफ़ से दवाब नहीं था?

हम हमारे किसी भी स्पीकर को कभी ये हिदायत नहीं देते कि उन्हें मंच से क्या कहना चाहिए और क्या नहीं. लेकिन हम उनसे ये ज़रूर कहते हैं कि वे जो भी कहें, उसकी जिम्मेदारी भी लें. क्योंकि बाद में यह कहकर बचा नहीं जा सकता है कि ‘तब हम से भूल हो गई थी’. कई लोग ऐसा कर चुके हैं.

राजस्थान के पर्यटन मंत्री ने जेएलएफ को मिलने वाला सरकारी फंड रोक दिया है, राजनीति और साहित्य के बीच संतुलन बना पाना कितनी बड़ी चुनौती है?

मंत्रीजी के बारे में तो यही कह सकता हूं कि उन्होंने खुशी-खुशी हमारे कार्यक्रम में भाग लिया. लेकिन यह सही बात है कि न सिर्फ़ प्रदेश और देश बल्कि दुनियाभर में जो कुछ चल रहा होता है उसका सीधा असर जेएलएफ में नज़र आता ही है. उसकी चर्चा होती है. और फ़िर उसकी वजह से हम पर न सिर्फ़ राजनीतिक दलों बल्कि सिविल सोसायटी की तरफ़ से भी दवाब बनता है कि इसे बुलाओ और उसे नहीं. लेकिन हमारी सिर्फ़ एक ही प्राथमिकता होती है कि हम हर तरह की आवाज़ को मंच दे सकें.

भारत पश्चिम से अलग है. वहां कला में राजनीति का अक्स झलकता है. लेकिन भारत में राजनीति कला में घुल चुकी है. यहां जो कुछ होता है उसे तुरंत ही लार्जर दैन लाइफ जैसा स्थापित कर दिया जाता है. फ़िल्मों के बाद साहित्य ही है जिसे नाराज़गी झेलनी पड़ रही है. लेकिन उसके बावज़ूद राजनेता यहां आते हैं. सलमान खुर्शीद कहते थे कि उन्हें यहां आकर लोगों के रुझान का अंदाज़ा लग जाता है. कुछ साल पहले अनुपम खेर के सेशन में लोगों ने ज्यादा रुचि दिखाई थी. लेकिन इस बार ऐसा रवीश कुमार के सेशन में देखने को मिला.

रवीश कुमार के सत्र में मौजूद भीड़

क्या साहित्य के प्रति किसी विशेष दल की सरकार का रुख ज्यादा सख़्त या नर्म होता है?

सरकार किसी भी दल की हो, कुर्सी मिलते ही सभी की मनोदशा एक ही जैसी हो जाती है. वे अपनी ताक़त का इस्तेमाल कर साहित्य और कला पर काबू करना चाहते हैं.

इस बार राजस्थान का शासन और प्रशासन जेएलएफ के प्रति सख़्ती बनाए हुए है, ऐसा क्यों है?

हम पुलिस के दो हजार जवानों को बारातियों की तरह खाना तो नहीं खिला सकते हैं. हमने राजस्थान के मुख्य सचिव से कहा कि पूरी दुनिया में हमारा स्वागत होता है, सभी चाहते हैं कि हम उनके यहां इस कार्यक्रम को करवाएं. लेकिन जब हम यहां पहुंचते हैं तो हमारे साथ अपराधियों जैसा सलूक किया जाता है. हमारा दोष क्या है? सिर्फ़ इतना ही कि हम कला और साहित्य के जरिए विभिन्न विषयों को प्रस्तुत करना चाहते हैं.

राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने अपने घोषणा पत्र में एक अलग साहित्य महोत्सव को मदद देने की बात कही, अब आपको जेएलएफ का आयोजन स्थल बदलने के आदेश मिले हैं, इसे कैसे देखते हैं?

ये साज़िश है या कुछ और, कह नहीं सकता. लेकिन हम किसी दूसरे महोत्सव को चुनौती के तौर पर नहीं देखते. बल्कि हम तो चाहते हैं कि जेएलएफ के साथ जयपुर में ज्यादा से ज्यादा आयोजन हों. उनके लिए हम हरसंभव मदद करने के लिए भी तैयार हैं. लेकिन दूसरे आयोजकों के मन में हमारे लिए दुर्भावना है. हमने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से इस बारे में चर्चा की तो उन्होंने आश्वासन दिया कि जेएलएफ के दौरान कोई दूसरा साहित्य महोत्सव आयोजित नहीं करवाया जाएगा.

रहा सवाल आयोजन स्थल का तो जयपुर की विरासत इस महोत्सव की रूह है. हेरिटेज होटल होने की वजह से डिग्गी पैलेस में वह माहौल मिल जाता है जिसके लिए दुनिया इस फेस्टिवल और जयपुर को पहचानती है. यहां का इतिहास, यहां का स्थापत्य… यदि सिर्फ़ आयोजन की ही बात है तो उसे हम कहीं भी सेट बनाकर पूरा कर सकते हैं. लेकिन बात जेएलएफ की आत्मा की है. अगर वही नहीं रहेगी तो हम जयपुर में ये फेस्टिवल आयोजित ही क्यों करवाएंगे? जब हम दोहा और इंग्लैंड जैसे शहरों में साहित्य महोत्सव का आयोजन करवा सकते हैं तो फ़िर बॉम्बे या दिल्ली में क्यों नहीं.

हम प्रशासन के विरोध में नहीं हैं. हम उनकी बात समझ रहे हैं, उन्हें भी हमारी ज़रूरत समझनी चाहिए. यह फेस्टिवल सभी का है और आगे बढ़ना चाहिए. इसके लिए हमें ऐसी कोई भी जगह मिल जाए जहां राजस्थान की विरासत या उसकी संस्कृति महूसस की जा सके, लेकिन वैसे सपाट मैदान नहीं, जिनके लिए सरकार कह रही है.

राजस्थान पर्यटन विभाग के मुताबिक जेएलएफ उसकी नीतियों से मेल नहीं खाता, आप भी कह रहे हैं कि उचित आयोजन स्थल मिलने पर ज़रूरी नहीं कि यह साहित्य महोत्सव जयपुर में ही करवाया जाए. तो क्या अगली बार जयपुर साहित्य महोत्सव, जयपुर से बाहर भी हो सकता है?

मैंने ऐसा नहीं कहा. हम पूरी कोशिश करेंगे कि जयपुर छोड़कर कहीं नहीं जाएं. लेकिन डिग्गी पैलेस या राजस्थान की विरासत के बिना यह महोत्सव मर जाएगा. हमें उम्मीद है कि जो भी लोग हमें आगे भी जयपुर आते देखना चाहते हैं वे हमें समर्थन देंगे. तब शायद सरकार भी हमारे लिए कुछ और बेहतर सोचेगी.