योगी सरकार का तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा होने को है और उत्तर प्रदेश में राजनीतिक हलचलें तेज होती जा रही हैं. यहां की विधानसभा में बहुमत न सिर्फ केन्द्र की सत्ता की चाबी माना जाता है बल्कि इसका सीधा असर राज्यसभा के संख्या बल पर भी होता है. इसलिए समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस ने राज्य में मजबूती हासिल करने के लिए अपनी-अपनी रणनीति बनाने और बिसात बिछाने का काम तेज कर दिया है. हर कोई खुद को होड़ में सबसे आगे रखने की कोशिश में जुट गया है.

पिछली बार सत्ता में होने और अब विधानसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के कारण इस होड़ में कांग्रेस और बसपा से समाजवादी पार्टी को आगे होना चाहिए था. विधानसभा उपचुनावों के नतीजे उसे कांग्रेस और बसपा से आगे रख भी रहे हैं. लेकिन क्या अखिलेश यादव में इतनी क्षमता है कि वे अपने दम पर सपा को फिर से सबसे ऊपर ला सकें?

सपा में मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक भूमिका अब अप्रासंगिक हो चुकी है. लगातार बिगड़ता स्वास्थ्य, पारिवारिक रिश्तों में खटास और राजनीतिक सहयोगियों का अकाल उनकी राजनीतिक सक्रियता में सबसे बड़ी बाधा हैं. और अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी विपक्ष की भूमिका में अपना कोई अलग अस्तित्व या तेवर दिखा पाने में सफल नहीं हो पा रही है.

यह ठीक है कि विपक्षी दलों में इस वक्त समाजवादी पार्टी ही ऐसी है जिसमें राजनीतिक पाला बदलकर सबसे अधिक लोग आते दिखाई दे रहे हैं. लेकिन इस तरह का ध्रुवीकरण चुनाव आते-आते उस दल की तरफ होने की संभावना ज्यादा होगी जो भाजपा को सबसे ज्यादा चुनौती देता दिखाई देगा. इस मामले में सपा ज्यादा उत्साह जगाती हुई नहीं दिखती है.

इस वक्त जब देश में भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारों के पक्ष और विपक्ष में एक माहौल बना हुआ है, समाजवादी पार्टी सिर्फ प्रतीकात्मक राजनीति ही कर रही है. सड़क पर संघर्ष के लिए जानी जाने वाली पार्टी अब ऐसा करने की ठीक से कोशिश करती तक नहीं दिख रही है. ऐसे में नागरिकता संशोधन कानून पर कुछ शहरों में हिंसा भड़काने के आरोपों के सिवा सपा के हिस्से और कुछ नहीं आ पाया है. हालांकि अखिलेश यादव ने इस कानून के पारित होने पर ट्वीट करके कहा था कि इससे देश की छवि को अपूर्णनीय क्षति हुई है. इसके बाद सपा ने 19 दिसम्बर को प्रदेश भर की कचहरियों पर बड़ा धरना प्रदर्शन करने की घोषणा की थी. लेकिन यह प्रदर्शन न तो बड़ा हो सका और न ही राज्य भर में हो पाया. इसी दिन पूरे प्रदेश में दूसरे समूहों द्वारा हिंसक प्रदर्शन होने से भी मीडिया में सपा के कार्यक्रमों को चर्चा नहीं मिल सकी.

अखिलेश यादव के एनपीआर का फार्म न भरने की घोषणा ने भी उनके कार्यकर्ताओं के मन में जोश के बजाय आशंकाएं भर दीं. इसके बाद अखिलेश यादव ने हिंसा में मारे गए लोगों को समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर पेंशन देने की जो घोषणा की उससे भी पार्टी के जनाधार में बहुत उत्साह का संचार नहीं हो सका. भाजपा तो उनके इस बयान को बचकाना और अपरिपक्व घोषित कर ही चुकी है. घायलों और पीड़ितों से मिलने में भी अखिलेश पीछे रह गए और कांग्रेस ने इसमें उनसे बाजी मार ली.

अखिलेश यादव की तुलना में मायावती इस दौरान अधिक सधी हुई लगीं. उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून को असंवैधानिक बताया और केन्द्र सरकार से इसे वापस लेने की मांग की. मायावती ने राष्ट्रपति को भी इस बारे में ज्ञापन दिया और उत्तर प्रदेश में हुई हिंसा की न्यायिक जांच की भी मांग की. उन्होंने बसपा में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे भीम आर्मी के चन्द्रशेखर को भी यह कहकर आड़े हाथों लिया कि दलित नेता बनने का नाटक करने के लिए वे नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे हैं. और पुलिस की इजाजत के बिना प्रदर्शन करके वे जान-बूझकर जेल गए. उन्होंने अपनी पार्टी के लोगों से यह अपील भी कि वे चन्द्रशेखर और उन जैसे लोगों से सचेत रहें.

राजस्थान में बसपा विधायकों की टूट और अन्य विधानसभा चुनावों में फीके प्रदर्शन के बीच उत्तर प्रदेश में पार्टी को किसी तरह बचाने की मुहिम में लगीं मायावती इस वक्त अखिलेश यादव से ज्यादा परिपक्व दिखाई दे रही हैं. उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से हिंसा से दूर रहने और शांतिपूर्ण तरीकों से ही विरोध करने का आह्वान किया. जबकि सपा कार्यकर्ताओं के हिंसा से जुड़ाव के कारण मध्य वर्ग के बीच उसकी छवि सुधरने का नाम नहीं ले रही है.

