काली पैराशूट जैकेट में एक लड़का हाथ में देसी कट्टा लिए कुछ चिल्ला रहा है. पीछे कुछ पुलिस वाले दिल्ली की सर्दी में अपने हाथों को आपस में बांधे बहुत इत्मीनान से खड़े हैं. और अचानक से वह हमलावर गोली दाग देता है. गोली जामिया मिलिया इस्लामिया के बाहर नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों में से एक ‘शादाब’ को लगती है.

हमलावर गोली चलाते समय ‘ये लो आजादी’, ‘भारत मां की जय’, ‘दिल्ली पुलिस जिंदाबाद’ और ‘वंदे मातरम’ जैसे नारे लगाता है. यह इत्तेफाक़ था या कुछ और कि इस हमले के लिए 30 जनवरी यानी महात्मा गांधी की पुण्यतिथि वाला दिन चुना गया.

इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की भूमिका बेहद चौंकाने वाली रही. गोली चलाने से पहले हमलावर बाकायदा हथियार को हवा में लहराते और नारेबाजी करते हुए वहां पर चहलकदमी कर रहा था. इस पर भीड़ ने चिल्लाकर पुलिस को सतर्क भी किया. लेकिन पुलिस ने काफी देर तक कोई हरकत ही नहीं की. सिनेमाई अंदाज में फायर करने के बाद हमलावर, पुलिस की तरफ़ बढ़ा और उसे एक निहत्थे पुलिसवाले ने बड़ी आसानी से अपनी गिरफ़्त में ले लिया.

अपने बचाव में पुलिस (इंटेलीजेंस विभाग के स्पेशल कमिश्नर) की दलील है कि यह सब कुछ ही सेकंड में घटित हो गया, इसलिए कोई कुछ कर नहीं पाया. लेकिन इस घटना का वीडियो बताता है कि यह कुछ सेकंड की बात बिल्कुल नहीं थी. पुलिस के ही एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी इस बारे में बताते हैं कि पुलिस चाहती तो बड़ी आसानी से हमलावर पर काबू पा सकती थी, पुलिस ऐसे मौकों से निपटने के एक नहीं बल्कि कई तरीके जानती है. लेकिन उसने कुछ नहीं किया.

इस पूरी वारदात में सिर्फ़ पुलिस ही नहीं है जिसकी भूमिका कटघरे में खड़ी की जानी चाहिए. यदि आपने गौर किया हो तो हमने दूसरी ख़बरों की तरह इस रिपोर्ट में अब तक हमलावर का नाम एक बार भी नहीं लिखा है. ऐसा इसलिए क्योंकि उसे नाबालिग बताया जा रहा है. न्यूज़ एजेंसी एएनआई ने यह दावा घटना के करीब डेढ़ घंटे बाद ही कर दिया था. अपनी बात के पक्ष में उसने सोशल मीडिया पर हमलावर की दसवीं की मार्कशीट भी साझा की.

एएनआई के विस्तृत न्यूज़ नेटवर्क के मद्देनज़र इस बात को कइयों ने स्वीकार कर लिया कि उसने उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के जेवर इलाके से ताल्लुक रखने वाले हमलावर की विस्तृत जानकारी इतने कम समय में जुटा ली होगी. लेकिन यह बात कुछ जानकारों के गले नहीं उतर रही है.

तकनीकी विशेषज्ञ कृष अशोक भी इनमें से एक हैं. एक विशेष सॉफ्टेवयर (Error Level Analysis tool/Foto Forensics) की मदद से जब उन्होंने एएनआई द्वारा साझा की गई मार्कशीट को जांचा तो उसके अलग-अलग हिस्सों के कॉन्ट्रास्ट में अंतर पाया. ऐसा तभी होता है जब कोई तस्वीर कई तरह की डिजिटल एडिटिंग से गुज़र चुकी हो.

इसके उदाहरण के तौर पर मार्कशीट की तस्वीर में एएनआई के वॉटरमार्क को लिया जा सकता है जिसे ज़ाहिर तौर पर बाद में जोड़ा गया था. इस वाटरमार्क के कॉन्ट्रास्ट और आस-पास के हिस्से जिनमें ‘केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड’ और ‘अंक विवरणिका लिखा है’ के कॉन्ट्रास्ट में भी अंतर साफ महसूस किया जा सकता है. अब आप इस मार्कशीट के उस हिस्से को देखिए जहां हमलावर की जन्मतिथि, उसके स्कूल का नाम और अंकों का विवरण मौजूद है. आपको इस हिस्से का कॉन्ट्रास्ट और एएनआई वॉटर मार्क का कॉन्ट्रास्ट बिल्कुल एक ही सा नज़र आएगा. इस आधार पर माना जा रहा है कि सामने लाई गई इस मार्कशीट में हमलावर की जन्मतिथि और दूसरी जानकारियों को बाद में एडिटिंग के जरिए जोड़ा गया था.

