जुलाई 1920 में अपने प्रसिद्ध लेख ‘चरखे का संगीत’ में गांधीजी ने लिखा था - ‘पंडित मालवीय जी ने कहा है कि जब तक भारत की रानी-महारानियां चरखे पर सूत नहीं कातने लगतीं, और राजे महाराजे करघों पर बैठकर कपड़े नहीं बुनने लगते तब तक उन्हें संतोष नहीं होगा. … दरअसल पंडित जी जिस सुंदर ढंग से भारतीय राज-परिवारों को चरखा अपनाने के लिए राजी करने की कोशिश कर रहे हैं, वह किसी दूसरे के लिए संभव नहीं.’


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लेकिन गांधीजी इस बात से अनभिज्ञ थे कि मालवीय जी की तरह ही एक और शख्स भारत में रानियों और जमींदारनियों के बीच गांधीजी के चरखे को लोकप्रिय बनाने के लिए अनोखे तरह का प्रयास कर रहा था. इनका नाम था - रसूल अंसारी. रसूल मियां बिहार के गोपालगंज जिले के रहने वाले थे और एक भोजपुरी लोक-कलाकार थे. खुद ही नाटक और नाच (लोक-नाट्य) लिखते थे खुद ही उनका मंचन भी करते थे. वे गांधीजी से लगभग दो-तीन साल छोटे थे और उनसे बहुत ज्यादा प्रभावित थे. उस दौर के अपने एक नाटक ‘आज़ादी’ में उन्होंने ज़मींदार की पत्नीरूपी पात्र से यह गीत गवाया था:

छोड़ बलमुआ जमींदारी परथा

सईंया बोअऽ ना कपास, हम चलाइब चरखा

हम कातेब सूत, तू चलइहऽ करचा

हम नारा नुरी भरब, तू चलइहऽ करघा

कहत रसूल, सईंया जइहऽ मत भूल

हम खादीए पहिन के रहबऽ बड़का

सईया बोअऽ ना कपास, हम चलाइब चरखा...’

रसूल मियां ने केवल पांचवीं कक्षा तक ही शिक्षा पाई थी. उन दिनों भोजपुरी समाज के लोग रोजी-रोटी की तलाश में कलकत्ते की ओर जाते थे. रसूल के पिता फतिंगा अंसारी भी मार्कस लाइन स्थित कलकत्ता छावनी में अंग्रेजों के यहां बावर्ची का काम करते थे. कलकत्ते में भोजपुरी लोगों की तादाद बहुत ज्यादा होती थी. उन्हीं के आमंत्रण पर रसूल अपना नाच दिखाने कलकत्ता जाया करते थे. एक बार वहां की लाल बाजार पुलिस लाइन में रसूल का नाच चल रहा था. नाच देखने वाले ज्यादातर भोजपुरी-भाषी सैनिक थे. वहां रसूल ने अपना एक गीत सुनाया जो इस तरह था:

छोड़ गोरकी के अब तू खुशामी बलमा

एकर कहिया ले करबऽ तू गुलामी बलमा

देसवा हमार बनल के रानी

करे ले हमनीं पर हुक्मरानी

एकर छोड़ अब दीहल सलामी बलमा

एकर कहिया ले करबऽ तू गुलामी बलमा...’

रसूल के इस गाने से वहां के बिहारी सिपाही इस कदर प्रभावित हो गए कि उनमें से कुछ सिपाहियों ने अंग्रेजों की नौकरी छोड़ दी. और भी कई सिपाहियों के नौकरी छोड़ने का अंदेशा था. इसे देखकर अंग्रेजी सरकार के अधिकारी सकते में आ गए. रसूल को मार्कस लाइन डेरे से गिरफ्तार कर लिया गया. रसूल को जिस गली से ले जाया जा रहा था वह यौनकर्मियों की गली थी. आगे-पीछे पुलिस और बीच में रसूल अपने गीत गाते हुए जा रहे थे:

भगिया हमार बिगड़लऽ, अइनीं कलकतवा, बड़ा मन के लागल

नाहक में जात बानी जेल, बड़ा मन के लागल...’