अखिलेश की एक बड़ी समस्या यह भी है कि वे अब भी शायद मुख्यमंत्री पद की ठसक में ही जी रहे हैं. अभी हाल ही में कन्नौज बस दुर्घटना के घायलों का हाल लेने जब वे छिबरामऊ पहुंचे तो वहां मौजूद एक डाक्टर से उन्होंने जिस तरह की अभद्रता की उसकी किसी गंभीर राजनेता से अपेक्षा नहीं की जा सकती. उनके आम कार्यकर्ताओं की यह शिकायत अब भी बनी हुई है कि ‘भय्या तो मिलते ही नहीं.’ उनकी पार्टी के भीतर ही कई लोगों का मानना है कि वे न तो विपक्ष के सबसे बड़े नेता की भूमिका सही तरीके से निभा पा रहे हैं और न ही पार्टी के अध्यक्ष की.

सपा और बसपा से इतर उत्तर प्रदेश में अपनी तमाम कमियों के बावजूद कांग्रेस में इस समय सबसे अधिक राजनीतिक सक्रियता दिख रही है. पार्टी ने भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर अपनी रणनीति में सुधार करने का प्रयास किया है. उसने अपेक्षाकृत युवा और जनता के बीच सक्रिय अजय कुमार लल्लू को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पुराने, स्थापित और बोझ बनते जा रहे नेताओं को साफ संकेत दिया है कि अब सक्रियता ही कांग्रेस में पद पाने का सबसे बड़ा पैमाना होगा. कई पुराने नेताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है.

कांग्रेस जनता से जुड़े सवालों पर सड़क पर उतरने की कोशिश भी कर रही है, हालांकि जड़ हो चुकी पार्टी के लिए ऐसा करना बहुत कठिन काम है, इसीलिए लखनऊ में उसे सीएए के खिलाफ अपना प्रदर्शन भी रद्द करना पड़ा. इसके बाद प्रियंका गांधी ने स्कूटर से हिंसा के आरोप में बंद सामाजिक कार्यकर्ता एसआर दारापुरी के घर जाकर इसकी भरपाई करने की कोशिश की.

प्रियंका वाड्रा की सक्रियता भी पार्टी कार्यकर्ताओं को उत्साहित कर रही है. चाहे उन्नाव में रेप पीड़िता को जलाकर मारने का मामला हो या इलाहाबाद में छात्रों का आन्दोलन, कांग्रेस ने पीड़ितों के पक्ष में सड़कों पर उतरकर समाजवादी पार्टी को इस मामले में काफी पीछे छोड़ दिया है.

कांग्रेस सही तरीके से मीडिया तक अपनी बात पहुंचाने में भी समाजवादी पार्टी से आगे निकलती दिख रही है. जहां तक मायावती की बात है तो वे सिर्फ एक एजेंसी को बुलाकर उससे अपनी बात कह देतीं हैं. लेकिन कांग्रेस ने अपनी मीडिया टीम को बहुत सक्रिय कर दिया है. उसके ऑफिस से छोटी-छोटी बातों की जानकारी भी मीडिया और सोशल मीडिया तक पहुंचाई जाती है. लेकिन समाजवादी पार्टी के पास न तो कोई मीडिया टीम ही है और न ही मीडिया तक पहुंचने का कोई व्यवस्थित इंतजाम. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के कार्यक्रमों में यह भी साफ देखा जा सकता है कि कांग्रेस जो काम करती है, सपा कुछ समय बाद उसी का दोहराव कर रही होती है.

उत्तर प्रदेश में बहुमत हासिल करने के लिए मध्यमवर्गीय वोट बैंक का महत्व सबसे अधिक है. पिछले तीन विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखें तो साफ दिखता है कि मायावती की सरकार बनाने में बसपा के दलित-मुस्लिम वोट बैंक के साथ-साथ मध्य वर्ग की भूमिका भी निर्णायक थी. इसी तरह अखिलेश सरकार के स्पष्ट बहुमत में भी सपा के यादव-मुस्लिम वोट बैंक के साथ-साथ मध्यमवर्गीय मतदाता ही कारण बने थे. और ऐसा ही कुछ बीजेपी की मौजूदा सरकार के गठन के वक्त भी हुआ. इसलिए 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले तमाम राजनैतिक दल मध्यम वर्ग को साधने में जुटे हैं. उत्तर प्रदेश की विपक्षी पार्टियों को देखें तो फिलहाल इसमें भी कांग्रेस ही सबसे आगे दिख रही है.

चाहे नागरिकता संशोधन कानून हो या एनआरसी या एनपीआर, इन तीनों मुद्दों पर बसपा की रणनीति अपने वोट बैंक को बहकने से बचाने की रही तो कांग्रेस अपना जनाधार बढ़ाने का प्रयास करती रही. उधर अखिलेश यादव अपनी पार्टी के हिंसा समर्थक होने वाली छवि को धोने के बजाय उल्टे उसे और पुष्ट ही करते दिखाई दिए. चूंकि अखिलेश यादव और मायावती भविष्य में अकेले ही चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके हैं इसलिए अभी तो 2022 के विधानसभा चुनाव में किसी बड़े गठबन्धन की सम्भावनाएं नहीं दिख रही हैं. अगर ऐसा हुआ तो अखिलेश यादव की पार्टी उस चुनाव में कोई चमत्कार दिखा पाएगी ऐसा सोच पाना भी मुश्किल है.