पहली बार अमेरिका ने 1792 में अपनी मुद्रा के लिए दाशमिक प्रणाली का तरीका अपनाया गया. इसके तहत मुद्रा को न्यूनतम मूल्य की सौ इकाइयों में विभाजित किया जाता है. उसके बाद यह प्रणाली इतनी लोकप्रिय हुई कि ब्रिटेन को छोड़कर यूरोप के सभी देशों ने इसे अपना लिया. भारत में तब एक रुपए में 16 आने हुआ करते थे. इस प्रणाली में एक आना, चार पैसे के बराबर और एक पैसा, तीन पाई के बराबर होता था. इस तरह पाई इसकी सबसे छोटी इकाई हुआ करती थी. इंग्लैंड में चूंकि उस समय इसी से मिलती जुलती मुद्रा प्रणाली थी, इसलिए अंग्रेजी शासन के समय इसमें कोई छेड़छाड़ नहीं की गई.

आज़ादी के तुरंत बाद भारत में में मौद्रिक विनिमय को तर्कसंगत बनाने के लिए इस बात की ज़रूरत महसूस की जाने लगी थी कि रुपए के लिए दशमलव प्रणाली लागू की जाए. लेकिन यहां चुनौती यह थी दशकों से प्रचलित आना-पाई प्रणाली को एक झटके में खत्म नहीं किया जा सकता था. इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम 1955 में उठाया गया. इसी साल संसद ने सिक्का ढलाई संशोधन कानून पारित किया. इसके तहत व्यवस्था दी गई कि रुपए को सौ भागों में विभाजित करके इसकी न्यूनतम इकाई एक पैसा बना दी जाए और नए सिक्कों को इसी आधार पर ढाला जाएगा. यानी नए सिक्के पांच, दस, पच्चीस पचास पैसों के बनाए गए.

इस अधिनियम के पारित होने के बाद भी आना-पाई प्रणाली को खत्म करने की दिशा में कई दिक्कतें थीं. पहली तो यह कि इतनी विशाल जनसंख्या को इस बदलाव के बारे में जानकारी कैसे दी जाएगी. दूसरी समस्या सरकारी सेवाओं जैसे डाक-तार और रेलवे जैसे विभागों की नई दरें तय करने की थी. इसके अलावा यह भी चिंता का विषय था कि कारोबारियों तो आना-पाई प्रणाली खत्म होने के बाद अपने सामानों की मनमानी कीमतें तय करने से कैसे रोका जाए?

रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने इन समस्याओं को दूर करने के लिए एक विस्तृत गुणन चार्ट छपवाकर देश के तमाम डाकघरों में उपलब्ध कराए थे ताकि लोग इनके आधार पर मुद्रा विनिमय कर सकें. इन तैयारियों के बाद 1957 में भारत सरकार ने नए सिक्के जारी कर दिए. इन पर ‘नए पैसे’ लिखा गया था. इन सिक्कों के बाज़ार में आने के साथ ही देश में कई दिलचस्प घटनाएं भी देखने को मिलीं. कहा जाता है कि दिल्ली के जनरल पोस्ट ऑफिस में तब पहले सिक्के को पाने के लिए कतरीबन दस हजार लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी. इसे संभालने के लिए विशेष सुरक्षा इंतजाम करने पड़ गए थे. वहीं, कलकत्ता में कई लोगों ने नए सिक्कों का विरोध करते हुए कुछ पोस्ट ऑफिसों में आगजनी की थी. इन लोगों का कहना था कि सरकार उन्हें महंगी कीमत पर पोस्टकार्ड और लिफाफे दे रही है.

1963-64 के आसपास जब नए पैसे पूरी तरह प्रचलन में आ गए तब सरकार ने इन सिक्कों में छपे ‘नए पैसे’ से नए शब्द हटा दिया. इस बारीक बदलाव के साथ नए सिक्के प्रचलन में आ गए.