कहा जाता है कि रसूल की जमानत यौनकर्मियों ने ही दी थी. इसके लिए उन्होंने अपने जेवर तक बेच दिए थे. रसूल अंसारी की प्रसिद्धि ऐसी थी कि पास के नवाब की बेटी भी थाने गई थी.

रसूल भारत-विभाजन के विरोधी थे और सभी भारतीयों की एकता के मुखर पैरोकार भी. उर्दू और भोजपुरी मिश्रित भाषा में उन्होंने इस पर एक गीत भी लिखा:

सर पर चढ़ल आज़ादी के गगरिया, संभल के चलऽ डगरिया ना

एक कुइंया पर दू पनिहारन, एक ही लागल डोर

कोई खींचे हिन्दुस्तान की ओर, कोई पाकिस्तान की ओर

ना डूबै ना फूटै मिल्लत की गगरिया ना

सर पर चढ़ल आज़ादी के गगरिया...

हिंदू दौड़े पुराण लेकर, मुसलमान कुरान

आपस में दूनों मिल-जुल लिहो, एके रख ईमान

सब मिल-जुल के मंगल गावैं, भारत की दुअरिया ना...

कहै रसूल भारतवासी से यही बात समुझाई

भारत के कोने-कोने में तिरंग लहराई

बांध के मिल्लत के पगड़िया ना...

रसूल अंसारी में भारतीयता कूट-कूटकर भरी थी. राम, रामायण और शिव को लेकर भी उन्होंने गीत रचे. गंगा मइया पर भी उन्होंने गीत रचे. नाच शुरू करने से पहले रसूल सरस्वती वंदना गाते थे:

जो दिल से तेरा गुन गावे,

भवसागर के पार पावे

तुमसे तीनों जग उजियारा

जग में तेरा नाम प्यारा

यही रसूल पुकारा...’

लेकिन सबसे मशहूर था शादी-ब्याह पर उनके द्वारा रचा गया सेहरा जो वे खुद ही गाते भी थे. इनमें सबसे प्रसिद्ध था ‘राम का सेहरा’:

गमकता जगमगाता है अनोखा राम का सेहरा,

जो देखा है वो कहता है रमेती राम का सेहरा

हजारों भूप आए थे, जनकपुर बांधकर सेहरा

रखा अभिमान सेहरों का सलोने श्याम ने सेहरा

उधर है जानकी के हाथ में जयमाल शादी की

इधर है राम के सर पर विजय प्रणाम का सेहरा

लगा हर एक लड़ियों में ये धागा बंदेमातरम का

गुंथा है सत् के सूई से सिरी सतनाम का सेहरा

हरी, हरिओम पढ़कर के ये मालन गूंथ लाई है

नंदन बन स्वर्ग से लाई है मालन श्याम का सेहरा

कलम धो-धो के अमृत से लिखा है मास्टर ने ये सेहरा,

सुनाया है रसूल ने आज ये इनाम का सेहरा...’

ऐसा माना जाता है कि इस सेहरे की शुरुआती पंक्तियां को रसूल के उस्ताद हलीम मास्टर ने लिखा था और रसूल जी ने इसे पूरा किया था. हलीम मास्टर के अलावा रसूल मियां ने कविताई करने की तालीम अपने गांव के बैजनाथ चौबे, गिरिवर चौबे और बच्चा पांडेय से भी पाई थी.

रसूल मियां और ऐसे ही अन्य भूले-बिसरे लोक-कलाकारों पर कार्य कर रहे संस्कृतिकर्मी निराला बिदेसिया कहते हैं ‘रसूल जैसा कलाकार किसी जाति, मजहब, संप्रदाय का नहीं होता, बल्कि वह सामुदायिकता और सामूहिकता के आधार पर काम करता है. मानवता को श्रेष्ठ बनाना और मानवीयता का विकास ही उसका धर्म होता है. रसूल ने राम का सेहरा लिखा. राम को केंद्र में रखकर उन्होंने और भी कई गीत रचे. लेकिन रसूल चाहे राम को रच रहे थे या कृष्ण को, वह घूम-फिरकर देश की आजादी, सुराज पर पहुंचते थे. जैसे ‘राम का सेहरा’ में वे आखिरी में वंदे मातरम का गान करते हैं. ऐसे ही भाव उनके दूसरे गीतों में भी दिखते हैं. ऐसा लगता है कि वह मूलत: गांधी के लोग थे, जो गांधी की तरह ही धार्मिक नायकों को भी एकता का प्रतीक बना रहे थे.’

