पिछले सप्ताह जयपुर में कांग्रेस ने युवा आक्रोश रैली आयोजित की थी. इसमें कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी भाग लिया था. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार और पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ने के बाद यह अपनी तरह का पहला कार्यक्रम था जिसमें गांधी ने शिरकत की. विश्लेषक इस रैली को राहुल गांधी की रीलॉन्चिंग के तौर पर देख रहे थे. इससे पहले जनवरी- 2013 में भी कांग्रेस ने जयपुर में ही राहुल गांधी के सिर पर उपाध्यक्ष का ताज रखा था.

इस रैली की सबसे खास बात यह थी कि इसकी सारी व्यवस्थाएं प्रदेश कांग्रेस की बजाय युवा कांग्रेस और एनएसयूआई ने संभाली थी. हालांकि कुछ इसे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट की आपसी अदावत से जोड़कर देख रहे हैं. जानकारों के अनुसार इस रैली की व्यवस्थाएं प्रदेश कांग्रेस के जिम्मे आने पर इसकी सफलता का श्रेय सचिन पायलट को मिलता. जबकि प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष और खेल एवं परिवहन राज्य मंत्री अशोक चांदना का झुकाव गहलोत खेमे की तरफ़ महसूस किया जाता है.

लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषक इससे अलग बात भी कहते हैं. उनके मुताबिक बीते कुछ महीनोें के दौरान देश भर के युवाओं में मोदी सरकार के प्रति नाराज़गी महसूस की गई है. इस बीच अलग-अलग विश्वविद्यालयों में हुई पुलिस कार्यवाही ने भी युवाओं के आक्रोश को बढ़ाने का काम किया है. जबकि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने में इसी युवा वर्ग की भूमिका अहम मानी जाती रही है. अब कांग्रेस इन्हीं युवाओं के गुस्से को भुनाकर मौजूदा भाजपा के आधार को कमजोर करने की कोशिश में जुटी है. शायद इसलिए ही जयपुर की आक्रोश रैली में राहुल गांधी ने अपने संबोधन को नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी और एनपीआर जैसे वैश्विक चर्चाओं में शुमार हो चुके मुद्दों के बजाय देश के युवाओं और उनकी बेरोजगारी पर ज्यादा केंद्रित रखा.

जानकारों की माने तो बीते छह साल में कांग्रेस विपक्ष के तौर पर ज्वलंत मुद्दो को समय पर उठाने या उन्हें लेकर मोदी सरकार को घेर पाने में हर बार नाकाम सी रही है. लेकिन इस बार वह सही मौके पर सही दांव अपनाती दिख रही है. विश्लेषक बताते हैं कि एनआरसी और सीएए को लेकर पहले ही देश में इतने आंदोलन हो रहे हैं कि राजस्थान जैसे कांग्रेस शासित प्रदेश में इस मुद्दे पर राहुल गांधी का कुछ कहना या करना शायद ही लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींच पाता! ऐसे में युवाओं की नब्ज़ पकड़कर कांग्रेस और राहुल गांधी ख़ुद को अलग तरह से प्रासंगिक बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

इसकी एक वजह यह भी मानी जा सकती है कि न तो दूसरे मुद्दों की तरह युवाओं का आक्रोश आसानी से ठंडा होता है और न ही हाल-फिलहाल केंद्र सरकार के पास इसे दूर करने की कोई ठोस योजना दिख रही है. यूं भी देश की लोकतांत्रिक राजनीति के इतिहास को देखें तो मजबूत से मजबूत सत्ता को हिलाने का काम युवा ही करते आए हैं. कांग्रेस ख़ुद इस बात की सबसे बड़ी भुक्तभोगी रह चुकी है. सूत्रों की मानें तो राजस्थान के बाद राहुल गांधी जल्द ही पंजाब, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ और महाराष्ट्र जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में भी ऐसी ही रैलियों का आयोजन कर सकते हैं. वे दिल्ली के चुनाव में भी जो प्रचार करने वाले हैं उसमें भी युवाओं को लुभाने पर खास जोर दे सकते हैं.

कांग्रेस की इस रणनीति पर बात करते हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव विवेक बंसल हमें बताते हैं कि ‘भारत में आज साठ प्रतिशत से ज्यादा तादाद युवाओं की है. युवाओं को ही आगे कर के हमें भारत के भविष्य का निर्माण करना है. प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा सरकार ने जो दिवास्वप्न हमारे युवाओं को दिखाए थे, वे सभी निराधार साबित हो चुके हैं. कांग्रेस वेदना से भरे उन युवाओं की पीड़ा को समझ रही है जो मौजूदा केंद्र सरकार से निराश और नाराज़ हैं. उन्हीं को ध्यान में रखते हुए पार्टी की आगामी रणनीतियां तैयार की जाएंगी. भविष्य में अन्य राज्यों में होने वाली ऐसी रैलियों में भी हम युवाओं की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित करेंगे.’

वहीं, युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव एवं राजस्थान प्रभारी डॉ पलक वर्मा इस बात को नकारती हैं कि राहुल गांधी मौजूदा हालात को देखते हुए युवाओं से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं. सत्याग्रह से हुई चर्चा में वे कहती हैं, ‘वे हमेशा से युवाओं के हक़ और उन्हें आगे बढ़ाने की बात करते आए हैं. आज हमारी जीडीपी तेजी से गिर रही है. कई छोटे-बड़े उद्योग बंद हो चुके हैं. देश में बेरोजगारी का स्तर सर्वाधिक ऊंचाई पर पहुंच चुका है. पिछले साल करोड़ों युवाओं को नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है. ऐसे में किसी भी संवेदनशील नेता का विचलित होना स्वभाविक है… इस विपरीत माहौल में यदि हमारे नेता ही नौजवानों को ढांढस नहीं बंधाएगे तो कौन बंधाएगा?’

बहरहाल, आक्रोश रैली के बाद कइयों को राहुल गांधी में एक बार फ़िर नई संभावनाएं नज़र आने लगी है. इस रैली में गांधी ने जिस तरह से न सिर्फ़ युवाओं बल्कि उद्योग घरानों को भी संदेश दिया उसने भी राजनीतिक विश्लषकों को प्रभावित किया है. लेकिन जानकारों का एक बड़ा तबका मानता है कि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी से टक्कर लेने के लिए गांधी को अभी और तैयारी की ज़रूरत है.

वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ इस बारे में कहते हैं, ‘राहुल गांधी ने कई अहम बातें की, लेकिन उनके भाषण में उत्साहहीनता थी. वे तथ्यों के आधार पर अपने संबोधन को ज्यादा प्रभावी कर सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा भी नहीं किया. उन्होंने भाजपा पर प्रहार किया, लेकिन उनकी धार कुंद थी. वे रैली में युवाओं के लिए कोई खास परिप्रेक्ष्य स्थापित करने में सफल रहे हों, ऐसा भी नहीं कह सकते.’

बारेठ आगे जोड़ते हैं, ‘कांग्रेस एक अजीब सी दुविधा से जूझ रही है. वह अल्पसंख्यकों की भी बात करना चाहती है, राहुल गांधी को शिवभक्त भी बताती है और ख़ुद को सेकुलर दिखाने से भी झिझकती है. गांधी ने इशारों-इशारों में नागरिकता कानून को कटघरे में खड़ा किया, लेकिन लोग इससे ज्यादा सुनना चाहते थे. कांग्रेस का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह अपनी मूल भावना से काफी दूर है और इस संकट से पार पाना हाल-फिलहाल उसके लिए थोड़ा मुश्किल नज़र आ रहा है.’