बजट कैसा होगा, इस बात के कयास जोरों पर हैं. आर्थिक सर्वे और राष्ट्रपति का अभिभाषण ऐसे कयासों के लिए एक प्रमाणिक दस्तावेज का काम करते हैं. शुक्रवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण और आर्थिक सर्वे आने के बाद विश्लेषकों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि आर्थिक सुस्ती के इस दौर में आने वाला बजट क्या स्वदेशी आर्थिक नीतियों को प्रोत्साहन देने वाला हो सकता है.

हालांकि, ऐसी चर्चायें भाजपा के सत्ता में आने के बाद से ही चलती रही हैं और आर्थिक नीतियों को लेकर सरकार और स्वदेशी लॉबी में खींचतान देखने को मिलती रही है. आरबीआई के गवर्नर के पद से रघुराम राजन का जाना हो या बाद में सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यन का अपना पद छोड़ना, इन सब बातों को स्वदेशी बनाम उदारवादी आर्थिक लॉबी के बीच टकराव के रूप में देखा गया. लेकिन, क्या आरएसएस समर्थक स्वदेशी लॉबी और सरकार में बैठे उदारवादी आर्थिक प्रशासकों के बीच चलने वाली यह रस्साकसी अब साफ तौर पर स्वदेशी की ओर मुड़ती दिखाई देती है?

साल 2020 के बजट से पहले राष्ट्रपति के अभिभाषण और आर्थिक सर्वे की कुछ बातों पर गौर किया जाए तो ऐसा कहा जा सकता है. राष्ट्रपति ने सदन में अपने भाषण में कहा, ‘आजादी के मूलमंत्र में एक भावना थी- आत्मनिर्भर भारत. आत्मनिर्भर भारत तब बनता है जब हर भारतीय भारत में बनी हर वस्तु पर गर्व करे. मेरी सरकार ‘उज्ज्वल कल के लिए लोकल’ के मंत्र पर विश्वास करती है.’ राष्ट्रपति ने अपने भाषण में यह भी कहा कि वह संसद से लेकर पंचायत तक के प्रतिनिधियों से अपील करते हैं कि ‘उज्ज्वल कल के लिए लोकल’ के दर्शन को एक आंदोलन बना दें.

राष्ट्रपति का अभिभाषण कैबिनेट तैयार करती है और यह सरकार की आगामी दशा-दिशा का एक प्रमाणिक दस्तावेज होता है. इसलिए राष्ट्रपति के अभिभाषण की इन बातों पर गौर करें तो सरकार ने सिद्धांत रूप में यह संकेत दे दिया है कि वह अब व्यवहारिक आर्थिक नीतियों में स्वदेशी पर जोर देगी. राष्ट्रपति का अभिभाषण स्वदेशी अर्थ नीति का सिर्फ इशारों में समर्थन नहीं करता है, जिससे यह कहा जाए कि ऐसा स्वदेशी लॉबी को खुश करने के लिए कहा गया है और व्यवहारिक नीतियों के क्रियान्यवयन में इसका ज्यादा असर नहीं दिखेगा. वह साफ शब्दों में कहता है, ‘स्थानीय स्तर पर बने उत्पाद इस्तेमाल करने पर आप अपने क्षेत्र के छोटे कारोबारी की बड़ी मदद करते हैं.’ राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में प्रत्येक भारतीय से आग्रह किया कि वह स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दे.

यह तो राष्ट्रपति के अभिभाषण की बात हुई, जिसमें इस बात का पर्याप्त इशारा मिलता है कि सरकार आर्थिक नीतियों को लेकर अपना रूख संरक्षणवादी करने जा रही है. अब बात आर्थिक सर्वे की. आर्थिक सर्वे की सबसे बड़ी सुर्खी यह ही है कि उसमें कहा गया है कि देश की जीडीपी की ग्रोथ 6-6.5 के बीच रहेगी. सर्वे बाजार को सक्षम बनाने की बात करता है. पांच ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए सुझाव देता है. आंकड़ों के लेखे-जोखे में वैसी ही बातें हैं, जैसे आमतौर पर आर्थिक समीक्षा में होती है. हां, आर्थिक सर्वे इस बात की पैरवी जरूर करता है कि आर्थिक वृद्धि को तेज करने के लिए राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को बढ़ाया जा सकता है.