यदि इस तस्वीर की कुछ और बातों पर गौर करें तो (कथित तौर पर बाद में जोड़े गए) काले रंग के अक्षर और अंकों की आकृति बिल्कुल सटीक आयताकार यानी शार्प रेक्टेंगुलर नज़र आती है. आम तौर पर माना जाता है कि ऐसा सिर्फ़ तभी होता है जब कोई टेक्स्ट फोटोशॉप सॉफ्टवेयर में जाकर रेक्टेंगुलर टेक्स्ट बॉक्स टूल की मदद से किसी तस्वीर में जोड़ा जाए. ऐसा साधारण कॉपी-पेस्ट के जरिए भी किया जा सकता है और कुछ अन्य तरीकों से भी. जानकारों के अनुसार यदि ये काले अक्षर असली तस्वीर का हिस्सा होते तो यह शार्प रेक्टेंगुलर एजेस (edges) नज़र आना मुश्किल था. इस बात को आप मार्कशीट के गुलाबी रंग के अक्षरों को देखकर समझ सकते हैं जो कि असली हैं.

फ़िर, जब आप साझा की गई मार्कशीट की मूल तस्वीर को देखते हैं तो उसमें कई जगह काग़ज़ के मुड़े होने जैसे निशान नज़र आते हैं. यह शायद इसलिए क्योंकि किसी ने इसकी फोटो लेने के लिए इसे हाथ से पकड़ा हुआ है. लेकिन जब आप गौर से काले अक्षरों को देखते हैं तो वहां ऐसा कोई निशान नज़र नहीं आता. ऐसा होना भी मार्कशीट में बदलाव किए जाने के संदेह को और गाढ़ा करता है.

इस बारे में पूरी तरह आश्वस्त होने के लिए कृष अशोक ने मार्कशीट की तस्वीर की जांच फोरेंसिकली नाम के एक उन्नत टूल पर भी की. इसकी मदद से भी यह पता लगाया जाता है कि किसी तस्वीर में कौन सा हिस्सा बाद में जोड़ा गया है. तकनीकी भाषा में इसे नॉइज़-एनालाइसिस कहते हैं. इस टेस्ट में भी कृष अशोक ने पाया कि मार्कशीट में विवादित हिस्से का नॉइज़ लेवल, बाकी हिस्से से अलग था. यदि ये काले अक्षर इस मार्कशीट के असली हिस्से होते तो नॉइस लेवल में यह अंतर नहीं आता. इस एनालाइसिस की विस्तृत रिपोर्ट को आप इस लिंक पर देख सकते हैं.

इसके अलावा यह मार्कशीट लेमीनेशन करवाई हुई है. ऐसे में इसकी फोटो खींचने पर टेक्स्ट के रंग कुछ फीके नज़र आने चाहिए थे, लेकिन इस तस्वीर में मौजूद काले रंग के अक्षरों की चमक रत्तीभर भी नहीं घटी है. यह भी दिखाता है कि मार्कशीट के इस हिस्से को शायद बाद में जोड़ा गया.

अशोक की ही तरह अपर्णा नाम की एक ट्विटर यूज़र भी इस बारे में कुछ अहम जानकारी साझा करती हैं. वे कहती हैं कि इस मार्कशीट में जेवर पब्लिक स्कूल का कोड 59149 लिखा है. सीबीएससी के मुताबिक यह कोड वैध नहीं है क्योंकि इस स्कूल का कोड 60872 होना चाहिए.

तारिक़ जमाल नाम के एक अन्य ट्विटर यूज़र के हवाले से अपर्णा कहती हैं कि हमलावर की सामने आई मार्कशीट में अंग्रेजी के 74 अंकों के लिए सी-1 ग्रेड दी गई है, जबकि सीबीएससी ने इतने अंकों के लिए बी-1 ग्रेड तय कर रखी है. इसी तर्ज पर इस मार्कशीट में हिंदी में 67 अंकों के लिए सी-2 अंक दिए गए हैं, जो कि नियमानुसार बी-2 होने चाहिए थे. इसी तरह गणित के 36 अंकों के लिए डी-2 ग्रेड मिली है, जबकि सीबीएसई इसके लिए सिर्फ़ डी ग्रेड देती है. वहीं विज्ञान में 33 अंक मिलते दिखे हैं, जो कि गणित से कम हैं, लेकिन इसे डी-1 ग्रेड दी गई है.

सीबीएसई की वेबसाइट से जुटाई गई जानकारी के आधार पर अपर्णा यह भी लिखती हैं कि जेवर पब्लिक स्कूल में कक्षा आठ से ऊपर किसी विद्यार्थी का नामांकन ही नहीं किया गया है. यह जानकारी इस लिंक से हासिल की जा सकती है.

बहरहाल, पुलिस की मौजूदगी में शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रही भीड़ पर इस तरह से गोली चला देना अपने आप में कई सवाल खड़ा करता है, लेकिन इस अपराध की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है कि यह अनुराग ठाकुर जैसे केंद्रीय मंत्री के संबोधन के कुछ ही दिन बाद ही घटती है. इसमें वे कहते हैं - ‘…गोली मारो सालों को.’ फ़िर इसके एक ही दिन बाद शाहीन बाग़ में भी ऐसी ही घटना हो जाती है. ऐसे में जल्द से जल्द ज़ामिया के हमलावर की मार्कशीट की उच्चस्तरीय जांच करवाई जानी चाहिए ताकि दोषी को उचित सजा दिलवाई जा सके. यह जांच इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि एएनआई पर इससे पहले भी सरकार के प्रभाव में काम करने और ख़बरों की शक्ल में ग़लत तथ्यों को प्रसारित करने के आरोप लगते रहे हैं.