रसूल मियां की खुद की लिखी कोई पुस्तक, कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है. उनकी लिखी एक डायरी अवश्य थी जिसमें उन्होंने अपनी रचनाएं संकलित कर रखी थीं. लेकिन मरणोपरांत उनकी डायरी उनके बेटों से कोई मांगकर ले गया और कभी वापस नहीं मिल सका. रसूल मियां की स्मृतियां उनके बेटों, शागिर्दों और उनके समकालीन तथा परवर्ती कुछ कलाकारों में बची हुई थीं. सुभाष चन्द्र कुशवाहा नाम के एक संस्कृतिकर्मी ने इन सबसे एक विस्तृत बातचीत और शोध के आधार पर रसूल मियां की विरासतों को सहेजने का सराहनीय कार्य किया है. 2009 में ‘लोकरंग’ पत्रिका में उन्होंने रसूल मियां पर एक विस्तृत आलेख लिखा जिसका शीर्षक था - ‘क्यों गुमनाम रहे लोक कलाकार रसूल’. यह पूरा आलेख कुशवाहा जी के उसी आलेख से मिली जानकारियों पर आधारित है.

रसूल मियां का देहांत लगभग 80 वर्ष की अवस्था में 1952 में हुआ. लेकिन 30 जनवरी, 1948 को जब गांधीजी को गोली मारी गई तो उनका हृदय कराह उठा. उस दिन रसूल अपनी नाच मंडली के साथ कलकत्ता में थे. हत्या की खबर जैसे ही कलकत्ता पहुंची, फैक्ट्री के मालिक ने उस रात नाटक नहीं खेलने का निर्देश दिया. लेकिन उन्होंने मालिक को यह कहकर मना लिया कि नाटक श्रद्धांजलिस्वरूप बापू की दुःखद हत्या पर ही आधारित होगा. नाटक देखकर लोगों की आंखें भर आईं थीं. आहत रसूल के हृदय के उद्गार गीत बनकर इन शब्दों में फूट पड़े थे:

के हमरा गांधीजी के गोली मारल हो, धमाधम तीन गो

कल्हीये आजादी मिलल, आज चललऽ गोली,

गांधी बाबा मारल गइले देहली के गली हो, धमाधम तीन गो...

पूजा में जात रहले बिरला भवन में,

दुशमनवा बैइठल रहल पाप लिये मन में,

गोलिया चला के बनल बली हो, धमाधम तीन गो...

कहत रसूल, सूल सबका दे के,

कहां गइले मोर अनार के कली हो, धमाधम तीन गो...

के हमरा गांधीजी के गोली मारल हो, धमाधम तीन गो...

मूल रूप से आरा जिले के एक छोटे-से गांव से आने वाली लोकगायिका चंदन तिवारी ने कुशवाहा जी द्वारा संकलित रसूल जी के गीतों को खुद ही कंपोज कर गाना शुरू किया है. पूरबियातान शृंखला के रूप में ये गीत बहुत ही लोकप्रिय हुए हैं. रसूल के अलावा वे मास्टर अजीज, मूसा कलीम और स्नेहलता जैसे बिहारी रचनाकारों को गा रही हैं. एक बार किसी कार्यक्रम में गांधीमना अनुपम मिश्र जी ने उन्हें गांधीजी से जुड़े लोकगीत गाने का सुझाव दिया था और अब वे खास तौर पर गांधीजी से जुड़े कई लोकगीत गाती हैं.

गांधीजी की हत्या पर रसूल जी द्वारा रचित और चंदन तिवारी द्वारा गाया गया उपरोक्त गीत ‘के हमरा गांधीजी के गोली मारल हो’ यहां सुना जा सकता है.

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