यानी इस बिंदु पर आर्थिक सर्वे उदारवादी खेमे के कठोर राजकोषीय वित्तीय अनुशासन से अलग जाकर बात करता है. जो जाहिर है कि विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी संस्थाओं के रुख से अलग है. इन बातों में छिपे निहितार्थ को तरह-तरह विश्लेषित किया जा सकता है. कहा जा सकता है कि आर्थिक सर्वे में स्वदेशी आर्थिक नीतियों के पक्ष में वैसे खुलकर बातें नहीं कही गई हैं, जैसी राष्ट्रपति के अभिभाषण में. लेकिन, आर्थिक सर्वे में एक बिंदु पर बहुत जोर दिया गया है कि भारत चीन जैसे तरीके अपनाकर देश में रोजगार बढ़ा सकता है. इसके लिए ‘मेक इन इंडिया’ में ‘असेंबलिंग इन इंडिया’ को जोड़ने की बात कही गई है. आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि ऐसा करने पर भारत 2025 तक चार करोड़ नौकरियां सृजित करने में सफल होगा.

यह कैसे होगा,यह बहुत स्पष्ट नहीं है. लेकिन, ‘मेक इन इंडिया’ अपनी अवधारणा में स्वदेशी आर्थिक नीति के करीब है. ‘असेंबल इन इंडिया’ इसी के करीब की सोच लगती है. इसलिए स्वदेशी अर्थनीति समर्थक लॉबी इसका स्वागत ही करेगी. हां, आर्थिक सर्वे अपने सिद्धांत रूप में कुछ बाजार समर्थक बातें करता है. जैसे सरकार को बाजार में बहुत अधिक दखल नहीं देना चाहिए. यह खाद्य सब्सिडी और कर्ज माफी खत्म करने की बात करता है. लेकिन, भारतीय घरेलू बाजार में तो ऐसी चीजों से बहुत ज्यादा आपत्ति स्वदेशी समर्थकों को भी नहीं है. स्वदेशी लॉबी विदेशी कंपनियों को लेकर इस तरह के विरोध करती है. आर्थिक सर्वे अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों पर कोई बहुत सख्त बात करता नजर नहीं आता है, जिससे स्वदेशी समर्थकों को आपत्ति हो.

स्वदेशी और खुले बाजार वाली आर्थिक नीतियों को लेकर तनातनी मोदी के पहले ही कार्यकाल से ही चल रही है. कहा जा सकता है कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां भी इसी के इर्द-गिर्द घूमती रही हैं. सरकार इन दोनों रास्तों में कौन सा रास्ता पकड़ना चाहती है, इसको लेकर कई बार भ्रम भी बना. लेकिन, मोदी के दूसरे कार्यकाल में चीजें कुछ ज्यादा स्पष्ट हुईं. जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फैसला किया कि भारत आरसेप समझौते से बाहर रहेगा. इसके पीछे और भी तमाम वजहें थीं, लेकिन स्वदेशी लॉबी ने इसे अपनी जीत की तरह प्रस्तुत किया था.

इसके बाद सरकार के मंत्रियों की तरफ से मुक्त व्यापार समझौतों की आलोचना और संरक्षणवाद की पैरवी शुरु हो गई. कभी उदार आर्थिक नीतियों के समर्थक माने जाने वाले पीयूष गोयल जैसे मंत्रियों ने एमेजॉन के संस्थापक जेफ बेजोस के भारत में निवेश की घोषणा पर कहा कि वे भारत में निवेश करके वे कोई एहसान नहीं कर रहे हैं. एमेजॉन के खिलाफ भारतीय रिटेलरों की मुहिम पर भी उन्होंने कहा कि ऐसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को बाजार बिगाड़ने की छूट नहीं दी जाएगी. पहले इसे दिल्ली की चुनावी चिंता से जोड़ा गया, लेकिन शायद अब संरक्षणवाद इससे आगे निकल गया है. सूत्रों के मुताबिक, बजट की तैयारियों के दौरान लगातार इस बारे में बैठकें हुई हैं कि घरेलू कारोबारियों और उद्योगों को किस तरह से सहूलियत दी जा सकती है. राजनीतिक जानकार इसे उस पुरानी भाजपा की वापसी के तौर पर देखते हैं जब उसे ‘बनिया पार्टी’ कहा जाता था. लेकिन, शुक्रवार को राष्ट्रपति का अभिभाषण ‘स्वदेशी की ओर लौटो’ पर प्रधानमंत्री की भी मुहर का इशारा करता है.

इन सबके बीच चिंता वाली बात यह है कि अर्थव्यवस्था फिलहाल गहरी आर्थिक सुस्ती के दौर में है. इससे निपटने के लिए जोरदार तरीके से आगे बढ़ने की जरूरत है. सरकार अपनी नीतियों की अवधारणा में बदलाव करती दिख रही है, लेकिन ऐसे ठोस उपाय करती नहीं दिख रही जिनसे आर्थिक वृद्धि रफ्तार पकड़े.