निर्देशक - एचई अमजद खान
कलाकार - रीम शेख, अतुल कुलकर्णी, दिव्या दत्ता, ओम पुरी, मुकेश ऋषि
रेटिंग - 1/5

नोबल पुरस्कार से सम्मानित संयुक्त राष्ट्र की शांतिदूत मलाला युसुफजई की अनाधिकारिक बायोपिक को ‘गुल मकई’ शीर्षक दिया गया है. मलाला जब महज 13 साल की थीं और स्कूल में पढ़ रही थीं, तब वे इस नाम से बीबीसी उर्दू के लिए ब्लॉग लिखा करतीं थीं. इन ब्लॉग्स में तफ्सील से तालिबान के उन तमाम जुल्मों का जिक्र होता था जो वह स्वात की वादियों में आम लोगों पर, खासकर बच्चों पर ढा रहा था. मलाला ने जब गुल मकई बनकर अपनी और स्कूल जाने की चाह रखने वाली तमाम लड़कियों की आपबीती दुनिया को बताई, तब वह पहला मौका भी आया जब तालिबान के हमलों से इतर किसी वजह से स्वात चर्चा में आया हो. उनके लिखे का असर दुनिया पर कुछ यूं हुआ कि उसने स्वात के हालात में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी और तालिबान पर कुछ यूं कि उसने मलाला युसुफजई के सिर पर गोली दाग दी.

‘गुल मकई’ की पटकथा स्वात और मलाला युसुफजई के बारे में इतनी ही जानकारी देती है. कहने को तो फिल्म मलाला के जीवन पर आधारित है लेकिन उनसे ज्यादा तवज्जो यह तालिबान को देती है. फिल्म उनके संघर्षों के बजाय तालिबान द्वारा अपनाए जाने वाले हिंसा के तरीकों को कहीं ज्यादा विस्तार से दिखाती है. हालांकि इनसे यह तो पता चलता है कि किताबें थामे रहने की, मलाला की जिद कितने खतरनाक दौर में पनपी है, फिर भी इससे केवल उनके आसपास की परिस्थितियों का ही पता चल पाता है, मलाला पर उनके असर का नहीं. इन सबके बीच आतंकवाद से निपटने में पाकिस्तान के राजनेताओं और सेना की जो भूमिका को दिखाई गई है, वह सतही लगने के साथ-साथ तथ्यों से मेल खाती भी नहीं दिखती. इसके अलावा, ‘गुल मकई’ में लगातार गोलीबारी-बमबारी और युद्ध के बाकी दृश्यों को देखकर आपके महसूस होता है कि जैसे फिल्मकार की इच्छा एक वॉर फिल्म बनाने की थी. लेकिन सही पटकथा न मिलने के चलते, उसने शांतिदूत मलाला की बायोपिक को ही वॉर फिल्म बना डाला.

अभिनय की बात करें तो फिल्म में मलाला की भूमिका रीम शेख ने निभाई है. रीम टीवी इंडस्ट्री का पहचाना हुआ चेहरा हैं और यहां पर वे जिस तरह का अभिनय करती हैं, वह उनके प्रतिभाशाली होने का पता दे जाता है. उनके पिता की भूमिका निभा रहे अतुल कुलकर्णी बढ़िया अभिनय करते हैं लेकिन वे अपनी संवाद अदायगी में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं लाते हैं जो थोड़ा खटकता है. उनके उलट पाकिस्तानी लहज़ा अपनाने का यह कारनामा रीम शेख के अलावा उनकी मां की भूमिका निभा रहीं दिव्या दत्ता ने भी बखूबी किया है. इन तीनों के अलावा फिल्म में ओम पुरी भी देखने लायक हैं, लेकिन वे केवल एक ही दृश्य में नज़र आते हैं.

फिल्म के बाकी पक्षों की बात करें तो इसकी पटकथा के साथ-साथ प्रोडक्शन क्वालिटी भी औसत से कम ही कही जाएगी. इसके अलावा, सिनेमेटोग्राफी ऐसी है कि कई ट्रॉली या मूविंग शॉट्स में कैमरा थरथराता हुआ नज़र आता है. इन सबके बीच, अगर कोई चीज़ थोड़ी राहत वाली है तो वह फिल्म का संगीत है. ज्यादातर गाने बैकग्राउंड में बजते हैं और ये सुरीले होने के साथ-साथ, दृश्यों पर पूरी तरह फिट भी बैठते हैं. कुल मिलाकर, एचई अमजद खान निर्देशित ‘गुल मकई’ वह जादू नहीं जगा पाती है जिसके चलते दर्शक खुशी-खुशी थिएटर से बाहर निकलते हैं.

अब अगर मलाला युसुफजई की बात करें तो वे जानती हैं कि हर लड़की उनकी तरह स्कूल जाने के लिए सिर पर गोली नहीं खा सकती, इसलिए दुनिया का ध्यान इस बात की तरफ खींचने के लिए वे तमाम मुमकिन कोशिशें करती रहती हैं. और, इस बात के लिए इस 22 साल की लड़की से ढेर सारी प्रेरणा ली जा सकती है. लेकिन उसके लिए यह फिल्म देखने की ज़रूरत नहीं है. इसकी बजाय उन पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्में देखिए, उनके इंटरव्यूज पर नज़र गड़ाइए और फिर भी कुछ कम लगे तो उनकी किताब ‘आई एम मलाला’ पढ़िए, और कुछ न मिले तो विकिपीडिया पेज खंगाल डालिए. वह इससे कहीं ज्यादा मनोरंजक और रोचक जानकारियों से भरा है.