निर्देशक - नितिन कक्कड़
कलाकार - सैफ अली खान, अलाया एफ, कुब्रा सैत, कुमुद मिश्रा, तब्बू
रेटिंग - 3/5

‘वाओ…’

एक वह दौर था जब सैफ अली खान की मिमिक्री करने वाले इस शब्द का इस्तेमाल बार-बार किया करते थे. ऐसा इसलिए कि तब सैफ अक्सर अपने संवादों की शुरूआत ‘वाओ’ बोलकर किया करते थे और अंग्रेजीदां संवाद अदायगी ही उनकी पहचान बन गई थी. एक यह दौर है, जब सैफ अली खान कभी-कभार ही ‘वाओ’ बोलते नज़र आते हैं लेकिन जब भी उनकी कोई नई फिल्म आती है तो वाओ कहने वालों की कमी नहीं रहती. बस फर्क इतना है कि पहले लोग उनकी नकल करते हुए यह शब्द दोहराते थे और अब उनकी तारीफ में इसका इस्तेमाल करते हुए नहीं अघाते.

बिना-घुमाए फिराए कहना चाहिए कि आजकल सैफ अली खान के बारे में होने वाली बातचीत का सुर एक ही होता है – तारीफ वाला. तीन हफ्ते पहले रिलीज हुई ‘तानाजी’ हो या तीन महीने पहले आई ‘लाल कप्तान’ इन फिल्मों ने कैसा भी बिजनेस किया हो, सैफ अली खान ने अपने अभिनय के लिए दोनों हाथों से तारीफें बटोरी हैं. और, अब ‘जवानी जानेमन’ में भी उनकी परफॉर्मेंस कुछ ऐसी है कि पिछली फिल्म के लिए इस्तेमाल किए गए तारीफी कसीदे फिर गढ़े और पढ़े जा सकते हैं.

हालांकि अब यह मिथक ध्वस्त हो चुका है कि सैफ अली खान केवल अर्बन-एनआरआई किरदार ही निभा सकते हैं लेकिन यह बात भी उतनी ही सच मानी जानी चाहिए कि बॉलीवुड में इन किरदारों को सबसे अच्छे से निभाने वालों में वे सबसे आगे हैं. ‘जवानी जानेमन’ में भी उन्होंने लंदन में रहने वाले ऐसे ही एक पंजाबी का किरदार निभाया है. यह मिडिल-एज्ड पंजाबी, जैज़ अपनी उम्र का लिहाज किए बगैर मस्ती-मज़े करता है. उसकी खासियतों में अपनी शर्तों पर जीने और स्वार्थ की हद तक मनमानी करने के अलावा, हर रात क्लबों में पार्टी करना और फिर एक नई लड़की के साथ घर लौटना भी शामिल है. इस तरह की खासियतों वाले इंसान को काल्पनिक होने पर‌ भी पसंद कर पाना थोड़ा मुश्किल है. लेकिन सैफ अली खान ने इस मुश्किल को बड़ी आसानी से आसान बना दिया है. जैसा उन्होंने कुछेक साल पहले ‘कालाकांडी’ में किया था. पिछली कई फिल्मों को देखते हुए खान के बारे में कहा जा सकता है कि अब वे लीड रोल निभाने और उनमें कमाल रचने में महारत हासिल कर चुके हैं.

‘जवानी जानेमन’ का हिस्सा बने एक और करिश्माई कलाकार की बात करें तो वह अलाया एफ हैं जो इस फिल्म से बॉलीवुड में डेब्यू कर रही हैं. यह दिलचस्प है कि सैफ अली खान की बेटी बनकर अपनी करियर शुरू करने वाली अलाया एफ, आने वाले वक्त में उनकी बेटी सारा अली खान की सबसे तगड़ी कॉम्पटीटर साबित हो सकती हैं. जवानी जानेमन के एक भी फ्रेम में वे एक भी एक्स्प्रेशन मिस नहीं करती हैं, एक बार भी डायलॉग बोलते हुए उनकी आवाज नहीं कांपती है और एक भी मौका ऐसा नहीं आता जब वे स्क्रीन पर सुंदर-सेक्सी नहीं लगती हैं. यानी अगली पीढ़ी की अभिनेत्रियों में आलिया भट्ट, जान्हवी कपूर, सारा अली खान के साथ उनका नाम भी शामिल होगा, यह तय लगता है. अलाया के काम के अलावा उनका एक परिचय यह भी है कि वे अभिनेत्री पूजा बेदी की बेटी और गुजरे जमाने के मशहूर अभिनेता कबीर बेदी की नवासी हैं.

सैफ अली खान और अलाया एफ के किरदारों के जरिए फिल्म बाप-बेटी की एक कमाल जोड़ी से आपको मिलवाती है. यहां पर बाप को अपनी 21 साल की बेटी से मिलकर पता चलता है कि उसकी कोई संतान है. इस अटपटी कहानी को लंदन के एक कस्बे में स्थापित किया गया है. जवानी जानेमन‌ का आइडिया जितना अनोखा है, उसे परदे पर लाने का तरीका उतना ही औसत है. इसमें सिंगल होने से जुड़ी तमाम तरह की घिसी-पिटी बातें रखी गई हैं, जगह-जगह फैमिली ड्रामा पिरोया गया है और बहुत से ऑब्वियस ट्विस्ट का इस्तेमाल किया गया है. इस कामचलाऊ लिखाई के बाद भी कमाल के संवाद और बेहतरीन अभिनय इसे बोरिंग होने से बचाए रखते हैं.

मुख्य किरदारों के अलावा फिल्म में कुब्रा सैत, कुमुद मिश्रा और फरीदा जलाल का काम भी देखने लायक है. खास तौर पर कुब्रा सैत का, जो कल्पनाओं में उड़ते नायक की जिंदगी में वास्तविकता की जमीन थामे रखने का काम करती हैं. इमोशनल लेकिन प्रोफेशनल, देसी-एनआरआई लड़की के इस किरदार में कुब्रा कुछ ऐसी नज़र आती हैं कि उन्हें देखने की इच्छा बनी रहती है. उनके अलावा, अपने स्पेशल अपीयरेंस में तब्बू भी थोड़ा और-थोड़ा और की मांग करने पर मजबूर करती हैं. दो-तीन दृश्यों में नज़र आने के बाद भी वे अपने किरदार से जितना हंसाती हैं, उतना ही खिझाती भी हैं.

फिल्म के कुछ और पक्षों की बात करें इसकी प्रोडक्शन क्वालिटी शानदार और फिल्मांकन बेहतरीन है. साथ ही, इसका संगीत कुछ ऐसा है कि साधारण से लग रहे क्लाइमैक्स पर भी इमोशन का वज़न डाल देता है. इसके अलावा, सैफ अली खान का ही बेहद पॉपुलर ‘ओले-ओले’ गाना जब नए अवतार में परदे पर आता है तो बदले हुए बोलों के बावजूद ढेर सारा नॉस्टैल्जिया और मस्ती जगाकर जाता है. कुल मिलाकर, नितिन कक्कड़ निर्देशित इस फिल्म में बराबर-बराबर खूबियां और खामियां हैं लेकिन फिर भी अपनी विचित्रता से यह आपका इतना मनोरंजन तो कर ही देती है कि थिएटर से आप खुशी-खुशी बाहर निकलें.